पेरिस तो वही है पर जिनके माध्यम से दशकों से पेरिस को जानता था और जिनके साथ रहने के लिए वहां आता रहा हूं वे नहीं हैं तो पेरिस अब वही नहीं है. रज़ाहीन पेरिस बल्कि रज़ाहीन जीवन भी कठिन हो गया है. उन्होंने यहां रहते शायद ही कभी सोचा हो कि एक दिन वे मंडला में, अपनी वरेण्य नदी नर्मदा (जी) के पास उसकी मिट्टी में मिल जायेंगे. वहीं से चलकर वे वहीं वापस गये, भले यह वापसी लगभग 85 वर्ष बाद हो पायी.

हलकी ठंडक हो चली है. उन दिनों जब रज़ा यहां थे तो पहुंचने के पहले ही दिन पुस्तकों की अपनी मनपसंद दुकान ‘विलेज वायस’ चला जाता था जो सैं जर्में द प्रे के नज़दीक थी. अब दूकान भी नहीं रही. अंग्रेज़ी की पुस्तकें अब: द रिवोली और नात्रेदाम के पास शेक्सपीयर एंड कंपनी में ही मिलती हैं: कुछ अधिक दाम पर मिल जाती हैं यह गनीमत है. पेरिस का मेरे लिए अंग्रेज़ी पुस्तकों से यह संबंध थोड़ा असामान्य है. मेरी तरह शायद ही कोई पेरिस अंग्रेज़ी पुस्तकें खरीदने आता होगा. यह और बात है कि दशकों पहले जेम्स जायस, अर्नेस्ट हेंमिग्वे, अनैस निन, गर्टूड स्‍टाइन जैसे अंग्रेज़ी के लेखक बरसों यहां रहे थे. अब भी होंगे जिनका हमें पता नहीं.

फ्रेंच समाज में अंग्रेज़ी की घुसपैठ इस बीच बढ़ी है. किसी दुकान में आप अंग्रेज़ी में कोई चीज़ मांगें तो वहां वह आपको दे दी जायेगी हालांकि उसका उत्तर अब भी फ्रेंच में ही मिलेगा. अपनी भाषा पर यह समाज उचित ही अभिमान करता और उसे प्रेम करता है. अमरीकी बाज़ारू चैनलों का चलन भी, इस बीच बढ़ गया है. मैक्डॉनल्ड आदि कई खुल गये हैं. अमरीकी अख़बार भी मिल जाते हैं हालांकि अंग्रेज़ी अख़बार भी मिलते हैं. फ्रांस की आर्थिकी इस समय, कई बरसों से, मंदगति है. उसकी विकासदर हमारी विकासदर से, कई बरसों से, काफ़ी कम रही है. पर यहां की दृश्य समृद्धि और सक्रियता में कोई कमी हुई हो ऐसा नहीं लगता.

बरसों से फ्रेंच कविता भी शिथिल पड़ गयी लगती है. उसके नये कवियों का आसानी से अता-पता नहीं चलता. पुराने कवियों के नये-नये अंग्रेज़ी अनुवाद खोजने पर मिल जाते हैं. हो सकता है कि फ्रांस में आधुनिकता का स्वर्णयुग समाप्त हो गया हो. वैसे भी पेरिस आधुनिक कला की विश्वराजधानी होने का दर्ज़ा कई दशकों पहले गंवा चुका है. अब वह न्यूयॉर्क है. लेकिन यही वह शहर है जहां सड़कों, स्टेशनों के, मुहल्लों में से कुछ के नाम चिंतकों, लेखकों पर हैं.

