मुलायम सिंह यादव एक ऐसा नेता, जो पिछले तीन दशक से भारतीय राजनीति के केंद्र के आसपास ही रहा. इन तीन दशकों में देश में कैसी भी राजनीतिक परिस्थितियां क्यों न बनी हों, लेकिन मुलायम को कभी कोई अनदेखा नहीं कर पाया. पहलवान से नेता बने मुलायम के ये राजनीतिक दांव-पेंच ही थे कि उन्होंने कभी केंद्र तो कभी राज्य पर अपनी पकड़ बनाए रखी. अगर पार्टी के अंदर अनुशासन की बात करें तो मुलायम के इशारे के बिना समाजवादी पार्टी में एक पत्ता भी नहीं हिलता था. देखा जाए तो मुलायम और मायावती जैसे नेताओं से ही ‘पार्टी सुप्रीमो’ जैसे शब्द चलन में आये.
लेकिन, पिछले कुछ महीनों में सपा में कुछ ऐसे हालात बन गए कि परिवार और पार्टी के छोटे-छोटे नेता भी मुलायम को चिट्ठी लिखकर राह दिखाने लगे हैं. उनपर तमाम आरोप भी लगाये जा रहे हैं. भले ही इन चिठ्ठियों को लिखने वालों को पार्टी से निकाल दिया गया हो लेकिन इनमें इस्तेमाल की जा रही भाषा से साफ़ है कि समाजवादी पार्टी पर मुलायम का एकाधिकार और दबदबा अब बीते समय की बात हो चुकी है. जानकार मानते हैं कि सियासी विरोधियों को मात देने में माहिर सपा मुखिया को इतना कमजोर और बेबस पहले कभी नहीं देखा गया.
चिट्ठियां -
बीते 14 अक्टूबर को मुलायम ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि यूपी विधानसभा चुनाव के बाद ही सपा की ओर से मुख्यमंत्री का चयन किया जाएगा. इसके अगले ही दिन मुलायम के चचेरे भाई रामगोपाल ने एक खत लिखकर उनके इस फैसले का विरोध किया. उनका कहना था कि इस समय अखिलेश निर्विवाद रूप से प्रदेश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और पार्टी तभी चुनाव जीतेगी जब पार्टी का चेहरा अखिलेश होंगे. इस समय जो भी फैसले लिए जा रहे हैं उनसे कार्यकर्ता नाराज हैं.
रामगोपाल ने मुलायम को चेतावनी देते हुए कहा, ‘आप एक बात याद रखें कि जो जनता आपकी पूजा करती है, वही जनता पार्टी के पतन के लिए आपको और केवल आपको दोषी ठहराएगी. इतिहास बहुत निष्ठुर होता है, ये किसी को बख्शता नहीं.’
मुलायम सिंह ने पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं से यह तक कह दिया कि कभी सोचा नहीं था कि ये दिन भी देखने पड़ेंगे. जो आरोप कभी विपक्षी तक मुझ पर नहीं लगा पाए, आज अपनों ने ही लगा दिए
इस चिट्ठी ने मुलायम सिंह सहित कइयों को चौंका दिया. इसके बाद मुलायम दिल्ली में रामगोपाल के घर पहुंचे जहां दोनों के बीच करीब तीन घंटे बात हुई. माना जाता है कि इस चिट्ठी की वजह से ही अगले दिन मुलायम ने अखिलेश को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए जाने की घोषणा कर दी. हालांकि, इस चिट्ठी पर ज्यादा बवाल नहीं हुआ, क्योंकि इसे भाइयों के बीच का मसला समझ लिया गया और फिर मुलायम ने भी इस चिट्ठी पर कोई नाराजगी जाहिर नहीं की. लेकिन, इससे एक बात और सामने आ गई कि भाइयों के बीच सबकुछ सहज नहीं है, वरना एक भाई को दूसरे से अपनी बात कहने के लिए चिट्ठी नहीं लिखनी पडती.
