कई दिनों से जारी अटकलों पर विराम लगाते हुए उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी बीते गुरूवार को भाजपा में शामिल हो गईं. दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता लेते हुए बहुगुणा ने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक पर राहुल गांधी के ‘खून की दलाली’ वाले बयान से आहत होकर उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया है. उनका कहना था कि भाजपा की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है और सेना पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. इसके अलावा उन्होंने राहुल के कमजोर प्रबंधन और बाहरी व्यक्ति प्रशांत किशोर को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपने को भी अपने अलगाव का कारण बताया.

हालांकि, रीता बहुगुणा औपचारिक तौर पर भले ही ये बातें कह रही हों लेकिन उनके कांग्रेस से मोहभंग होने की असल वजहें राजनीतिक हलकों में किसी से छिपी नहीं हैं. उनके करीबी नेताओं के मुताबिक रीता काफी समय से कांग्रेस में हो रही अपनी अनदेखी से नाराज थीं. इन लोगों का कहना है कि रीता की नाराजगी गलत भी नहीं थी: उन्हें लखनऊ से लेकर दिल्ली तक उनके जुझारूपन के लिए जाना जाता था. प्रदेश में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न रही हो वे हमेशा मोर्चा लेने में आगे रहीं. अपने इसी जुझारूपन की कीमत उन्हें कई बार चुकानी पड़ी. मायावती की पिछली सरकार में उनका घर तक जला दिया गया था. बताया जाता है कि रीता ने कई चुनाव में हारने के बाद भी हार नहीं मानी और लखनऊ कैंट से पिछला चुनाव जीतकर अपनी ताकत का अंदाजा भी कांग्रेस हाईकमान को करा दिया था.

बताया जाता है कि विजय बहुगुणा की बगावत के समय रीता को उन्हें मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन वह इसमें असफल रहीं, जिसके बाद से कांग्रेस में उनकी अनदेखी हो रही थी.

जानकारों की मानें तो रीता की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह तो यही थी कि जब पार्टी ब्राह्मणों पर फोकस कर रही है तब ब्राह्मण होने के बावजूद उन्हें तरजीह नहीं दी गई. उलटा दिल्ली से लाकर पंजाबी परिवार में जन्मी शीला दीक्षित को आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा बना दिया गया. इसके अलावा पार्टी में ही उनके प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले प्रमोद तिवारी को उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए बनी संयोजन समिति का अध्यक्ष बना दिया गया. जबकि, तिवारी पर अप्रत्यक्ष रूप से कई बार सपा और बसपा की मदद करने के आरोप भी लगते रहे, यहां तक कि वे राज्यसभा भी सपा की मदद से पहुंचे.

कहा जा रहा है कि ऐसे में रीता बहुगुणा को लगने लगा कि पार्टी में उनकी अनदेखी हो रही है. यह भी माना जा रहा है कि कांग्रेस में रीता के साथ ऐसा व्यवहार उनके भाई विजय बहुगुणा के भाजपा में शामिल होने के बाद से हो रहा था. बताया जाता है कि हाईकमान ने विजय बहुगुणा को मनाने का काम रीता को सौंपा था लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हो पाईं.

कांग्रेस से बगावत का पारिवारिक इतिहास

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर रहीं रीता बहुगुणा के परिवार का इतिहास ही कांग्रेस से बगावत करने वाला रहा है. यह सिलसिला उनके पिता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा से शुरू हुआ था जिसे उनके भाई विजय बहुगुणा और फिर उन्होंने आगे बढ़ाया है. उनके पिता ने अपने राजनीतिक सफर में दो बार कांग्रेस का दामन छोड़ा था. आपातकाल के दौरान 1977 में हेमवती नंदन बहुगुणा ने जगजीवन राम के साथ मिलकर इंदिरा गांधी के विरोध में 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' नामक मोर्चा बनाया था. इसके बाद कांग्रेस में वापस आकर 1980 में उन्होंने गढ़वाल से चुनाव जीता. लेकिन एक बार फिर इंदिरा गांधी से मनमुटाव होने के बाद पार्टी छोड़ दी और 1982 में हुए उपचुनाव में जीत दर्ज कर इंदिरा को अपनी ताकत का अंदाजा भी करा दिया.

2016 के मई में रीता बहुगुणा के भाई विजय बहुगुणा ने उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने और हरीश रावत से लगातार टकराव के बाद भाजपा का दामन थाम लिया. हालांकि, जानकार कहते हैं हेमवंती नंदन बहुगुणा और उनके बेटे-बेटी के कांग्रेस छोड़ने में बहुत बड़ा फर्क है. इनके मुताबिक हेमवती नंदन ने जब भी कांग्रेस छोड़ी, उनके साथ बड़ा जनसमर्थन था और इसे उन्होंने साबित भी किया था. लेकिन, विजय और रीता बहुगुणा के मामले में ऐसा नहीं है. जानकारों के मुताबिक विजय बहुगुणा के समर्थन को इसी बात से समझा जा सकता है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते हुए उपचुनाव में वे अपने पुत्र को ही नहीं जितवा पाए थे.

भाजपा को कितना फायदा

रीता के भाजपा में शामिल होने से भाजपा को छोटे ही सही लेकिन कई फायदों की उम्मीद है. लखनऊ, इलाहाबाद और इसके आसपास के जिलों में उत्तराखंड के वोटरों की अच्छी तादाद है. भाजपा को लगता है कि पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन के पुत्र-पुत्रियों को पार्टी में लाकर वह इनका वोट हासिल करने में कामयाब होगी. साथ ही भाजपा की कोशिश रीता के जरिए कांग्रेस के ब्राह्मण कार्ड की हवा निकालने की भी रहेगी.

आगामी चुनावों में भाजपा अपना मुख्य प्रतिद्वंदी बसपा को मानती है. पिछले दिनों मायावती के बारे में अपशब्द कहने वाले दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को भाजपा ने राज्य महिला बिग्रेड का अध्यक्ष बनाया है. भाजपा नेताओं का मानना है कि मायावती द्वारा प्रताड़ित की गई ऐसी दो महिलाओं - रीता बहुगुणा और स्वाति सिंह - को साथ लाकर जो बोलने की कला में निपुण हैं, वह मायावती के खिलाफ मोर्चेबंदी को और मजबूत कर सकती है.