पेरिस का अब भी बड़ा आकर्षण उसके बड़े और पुराने कला-संग्रहालयों की वजह से है. लूव्र, पाम्पिदू सेंटर आदि में दर्शकों की अपार भीड़ हर दिन जुड़ती है जिनमें बहुसंख्यक पर्यटक होते हैं. पेरिस के लग्जे़म्बर्ग पार्क आदि भी मनोरम है. वहां बाज़ार की धूमधाम से अलग बैठकर सुस्ताना स्फूर्ति देता है. मैं पहली बार पेरिस 1974 की जनवरी में आया था. तब रज़ा से संपर्क नहीं हुआ था हालांकि वे यहीं रहते थे. 1980 से जब भी आया उनके रहते पेरिस तो उन्हीं के साथ ठहरा. अब रिपब्लीक के पास एक होटेल में हूं.

आज की कविता का स्थापत्य अज्ञेय जैसा अधिक है मुक्तिबोध जैसा कम

अनुभव और अभिव्यक्ति के बीच दूरी, फांक या तनाव होते हैं, यह सभी जानते हैं. यह भी कि कई बार ऐसा अनुभव होता है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता: अकथ की स्थिति. यह भी होता है कि जब हम अपने किसी अनुभव को व्यक्त करने चलते हैं तो वह बदल जाता है, वही नहीं रहता जो तब था जब हमने उसे व्यक्त करने की शुरूआत की थी. इस प्रक्रिया में अनुभव का रूपांतरण हो जाता है, उसमें ऐसे कई अनुभवों की अनुगूंज जुड़ जाती है जो कि अनुभव करते समय नहीं थी या कम से कम स्पष्ट नहीं थी.

यह भी होता है कि भाषा में चरितार्थ होते ही अनुभव के प्रति हम कुछ वस्तुनिष्ठ हो जाते हैं और उसमें कुछ ज़रूरी लगती कतर-ब्यौंत कर देते हैं. कई बार अनुभव में जो टूट-फूट या अराजकता अकसर होती है उसे भाषा दुरुस्त कर देती है. टूट-फूट का अनुभव अनिवार्यतः अभिव्यक्ति की टूट-फूट में व्यक्त हो यह ज़रूरी नहीं होता.

कई बार मुक्तिबोध की कविता के विख्यात ऊबड़-खाबड़पन को सोचते हुए लगता है कि उनके यहां टूट-फूट का अनुभव या यथार्थ भाषा से इस प्रकार दुरुस्त किये जाने से बचता गया. उनकी कविता का स्थापत्य उनके यथार्थ के स्थापत्य का प्रामाणिक समतुल्य हो गया और उन्होंने सचेत होकर भाषा को उस टूटफूटपन को ठीकठाक कर अधिक ग्राह्य बनाने की इजाज़त नहीं दी. शायद राजकमल चौधरी के यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ. लेकिन अज्ञेय के यहां टूटफूट का अनुभव परिष्कृत-संशोधित होकर ही व्यक्त हो पाया.

ख़ासकर मुक्तिबोध की कविताएं अधूरी लगती हैं: उनका विधिवत् या तर्कसंगत समापन नहीं हो पाता. मुक्तिबोध को एक लेखक के रूप में अपनी रचनाएं समाप्त करने का हुनर आता था. लेकिन कविता में ऐसा समापन उन्हें अनावश्यक, संभवतः अवांछनीय लगता था.

हमारा समय तो भयानक टूट-फूट का समय हैं उसमें जितना दिग्भ्रम, विकल्पहीनता, बिखराव आदि हैं वे कई बार अभूतपूर्व महसूस होते हैं. इस टूटे-बिखरे यथार्थ को व्यक्त करने के लिए युवा कविता का अधिकांश स्थापत्य अज्ञेय जैसा अधिक है, मुक्तिबोध जैसा कम. दोनों बड़े कवि थे और दोनों ही सार्थक होना चाहते थे. लेकिन अज्ञेय को संप्रेषणीय होने की भी आकांक्षा थी जबकि मुक्तिबोध को लगा था कि अपने यथार्थ के प्रति सच्चा होना ज़्यादा ज़रूरी है और उस सच्चेपन को बनाये रखने के लिए अगर संप्रेषणीयता की बलि देना पड़े तो वे उसके लिए तैयार थे.

