अंग्रेजी को दुनिया की सफलतम भाषा माना जाता है. यह 20वीं शताब्दी में वैश्विक भाषा के रूप में विकसित हुई और आज इंटरनेट पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती है. शिक्षा और शोध के क्षेत्र में यह स्पष्ट तौर पर अन्य सभी भाषाओं से आगे है. लेकिन अब ऐसा लगता है जैसे इस भाषा को प्रतिस्पर्धा मिलने लगी हाे. खास तौर पर भारत जैसे बहुभाषीय संस्कृति वाले देश में हिंग्लिश (हिन्दी-अंग्रेजी का मिला-जुला रूप) इसकी नजदीकी प्रतिद्वंदी के रूप में उभरी है. तो क्या हिंग्लिश अागे चलकर अंग्रेजी की जगह ले सकती है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए थोड़ा विस्तार से इस विषय पर बातचीत करनी होगी.

पहले इस हिंग्लिश का एक उदाहरण देखिए, ‘शी वाज भुनोइंग मसाला, जब फोन की घंटी बजी.’ यानी, ‘जब फोन की घंटी बजी तो वह मसाला भून रही थी.’ बाेलचाल में हिन्दी-अंग्रेजी का यह घालमेल भारत में अच्छा-खासा लोकप्रिय हो रहा है. क्योंकि एक तरफ तो इस तरह का भाषायी इस्तेमाल यह बताता है कि ‘आप आधुनिक हैं’. दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट करता है कि ‘आप जमीन से जुड़े हुए हैं’. इसका उपयोग इतना सहज और सरल है कि अधिकांश लोग अंग्रेजी के बजाय इसे ही प्राथमिकता देते हैं. खासतौर पर सामान्य बातचीत में धाराप्रवाह बोलते वक्त.

दुनिया में भारत दूसरा सबसे बड़ा देश है, जहां अंग्रेजी बोलने वाले लोग सबसे ज्यादा तादाद में रहते हैं. एक अनुमान के मुताबिक, यहां करीब 12.5 करोड़ लोग अंग्रेजी बोलते हैं. कई लोग तो एक से ज्यादा भाषाएं भी बोलना जानते हैं. फिर भी अंग्रेजी का प्रभाव ऐसा है कि सामाजिक प्रतिष्ठा, नौकरी-कारोबार में सफलता और आगे बढ़ने के लिए यह अनिवार्य सी हो चुकी है. लेकिन जैसा कि किसी भी भाषा के साथ स्थापित और स्वीकार्य तथ्य है कि अगर उसे धाराप्रवाह बोलना सीखना है, तो उसके ही माहौल में रहना पड़ेगा. यानी लगातार उसके सम्पर्क में रहना होगा.

हालांकि अंग्रेजी के संदर्भ में देखें तो भारत में उसका माहौल ज्यादातर या तो महानगरों और समाज के उच्च वर्गों तक ही सीमित है. इस सीमित माहौल के बावजूद अंग्रेजी बोलना सभी चाहते हैं या कहें कि कम से कम अंग्रेजी बोलते हुए दिखना तो चाहते हैं. ऐसे में, वे अंग्रेजी की जगह हिंग्लिश का विकल्प आजमाते हैं. और यहीं इस भाषाई मिश्रण को आम लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने का एक बड़ा कारण मिल जाता है. ऐसे ही कुछ कारणों ने ब्रिटेन की एसेक्स यूनिवर्सिटी के भाषा विभाग की व्याख्याता विनीता चांद को इसके बारे में अध्ययन के लिए प्रेरित किया.

अंग्रेजी से हिंग्लिश की तरफ लोग कैसे खिसके?

