मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश का विवाद सुलझ गया है. सोमवार को दरगाह ट्रस्ट्र ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामा देकर बताया है कि वह बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश मानेगा और मजार तक महिलाओं को जाने से नहीं रोकेगा. इससे पहले सात अक्टूबर को जस्टिस टीएस ठाकुर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे को 17 अक्टूबर तक बढ़ा दिया था. एएनआई के मुताबिक दरगाह प्रबंधन ने कोर्ट से इस मामले में प्रगतिशील कदम उठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से दो हफ्ते का समय मांगा था.

इससे पहले दरगाह प्रबंधन ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर असंतोष जताया था और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. बॉम्बे हाईकोर्ट ने अगस्त में मजार तक महिलाओं के जाने पर पाबंदी को असंवैधानिक बताकर इसे इसे खारिज कर दिया था. जस्टिस वीएम कनाडे और जस्टिस रेवती मोहिते डेरे की बेंच ने कहा था कि यह रोक संविधान के अनुच्छेद-14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद-15 (लिंग, जाति, धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद-19ए (भारत में कहीं भी जाने की आजादी) और अनुच्छेद-25 (धार्मिक मान्यता और आस्था की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है.

बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की दो सदस्यों की जनहित याचिका पर आया था. याचिका में कहा गया था कि दरगाह ट्रस्ट के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिससे वह किसी नागरिक या समूह की धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगा सके.

हाजी अली दरगाह में 2011 तक महिलाओं के आने-जाने को लेकर कोई भेदभाव नहीं था, वे मजार तक जा सकती थीं. लेकिन, मार्च 2011 को दरगाह ट्रस्ट ने इस्लामिक परंपराओं का हवाला देकर महिलाओं के मजार तक जाने पर रोक लगा दी. हाईकोर्ट में ट्रस्ट ने दलील दी कि इस्लाम में महिलाओं का मुस्लिम संतों की मजार के पास जाना पाप माना गया है. हालांकि, कोर्ट ने इसे सही नहीं माना था.

इससे पहले अप्रैल में बॉम्बे हाईकोर्ट ने शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के पूजा करने पर लगी पाबंदी को गलत बताया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि जहां भी पुरुषों को प्रवेश करने का अधिकार है, वहां महिलाएं जा सकती हैं. हाईकोर्ट ने कहा था कि महिलाओं को प्रवेश देने से रोकने पर छह साल की सजा हो सकती है.