समाजवादी पार्टी में सब कुछ ठीकठाक के सूत्रवाक्य के बीच के गृहकलह के सबसे ताजा घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ वकील की टिप्पणी है कि ‘फिलहाल दिखते तो सभी साथ हैं मगर एक साथ रह कर भी सब एक-दूसरे के कपड़े उतार रहे हैं और सच कहा जाए तो समाजवाद के इस हम्माम में फिलहाल सब नंगे हो रहे हैं.’

गिले-शिकवे तो बहुत पुराने थे मगर तीन चार महीने से उनको धार दी जाने लगी थी. आजादी के समारोह के एक दिन पहले शिवपाल यादव ने मैनपुरी में पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं व विधायकों पर जमीनें हथियाने के आरोप लगाए. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी और सरकार में उनकी सुनी नहीं जा रही और अगर ऐसा ही चलता रहा तो वे इस्तीफा दे देंगे. इसके ठीक अगले दिन समाजवादी पार्टी के दफ्तर में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में अखिलेश की मौजूदगी में मुलायम सिंह यादव ने भी शिवपाल की शिकायत को अपनी आवाज दे दी, यह कह कर कि ‘अगर मैं और शिवपाल अलग हो गए तो सरकार के साथ पार्टी का कोई भी खड़ा नहीं मिलेगा.’

अखिलेश के लिए यह बड़े स्पष्ट संकेत थे कि उनके कामकाज से चाचा और पिता कतई संतुष्ट नहीं हैं. लेकिन इन संकेतों को समझने में उनसे शायद बड़ी चूक हुई और वे स्थितियों को बिगड़ने से बचाने में चूक पर चूक करते चले गए. नहीं तो परिवार की राजनीति में अखिलेश की राहें बहुत मुश्किल नहीं थीं. उन्हे सिर्फ अपने पिता को साधना था और वह भी उस पिता को जिसने साढ़े चार साल पहले तमाम वरिष्ठ सहयोगियों केे विरोध को दरकिनार कर अखिलेश को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया था. तब मुलायम सिंह यादव ने एक तरह से यह साफ कर दिया था कि समाजवादी पार्टी में उनके उत्तराधिकारी अखिलेश यादव ही हैं, कोई दूसरा नहीं.

अखिलेश का चाणक्य बनने का प्रयास करते-करते इधर-उधर के फेर में रामगोपाल यह भूल गए कि जिन ‘उधर वालों' को नंगा करने की कोशिश वे कर रहे हैं उसमें शिवपाल और मुलायम सिंह यादव भी शामिल हैं

लेकिन साढ़े चार साल बाद पार्टी में मची मारामारी को खत्म कराने के लिए बुलाई बैठक में मुलायम सिंह को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा’, ये जो अखिलेश भैया, अखिलेश भैया कर रहे हैं, ये क्या जानें कि हमने कितनी लड़ाई लड़ी है. जो आलोचना नहीं सुन सकता वो नेता नहीं हो सकता. तुम लोगों का दिमाग खराब हो गया है. अभी मैं थका नहीं हूं. ऐसा नहीं है कि हमारे साथ नौजवान नहीं हैं. अगर मैने इशारा कर दिया तो खदेड़ दिया जाएगा. तुम लोग हवा में घूम रहे हो. जमीन के नेता नहीं हो. शिवपाल जनता के बीच का नेता है.’

मुलायम ने इससे पहले सीधे अखिलेश को लक्ष्य करके यह भी कहा’ कुर्सी मिलते ही दिमाग खराब हो गया है’ और अखिलेश को चाचा के गले मिलने का आदेश देने से पहले वे यह कहना भी नहीं भूले कि ‘जिन्होंने धोखा दिया है वो सारे नंगे हो जाएंगे. सब नंगे हो जाओगे अगर मैं अपनी पर आ गया तो.’

लेकिन मुलायम की इस धमकी से पहले ही दो-चार दिन से जो पत्र युद्ध समाजवादी पार्टी के खेमों के बीच चल रहा है उसने ही कइयों को नंगा कर दिया है. रामगोपाल यादव की दूसरी चिट्ठी की कुछ पक्तियां बताती हैं कि ‘माननीय मुख्यमंत्री के साथ वे लोग हैं जिन्होने पार्टी के लिए खून बहाया, अपमान सहा. उधर वे लोग हैं जिन्होने हजारों करोड़ रूपया कमाया, व्यभिचार किया और सत्ता का दुरूपयोग किया.’