अपने अध्ययन के बारे में विनीता बताती हैं, ‘चूंकि हिंग्लिश कोई आधिकारिक भाषा नहीं है. इसलिए यह पता लगाने के लिए कि लोग आखिर कैसे अंग्रेजी से हिंग्लिश की तरफ खिसके, हमें दूसरे तरीके अपनाने पड़े. इसलिए हमने कुछ भाषाई प्रतिस्पर्धाओं का सांख्यिकीय प्रतिरूपण (स्टेटिस्टिकल मॉडलिंग) किया. इससे हमें यह पता करने और अनुमान लगाने में मदद मिली कि विभिन्न समुदायों में स्थानीय संस्कृति और सामाजिक कारकों के आधार पर किस तरह के भाषायी बदलाव आए हैं. जैसे कि स्कूलों में कितनी भाषाएं पढ़ाई जाती हैं और नौकरियों के लिए कौन-कौन सी भाषाएं उपयोगी हैं. कहां-कहां, कौन-कौन सी विशिष्ट भाषाएं इस्तेमाल की जाती हैं.’

विनीता जानकारी देती हैं कि भाषायी उपयोग में आए परिवर्तन का पता लगाने के लिए यह मॉडल इससे पहले भी इस्तेमाल किया जा चुका है. और काफी सफल भी रहा है. वे उदाहरण देती हैं, 'स्कॉटलैंड तथा वेल्स में जहां स्थानीय गैलिक व वेल्स भाषा की जगह पूरी तरह अंग्रेजी ने ले ली है. और सिंगापुर जैसे बहुभाषीय देश में भी, जहां अंग्रेजी और मलय की तुलना में मंदारिन लगभग प्रतिस्पर्धा से बाहर हो चुकी है. यही वजह रही कि भारत में भी भाषायी बदलाव के सामाजिक कारणों और हिंग्लिश की बढ़ती लोकप्रियता का सच पता करने के लिए हमने इसी मॉडल का इस्तेमाल किया. हालांकि, हमें भाषायी चलन में आई तब्दीली के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए कुछ आंकड़ों और जानकारियों की भी जरूरत थी.’

विनीता के मुताबिक, ‘हम यह भी जानना चाहते थे कि हिंग्लिश बोलने वाले लोग क्या वास्तव में कोई भाषा धाराप्रवाह नहीं बोल सकते. या फिर वे सिर्फ इसलिए हिंग्लिश बोलते हैं, क्याेंकि हिन्दी की तुलना में इसकी सामाजिक अहमियत ज्यादा है. लिहाजा, हमने ऐसे 24 लोगों से बातचीत की, जिन्होंने जनगणना में खुद को द्विभाषी बताया था. यानी उनका दावा था कि वे हिन्दी और अंग्रेजी दोनों बोल सकते हैं. हमने बातचीत के दौरान उनसे आग्रह किया वे सिर्फ हिन्दी या अंग्रेजी का ही इस्तेमाल करें. इसके बाद हमने उनसे कई बेहद सामान्य विषयों पर बातचीत की. जैसे उनके शौक क्या हैं? पसंदीदा खेल कौन सा है? उनका बचपन कैसे बीता? आदि...’

इस कवायद से पता चला कि कोई भी सफलतापूर्वक सिर्फ हिन्दी भाषा नहीं बोल पाया. बल्कि उनकी बातचीत में कुल मिलाकर करीब 18.5 फीसदी तक अंग्रेजी का इस्तेमाल किया ही गया. इस प्रयोग के बाद विनीता की टीम ने भारतीय टेलीविजन पर आने वाले एक रियलिटी शो के पूरे-पूरे दो सत्रों का विश्लेषण भी किया. इससे यह पता लगाया गया कि शो के हर प्रतिभागी द्वारा सामान्य बातचीत में कितनी अंग्रेजी इस्तेमाल की गई. इस अध्ययन के बाद दो नतीजे सामने आए. पहला - हिंग्लिश बोलने वाले लाेग ऐसी किसी भी परिस्थिति में, जहां सिर्फ हिन्दी बोलना जरूरी है, उसे (हिन्दी भाषा) नहीं बोल सकते. और इसी तरह की परिस्थिति में वे अंग्रेजी भी धाराप्रवाह नहीं बोल सकते.