रामगोपाल की इस चिट्ठी पर मुलायम की कोई नाराजगी भरी प्रतिक्रिया सामने नहीं आने से शायद पार्टी के अन्य नेताओं के भी हौसले बढ़ गए. इसके बाद एटा-मैनपुरी सीट से सपा एमएलसी उदयवीर सिंह ने मुलायम पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी के सार्वजनिक होने के बाद सपा में खलबली मच गई. इसमें उदयवीर ने सपा मुखिया पर अखिलेश के साथ सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया. साथ ही उन्होंने सपा में छिड़े इस विवाद के लिए मुलायम की दूसरी पत्नी यानी अखिलेश की सौतेली मां को जिम्मेदार ठहराया.
एमएलसी के अनुसार घर में ही अखिलेश विरोधी एक गुट है जिसमें उनकी सौतेली मां, उनके सौतेले भाई और शिवपाल सिंह यादव शामिल हैं. और इस गुट का नेतृत्व अमर सिंह करते हैं. पत्र में एमएलसी ने सपा मुखिया को सलाह देते हुए उनसे अपील की कि वे अखिलेश को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर खुद पार्टी के संरक्षक की भूमिका निभाएं, क्योंकि सपा का भविष्य केवल अखिलेश के हाथों में ही सुरक्षित रह सकेगा.
पार्टी मुखिया और उनके परिवार पर एक पार्टी कार्यकर्ता के द्वारा लगाए गए इतने बड़े आरोपों से सभी सकते में थे. बताया जाता है कि इस चिट्ठी से मुलायम सिंह यादव बहुत दुखी हुए, उन्होंने पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं से यह तक कह दिया कि कभी सोचा नहीं था कि ये दिन भी देखने पड़ेंगे. जो आरोप कभी विपक्षी तक मुझ पर नहीं लगा पाए, आज अपनों ने ही लगा दिए.
बीते रविवार को जब शिवपाल यादव ने रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाला तो एक बार फिर रामगोपाल ने एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने मुलायम सिंह यादव को आसुरी शक्तियों से घिरा हुए बताया
हालांकि, इसके बाद पार्टी ने तत्काल प्रभाव से उदयवीर को पार्टी से निष्कासित कर दिया. लेकिन, इस चिट्ठी की भाषा और उस पर आई मुलायम सिंह की प्रतिक्रिया ने पार्टी पर उनकी ढीली होती पकड़ और उनकी बेबसी को कहीं न कहीं जगजाहिर कर दिया.
अखिलेश कैंप की ओर से लगातार आ रही इन चिठ्ठियों का जवाब देने के लिए शिवपाल कैंप की ओर से एमएलसी आशु मलिक ने मोर्चा संभाला. उन्होंने भी मुलायम सिंह को एक पत्र लिखा, ‘आज मैं बहुत दुखी हूं, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि कुछ लोग समाजवाद के मसीहा, अवाम के दिलों की धड़कन, देश के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान कर देने वाले माननीय मुलायम सिंह पर उंगली उठा रहे हैं. इतिहास रचने वाले इस महापुरुष को ताने दिए जा रहे हैं... माननीय नेता जी और माननीय अखिलेश जी दोनों एक-दूसरे को कितना प्यार और सम्मान करते हैं ये इन लोगों को नहीं पता है.’
आशु मलिक ने राम गोपाल और उदयवीर पर निशाना साधते हुए लिखा, ‘यह सब चापलूसी हो रही है. जो लोग बार-बार चिट्ठियां लिखकर नेताजी को नसीहतें दे रहे हैं उनकी हैसियत 500 वोटों की भी नहीं है. आज ये लोग जो भी कुछ हैं नेताजी की बदौलत है और हम सब का सम्मान तभी तक बरकरार है जब तक हमारे नेताओं का सम्मान बरकरार है.’
आशु मलिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के मुस्लिम चेहरे के रूप में उभरे हैं. उन्हें पार्टी ने 2014 में एमएलसी बनाया है. दादरी में अख़लाक़ के परिवार को मुख्यमंत्री से मिलवाने से लेकर अन्य कई मामलों को सुलझवाने में इनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है. एक ओर जहां ये शिवपाल और मुलायम के नजदीकी माने जाते हैं वहीं आजम खान से इनका शीतयुद्ध भी कई बार पार्टी में चर्चा का विषय रहा है.