अखिलेश का चाणक्य बनने का प्रयास करते-करते इधर-उधर के फेर में रामगोपाल यह भूल गए कि जिन ‘उधर वालों' को नंगा करने की कोशिश वे कर रहे हैं उसमें शिवपाल और मुलायम सिंह यादव भी शामिल हैं. इसलिए बात बिगड़ी और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने ‘मुलायम सिंह के आदेशानुसार’ पार्टी के प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव राम गोपाल यादव को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया. साथ ही शिवपाल ने रामगोपाल के कारनामों का खुलासा करते हुए एक पत्र भी जारी किया जिसमें कहा गया था कि ‘वे ये सब इसलिए कर रहे क्योंकि उनके पुत्र अक्षय यादव एवं पुत्रवधू यादव सिंह घोटाले में फंसे हुए हैं...वे भ्रष्टाचारियों से मिले हुए हैं...उन्होने अपनी मेधा का प्रयोग केवल षडयंत्र करने और गिरोह बनाने में किया.’

जहां समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर अलग-अलग गुटों के लड़ाके एक दूसरे से झड़प कर रहे थे तो अंदर हॉल में मुलायम सिंह के ठीक सामने चाचा-भतीजे के बीच कहासुनी और माइक को लेकर छीना-झपटी हो रही थी

शिवपाल ने रामगोपाल को लिखे निष्कासन के पत्र में भी उन्हें’ पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने, भ्रष्टाचारियों, दलालों, गलत काम में लिप्त लोगों तथा दूसरों की जमीन कब्जाने वालों को संरक्षण देने’ का आरोपी बनाया. पिता पर लगे इन आरोपों का जवाब रामगोपाल यादव के सांसद पुत्र अक्षय यादव ने भी पत्र लिख कर दिया और शिवपाल पर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री पद जाने की उनकी महत्वाकांक्षाओं का विरोध करने पर ‘वे मेरे पिता व अखिलेश यादव से नाराज रहने लगे. क्योंकि मेरे पिता उनकी महत्वाकांक्षा के बीच आ गए थे. इसके बाद वे हमेशा साजिश में लगे रहे. किसी तरह वह मुझे, मेरे पिता व अखिलेश यादव को बर्बाद कर सकें, उसी में लगे रहे और उसी के तहत साजिश का दौर चालू हो गया’. पत्र में यह आरोप भी लगाया गया है कि ‘क्या उनके पुत्र का रिसेप्शन श्री अमर सिंह व बीजेपी के एक सांसद द्वारा नहीं किया गया?’

पत्रों के इस सिलसिले में एमएलसी उदयवीर सिंह और आशु मलिक के पत्रों में भी खूब कीचड़ उछाली गई थी. लेकिन सुलह समझौते की बैठक में मुलायम ने यह कह कर कि ‘अगर अमर सिंह साथ नहीं होते तो मैं जेल में होता’ और शिवपाल ने यह कह कर कि ‘2003 में हमारी सरकार अमर सिंह की वजह से बनी थी’, रही-सही कसर भी निकाल दी और बता दिया कि समाजवादी पार्टी की राजनीति की दिशा क्या है और उसका भ्रष्टाचार से कैसा रिश्ता है.

सुलह समझौते की मुलायम की भरपूर कोशिश में यह भी देखने को मिला कि जहां समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर अलग-अलग गुटों के लड़ाके एक दूसरे से झड़प कर रहे थे और खून-खराबे पर उतारू थे तो अंदर हॉल में मुलायम सिंह के ठीक सामने चाचा-भतीजे के बीच कहासुनी और माइक को लेकर छीना-झपटी हो रही थी. फिलहाल सबको बेआबरू करने के इस खेल में एक और युद्धविराम दिख रहा है मगर यह बारूद के ढेर में सुलगी चिंगारी को राख की पतली पर्त से ढांकने का प्रयास भर है. बारूद तो भीतर ही भीतर सुलग रहा है. यह भी तय है कि समाजवादी पार्टी के इस हम्माम की सच्चाई अभी आने वाले दिनों में और खुलकर सामने आएगी. मगर राजनीति को संकेतों का खेल मानने वाले आरपार की इस लड़ाई के बीच अखिलेश यादव के भीमकाय पहलवान खली को समय देने और उसके साथ तस्वीरें खिंचवाने को इस बात का संकेत मान रहे हैं कि पहलवान पिता से आरपार की निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार अखिलेश शायद यह कहना चाहते हैं कि ‘मेरे पास खली है.’