विनीता बताती हैं, ‘ इस दौरान कुछ लोगों ने तो माना भी कि वे सिर्फ हिंग्लिश ही धाराप्रवाह बोल सकते हैं. यानी उनके पास कोई विकल्प नहीं होता. दूसरा नतीजा यह सामने आया कि हिंग्लिश बोलने वाले एक-दूसरे के साथ संवाद में भाषायी तालमेल आसानी से बिठा लेते हैं. इन्हीं दोनों कारणों से संभवत: उस समुदाय विशेष में हिंग्लिश का चलन तेजी बढ़ा, जिसे किसी भी एक समय में सिर्फ हिन्दी या अंग्रेजी के ही विशुद्ध इस्तेमाल की जरूरत महसूस नहीं होती. लिहाजा, स्वाभाविक तौर पर यह वर्ग वक्त के साथ-साथ हिंग्लिश की तरफ आकर्षित होता गया.’

भाषा के हमलावर और शिकार

इस अध्ययन से यह यह बात भी सामने आती है कि बातचीत के दौरान शोधकर्ता दो तरह के लोगों से मुखातिब थे. एक जो हमलावर सरीखा था और दूसरा शिकार के जैसा. इनमें शिकार वह वर्ग था, जो पहले सिर्फ हिन्दी बोल रहा था. लेकिन खुद को पिछड़ता देख वह हिन्दी-अंग्रेजी का द्विभाषी हो गया. और इस तरह उसने हिंग्लिश के सहज विकल्प को अपना लिया. जबकि दूसरा वर्ग, जो हमलावर के जैसा था, खुद को श्रेष्ठ समझता था, उसने भी इसी भाषायी विकल्प में अपनी श्रेष्ठता को सुरक्षित पाया और उसने भी इसे अपना लिया. इस तरह ये दोनों वर्ग समय के साथ-साथ हिंग्लिश भाषी हो गए. धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने की इच्छा, इस भाषा तक सीमित पहुंच और रोजगार के अवसरों के लिहाज से इसकी अनिवार्यता ने भी हिंग्लिश का चलन बढ़ाने में भूमिका निभाई.

इस अध्ययन के नतीजों के मुताबिक बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल सकने की पूरी संभावना रखते हैं. लेकिन ज्यादातर समृद्ध वर्ग तक ही इस भाषा के सिमटे होने से उन्हें दूसरा विकल्प नहीं मिला. लिहाजा, उन्होंने थोड़ी सी अंग्रेजी सीखकर उसका अपनी मूल हिन्दी में घालमेल कर बोलना शुरू कर दिया. इस तरह वे हिंग्लिश भाषी समुदाय में शामिल हो गए. यह चलन आगे भी इसी तरह बने रहने की संभावना है. अंग्रेजी के प्रभाव वाली नौकरियों के बाजार में वे लोग जो नौकरी या उसके अवसर (और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने की जरूरत भी) खो देते हैं, उनके भी हिंग्लिश भाषी समुदाय से जुड़ने की संभावना है. लेकिन यह संभावना कम है कि वे हिन्दी के लिए अंग्रेजी को छोड़ देंगे.

अपने इस अध्ययन के बारे में विनीता कहती हैं, 'इस प्रकार हमारा यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि भारत में तीनों भाषाएं और उन्हें बोलने वाले समुदाय बरकरार रहने वाले हैं. और इस बात की संभावना नहीं है कि हिंग्लिश आगे चलकर हिन्दी या अंग्रेजी को चलन से बाहर कर देगी. हालांकि इस अध्ययन से यह बात भी सामने आई कि भारत की जनगणना में हिन्दी-अंग्रेजी द्विभाषी लोगों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है. इसमें से अधिकांश आबादी असल में हिंग्लिश भाषी है, जिसने इस मिश्रित भाषा को शुद्ध हिन्दी और विशुद्ध द्विभाषा के बीच की खाली जगह को भरने का जरिया बना लिया है. क्योंकि हिंग्लिश उनकी आधुनिकता संबंधी जरूरत तो पूरा करती ही है, उन्हें स्थानीय स्तर पर जोड़कर भी रखती है.’

(ब्रिटेन की एसेक्स यूनिवर्सिटी के भाषा विभाग की व्याख्याता विनीता चांद का यह अालेख ‘द कनवर्जेशन’ पर प्रकाशित हुआ था)