इसके बाद बीते रविवार को जब शिवपाल यादव ने रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाला तो एक बार फिर रामगोपाल ने एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने मुलायम सिंह यादव को आसुरी शक्तियों से घिरा हुए बताया और सभी से इस संकट में अखिलेश यादव की मदद करने का आवाहन किया. उधर, अपने और अपने पिता पर लगे आरोपों से आहत रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव ने भी पिता की ओर से मोर्चा संभालते हुए शिवपाल के खिलाफ एक पत्र लिख दिया.
'मुलायम ने पहले खुद मुख्यमंत्री बनाकर अखिलेश को एक बड़ा नेता बनाया और जब साढ़े चार साल के शासन में उनकी अपनी पहचान और कार्यकर्ताओं का उनपर भरोसा बन गया, तो मुलायम ही उनका विरोध करने पर उतारू हो गए'
इस पत्र में अक्षय ने कई बड़े खुलासे किए, उन्होंने लिखा कि शिवपाल हमेशा से अखिलेश यादव का विरोध करते रहे हैं. साल 2012 में जब मुलायम ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही थी तो शिवपाल ने इसका विरोध किया था और मंत्री पद की शपथ तक लेने से इनकार कर दिया था. अक्षय के मुताबिक, उस समय उनके पिता ने अखिलेश का साथ दिया था और तब से शिवपाल यादव उनके पिता से नाराज रहने लगे.
राजनीति के जानकार बताते हैं कि इससे पहले कभी भी सपा में किसी कार्यकर्ता की मुलायम या उनके करीबी किसी नेता के बारे में ऐसा कहने-लिखने की हिम्मत नहीं हुई. ये जानकार इन चिट्ठियों के लिखे जाने या कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता का कारण भी मुलायम को ही मानते हैं. इनका कहना है कि मुलायम ने पहले खुद मुख्यमंत्री बनाकर अखिलेश को एक बड़ा नेता बनाया और जब साढ़े चार साल के शासन में उनकी अपनी पहचान और कार्यकर्ताओं का उनपर भरोसा बन गये, तो मुलायम ही उनका विरोध करने पर उतारू हो गए.
जिस समय अखिलेश यादव को तमाम सर्वेक्षणों में बेहतर मुख्यमंत्री बताया जा रहा है और उन्हें मायावती को कड़ी टक्कर देते दिखाया जा रहा है. ऐसे समय में सपा कार्यकर्ताओं को मुलायम के व्यवहार पर अचरज हो रहा है. उन्हें लगता है कि मुलायम पर या तो उम्र भारी पड़ रही है या अन्य लोगों के बहकावे में आकर वे अखिलेश के साथ ऐसा कर रहे हैं. शायद यही कारण है कि चिट्ठियां लिखे जाने के अलावा भी सोमवार को हुई संयुक्त बैठक में मुलायम के मंच पर मौजूद रहते हुए पार्टी विधायकों ने अखिलेश के पक्ष में और शिवपाल के विरोध में जमकर नारेबाजी की.
जानकार कहते हैं कि सपा की इस कलह का अंत चाहे जो भी हो, लेकिन इसने मुलायम के दौर के अंत की पटकथा लिख दी है. और यह भी दिखा दिया है कि मुलायम की अपनी पार्टी पर पकड़ धीरे-धीरे खत्म हो रही है. पहलवानी के खेल में बाजी वही पहलवान जीतता है जो खुद को बचाते हुए सामने वाले पर प्रहार करे. मुलायम अभी तक की अपनी राजनीति में ऐसा करने में सफल रहे हैं. उन्होंने पिछले तीन दशक की राजनीति में कई बार ऐसे दांव चले कि उन्हें देखने वालों को कहना पड़ा कि संकट से बचने की कला मुलायम से सीखनी चाहिए. लेकिन इस बार तो लगता है कि उन्हें खुद ही पुराने वाले मुलायम से काफी कुछ सीखने की जरूरत है!
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