हमें इन दिनों इसका ख़याल नहीं आता कि हिंदी के अधिकांश कवि, जिनमें आज के अधिकांश युवा भी शामिल हैं, अपने अनुभव की सचाई के लिए, असंप्रेषणीय हो जाने की हद तक जाने का जोखिम उठाने से अपने को रोकते-बरजते हैं. हममें से बहुत कम ने अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए हैं: हमारी राह मुक्तिबोध से अलग रही है, भले हम उनका कितना ही आदर, गुणगान करें.

पुस्तकालयों का काम केवल पुस्तकें उपलब्ध कराना नहीं है

मुख्य भारत में यह धारणा, दुर्भाग्य से, लोकप्रिय हो गयी है कि पुस्तकों की अब इंटरनेट, गूगल आदि के ज़माने में सीधी कोई उपयोगिता नहीं रह गयी है. शिथिल होते समुदाय-बोध से पुस्तकों का कोई संबंध हो सकता है यह प्रायः किसी को नहीं सूझता. इसके ठीक विपरीत अरुणाचल प्रदेश में एक केरलवासी सत्यनारायण मुंडेयूर ने, जिन्हें वहां के बच्चे ‘अंकल मूसा’ के नाम से जानते-पुकारते हैं, विवेकानंद केंद्र के माध्यम से पुस्तकालयों का एक जाल सा बिछा दिया है जो जिज्ञासा और ज्ञान के प्रसार के अलावा बच्चों में नये क़िस्म का समुदाय-बोध भी पैदा कर रहा है.

दिलचस्प यह है कि पुस्तकों का सबसे अधिक प्रभाव लड़कियों पर पड़ रहा है और उनमें बढ़ती हुई अधिकार-चेतना और निर्भीकता साफ़ देखी-पहचानी जा सकती है. प्रायः सभी पुस्तकालय स्कूलों में अवस्थित हैं और, सौभाग्य से, ऐसे अनेक प्रधान अध्यापक और अध्यापक हैं जो बच्चों को इन पुस्तकालयों का लाभ लेने के लिए लगातार प्रेरित करते रहते हैं. आगे बढ़ता भारत इसे कहा जा सकता है न कि चिकने-चुपड़े मॉलों और दूकानों में दमकते भारत को.

इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह दूरस्थ अरुणाचल प्रदेश के युवा छात्र-छात्राओं को यह अहसास करा रहा है कि वे भारत का पूरी तरह से हिस्सा है और भारत में, उसकी आधुनिकता और नियति में, उसकी प्रगति और सक्रियता में उनकी भी बराबर की भूमिका है. हालांकि व्यक्तियों का महत्व होता है, लेकिन ऐसा आंदोलन सिर्फ़ संयोगवश कुछ उद्यम और संवेदनशील व्यक्तियों के सुखद संयोग के बल पर टिकाऊ नहीं हो सकता. अंकल मूसा को, जो अब 65 वर्ष के हो चुके हैं और आंखों की कठिनाई से पीड़ित हैं, इसका तीख़ा-गहरा अहसास है. उनकी पूरी कोशिश इस समय यह है कि पुस्तकालयों को स्थानीय समाज अपना ले और उन्हें पोसे-बढ़ाये. उनके साधन सीमित हैं और ऐसे संस्थान बहुत नहीं हैं जो इतने दूर बसे अरुणाचल प्रदेश में कुछ करने को उत्साहित अनुभव करें.

‘सिविल सोसायटी’ नामक पत्रिका ने हमारा ध्यान इस अनोखे, सामान्य दिखते पर असाधारण काम करते, दाक्षिणात्य की ओर दिलाया है. यह उम्मीद की जा सकती है कि पूर्वोत्तर अंचल में ऐसे आंदोलन को बल और साधन देने लोग और संस्थाएं आगे आयेंगी. ऐसा ही प्रयत्न उपद्रव और संघर्षों की मार खाते कश्मीर में भी किया जाना चाहिये. गोलियों के बजाय पुस्तकें अधिक मनजीत सिद्ध हो सकती हैं.