यह बात कई बार कहने को मन हुआ पर लिखने से बचता रहा. अब जब मुलायम घर फूंक तमाशा देखने के मूड में आए - बल्कि ले आए गए हैं - मुझे कहना चाहिए कि समाजवादी पार्टी ने अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार ली है.

अखिलेश की सरकार शानदार नहीं, तो बुरी भी नहीं चल रही थी. समग्र योजनाएं प्रत्यक्ष थीं. विकास के काम भी हो रहे थे. भ्रष्टाचार से तो अब किसी सरकार का बरी होना नामुमकिन-सा लगता है, मगर अखिलेश यादव पर भ्रष्टाचार या किसी घोटाले का सीधा आरोप शायद ही कभी लगा हो.

एक्सप्रेस-वे मायावती ने भी बनवाया, अखिलेश भी बनवा रहे हैं. मेट्रो रेल सहित ऐसी परियोजनाओं में अखिलेश की निजी दिलचस्पी ज़्यादा ज़ाहिर होती है. बिजली आपूर्ति जैसी चीज़ें पहले कभी लाइलाज एक ढर्रे पर चलती जाती थीं. अपने अनुभव से कह सकता हूं कि जब हमने उत्तरप्रदेश की सीमा में घर लिया, बिजली की भीषण समस्या अनुभव होती थी. वह घटती चली गई है.

लेकिन प्रदेश में अपराधों के हादसे शासन के माथे पर कलंक साबित हुए हैं. दंगों से निपटने में भी सरकार विफल रही. अखिलेश के ख़िलाफ़ यह पहलू चुनाव में मुखर रहेगा.

अखिलेश यादव की सरकार को चुनौती कांग्रेस या भाजपा से नहीं, सिर्फ़ बसपा से है. और यह अकारण नहीं है.

यों सरकार मायावती की भी ठीक ही चली. कभी मैंने लखनऊ से लौटकर लिखा था कि हज़रतगंज का हुलिया इस क़दर बदल कर रख दिया है कि एक बारगी लगता है मानो यूरोप की किसी सड़क पर निकल आए हों. लेकिन मायावती पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप सदा लगते रहे. निजी आरोप भी. आय से अधिक सम्पत्ति का मामला उन पर भी चला, मुलायम सिंह पर भी.

मायावती ने बेशर्मी का काम यह किया कि अपनी ही मूर्तियां बनवाकर लगवा दीं! लखनऊ से लेकर दिल्ली किनारे नॉएडा तक सरकारी ख़र्च पर क़ीमती पत्थर में हाथी जगह-जगह खड़े करवा दिए गए, जो दरअसल उनकी पार्टी का चुनाव-चिह्न है. फिर भी प्रशासन पर मायावती की पकड़ थी. अखिलेश यादव की सरकार को चुनौती कांग्रेस या भाजपा से नहीं, सिर्फ़ बसपा से है. और यह अकारण नहीं है.

प्रदेश में कांग्रेस के पुनर्वास के कोई आसार सामने नहीं. उनके अपने नेताओं में जीत का आत्मविश्वास नज़र नहीं आता. रीता बहुगुणा का भाजपा में जा मिलना पार्टी के लिए मामूली सदमा नहीं है. प्रशांत किशोर जैसे प्रबंधकों के भरोसे चुनाव की रणनीति बन सकती है, प्रचार नियोजित हो सकता है, मगर चुनाव लाज़िमी तौर पर जीता नहीं जा सकता.

भाजपा की स्थिति भी बहुत ख़ुशगवार नहीं है. मोदी का विकास का नारा अब नहीं चलेगा. पार्टी ने दंगों का इस्तेमाल करके देख लिया. गाय-मंदिर से सरकार झटकी नहीं जा सकेगी, इसका भी इलहाम पार्टी को लगता है हो चला है. ऐसा पाकिस्तान के ख़िलाफ़ की गई सर्जिकल कार्रवाई को चुनाव में भुनाने की खुली कोशिश से ज़ाहिर हुआ. जबकि प्रधानमंत्री ने ख़ुद इस संवेदनशील मामले में बड़बोलापन न बरतने की हिदायत दी थी.

लगता है भाजपा के रणनीतिकारों ने प्रधानमंत्री को समझा दिया है कि यूपी असम नहीं है. और दिल्ली और बिहार के सदमे से उत्तरप्रदेश ही उबार सकता है. हिंदुत्व के टोटके छोड़ युद्ध, पाकिस्तान और राष्ट्रवादी जुमलों को आज़माना होगा. और विजयादशमी को इस प्रयोग की थापना लखनऊ में हो गई, जब मोदी ख़ुद वहां गए.

हालांकि अभी यह मानना भी जल्दबाज़ी होगा कि सपा के हाथ से पूरी बाज़ी निकल गई है

उनके (और अन्य भाजपा नेताओं के) स्वागत में लगे पोस्टरों में वहां उन्हें “प्रतिशोधक” का ख़िताब दिया गया. मोदी ने भी रामलीला के मंच पर चढ़ गदा उठाई, सुदर्शन चक्र धारण किया और तीर चलाया (जो टेबल पर ही जा गिरा!). उन्होंने आतंकवाद के साथ युद्ध और (तुक मिलाने के लिए?) बुद्ध की बात की.

फिर भी भाजपा मुतमईन नहीं है. इसलिए समाजवादी पार्टी में फूट के षड्यंत्र में भाजपा की भूमिका होने का शुबहा खड़ा होता है. कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर अमर सिंह इस समर में यादवों का घर उजाड़ने में सिर्फ़ मोहरा निकलें, उनकी पीठ पर और लोग सवार हों.

हालांकि अभी यह मानना भी जल्दबाज़ी होगा कि सपा के हाथ से पूरी बाज़ी निकल गई है. अखिलेश अधिक मज़बूत होकर उभरे हैं. बढ़े आत्मविश्वास में उनकी छवि सुधरी है और पार्टी पर पकड़ बढ़ी है. पिता के दबदबे में मंत्रियों और अफ़सरों के चुनाव में जो समझौता करना पड़ता था, अब शायद वे न करें. उनके व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास उन्हें लोगों के ज़्यादा क़रीब ला सकता है. मुलायम के मुरीद मुसलिम मतदाता ‘मौलाना’ के बेटे को अपना विश्वास दे सकते हैं.

हां, भाजपा की विफलता और कांग्रेस की नाउम्मीदी के चलते केंद्र में आगे कभी अगर तीसरे मोरचे की सरकार की सम्भावना खड़ी हो तो उसमें मुलायम का पत्ता उत्तरप्रदेश की फदड़पंची में बिखर गया समझिए. बिहार चुनाव में पीठ दिखाकर (क्या वह भी भाजपा के इशारे पर अमर सिंह की कारस्तानी थी?) मुलायम पहले ही दौड़ में पिछड़ गए थे. अब - मौजूदा घटनाचक्र की बदौलत - नीतीश उस मोरचे पर बहुत आगे निकल गए हैं.