निर्देशक : अजय देवगन

लेखक : संदीप श्रीवास्तव

कलाकार : अजय देवगन, एरिका कार, सायशा सहगल, वीर दास, एबिगेल इएम्स

रेटिंग : 2 / 5

बॉलीवुड में जिन्हें एक्शन फिल्में कहकर प्रचारित किया जाता है उनके साथ अक्सर दो दिक्कतें होती हैं. कई बार उनमें बढ़िया एक्शन तो होता है लेकिन, कहानी का क भी नहीं. इससे भी बुरी स्थिति तब होती है जब दोनों मामलों में उनका डब्बा गोल होता है. शिवाय इस मामले में थोड़ा सुकून देती है यह ठीक-ठाक एक्शन दृश्यों को एक कम बुरी सी लगने वाली स्क्रिप्ट में लपेटकर आपके सामने रखती है.

अगर फिल्म देखते हुए आपको मालूम हो कि फिल्म का निर्देशन अजय देवगन ने किया है तो फिल्म का शुरूआती हिस्सा आत्मालाप सरीखा लग सकता है. अविश्वसनीय एक्शन दृश्यों की भरमार के बीच हिमालय और बुल्गारिया के बर्फीले पहाड़ों के नजारे फिल्म में इतने अधिक लगने लगते हैं कि कई बार स्क्रीन पर जरुरत से ज्यादा उदासी फ़ैल जाती है और हमें थिएटर में ठंड महसूस होने लगती है.

ट्रेलर देखकर लगा था कि फिल्म अपने आप को लेकर भ्रमित है. फिल्म देखते हुए कई मोर्चों पर यह आशंका सही साबित होती भी नजर आती है. विशेषकर तब जब यह परंपरागत बॉलीवुड रिवाजों का पालन करने के चक्कर में पड़ जाती है. बाप-बेटी के मिलने के दृश्यों में बेटी का उसे भूल जाना और पिता का अस्पष्ट शब्दों में उसके कानों में किसी गीत या लोरी के बोल बोलना साठ के दशक की चीज है. इसे अब फिल्मकारों को भुला देना चाहिए. फिल्म ऐसी कई घिसी-पिटी बातें दोहराती है. यह एक्शन फिल्म उस वक्त इमोशनल एक्शन ड्रामा बन जाती है जब वक्त-बेवक्त अजय भावुक होकर मारपीट करते नजर आते हैं.

फिल्म में जिस बात को आप सबसे ज्यादा मिस करते हैं वह है शिव से जुड़ा दर्शन. फिल्म शुरुआत में ऐसा कुछ दिखाने का माहौल तो तैयार करती है लेकिन, नायक अपने एक्शन से सिर्फ शिव के तांडव जैसा कुछ भ्रम ही रचता है. फिल्म इस मामले में भी भ्रमित कही जा सकती है कि इसे रहस्य की टेक देकर गलत प्रचार दिया गया है जबकि यह बाप-बेटी के रिश्ते पर बनी एक कम बुरी फिल्म कही जा सकती है.

अभिनय के मामले में फिल्म थोड़े ज्यादा नंबर ले जाती है. हालांकि अजय देवगन के हिस्से सिर्फ चिंतित और क्रोधित होने के दृश्य आए हैं, उतने में भी वे अपनी दर्द भरी आंखों से प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह सफल हुए हैं. लेकिन एक्शन में वे उतना प्रभावित नहीं कर पाते.

अजय जैसे अभिनेता के बावजूद एरिका कार स्क्रीन पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने से नहीं चूकी हैं. उनकी खूबसूरती देखते हुए कोई भी उनकी तारीफ़ करने के लिए मजबूर हो सकता है. यह मज़बूरी तब और बढ़ जाती है जब यह पोलिश अभिनेत्री अच्छी सी हिंदी बोलती दिखाई देती है. जी हां, कैटरीना कैफ से कई गुना अच्छी.

फिल्म में एक और जोड़ी है वीर दास और साएशा सैगल की. वीर दास जहां फिल्म में सिर्फ शामिल दिखते हैं वहीं साएशा अपने ताजा अभिनय से प्रभावित करती हैं. साएशा सिर्फ 19 साल की हैं और बॉलीवुड ब्रांड का अगला चेहरा बनने की संभावनाओं की झलक दिखाती हैं.

इन सब पर भारी पड़ने वाली ब्रिटिश कलाकार एबिगेल इएम्स हैं. 13 की इस नन्ही अभिनेत्री ने एक गूंगी बच्ची की भूमिका में जान डाल दी है. एबिगेल हंसते हुए जितनी मासूम लगती हैं और डरते हुए जो भाव उनके चेहरे पर होते हैं, उन्हें देखने के बाद उनको सीने से लगा लेने का जी करता है.

आखिर में कह सकते हैं कि अजय देवगन अगर थोड़े और विश्वसनीय लगते, एरिका कार की भूमिका में थोड़ा और दम होता, फिल्म में बर्फ और पहाड़ थोड़े कम होते और बस जरा सा ध्यान फिल्म की स्क्रिप्ट पर और दे दिया जाता तो इसे एक अच्छी फिल्म कहा जा सकता था. अजय देवगन का यह ड्रीम प्रोजेक्ट हमें यह बताता है कि शिव के दर्शन का बस नाम लेकर हिमालय या बुल्गारिया के बर्फीले पहाड़ों पर घिसटने से बढ़िया एक्शन फिल्म नहीं बनती. खैर, इतने के बावजूद दीपावली की छुट्टी मिल ही गई है तो वक्त बिताने के लिए एक बार फिल्म देखी भी जा सकती है.