2016 के लिए साहित्य का नोबेल बॉब डिलन को मिलने पर काफी रोमांच का माहौल है. मुख्यधारा में काफी शोहरत पाने वाले कलाकारों को यह सम्मान मिलना दुर्लभ रहा है. और भले ही नोबेल पुरस्कार अक्सर अमेरिकी जीतते हों लेकिन, इससे पिछली बार साहित्य का नोबेल अमेरिकी टोनी मॉरिसन ने 1993 में जीता था. न्यूयॉर्क टाइम्स के शब्दों में, ‘पहली बार यह सम्मान किसी संगीतकार को मिला है.’

लेकिन बॉब डिलन की ही शैली में कहें तो ‘द टाइम्स दे आर मिसटेकन’ यानी यह कहना एक भूल है.

बांग्ला साहित्य का एक दिग्गज, जिसने शायद डिलन से ज्यादा ही गीत लिखे होंगे, इससे एक सदी पहले नोबेल जीत चुका है. असाधारण प्रतिभाशाली भारतीय कवि, चित्रकार और संगीतकार रवींद्रनाथ टैगोर ने 1913 में साहित्य का नोबेल जीता था.

साहित्य के लिए नोबेल जीतने वाले पहले (पहले गैर यूरोपीय भी) संगीतकार टैगोर कला और उसके प्रभाव की दीर्घजीविता के मामले में डिलन से टक्कर लेते हैं.

बंगाल के पुनर्जागरण का चेहरा

टैगोर का जन्म 1861 में बंगाल के एक समृद्ध परिवार में हुआ था. वे जीवन भर भारत के इस पूर्वी प्रांत में ही रहे जिसकी राजधानी कलकत्ता थी. फिल्म के अविष्कार से पहले जन्मे टैगोर ने आधुनिक दौर में भारत के उभार को बहुत करीब से महसूस किया. उनके काम के ज्यादातर हिस्से पर नए माध्यमों और दूसरी संस्कृतियों का प्रभाव है.

डिलन की तरह टैगोर भी एक बड़ी हद तक अपने शिक्षक खुद थे. ये दोनों ही हस्तियां अहिंसक सामाजिक परिवर्तन से जुड़ी रहीं. टैगोर भारत की आजादी के समर्थक और महात्मा गांधी के मित्र थे. डिलन की लिखाई और उनके संगीत का ज्यादातर हिस्सा 1960 के दशक के दौरान अमेरिका में नागरिक अधिकारों से लेकर वियतनाम युद्ध तक तमाम मुद्दों पर चले आंदोलनों (प्रोटेस्ट मूवमेंट) को समर्पित रहा. बहुमुखी प्रतिभा के धनी ये दोनों दिग्गज लेखक के साथ-साथ वे संगीतकार, विजुअल आर्टिस्ट और फिल्मकंपोजर भी रहे. (डिलन फिल्मकार भी हैं.)

नोबेल पुरस्कार से जुड़ी वेबसाइट लिखती है कि भले ही टैगोर ने कई तरह का लेखन किया लेकिन मुख्य रूप से वे एक कवि थे जिनकी कविता, नाटक, लघु कहानियां और उपन्यास विधा में 50 से ज्यादा किताबें प्रकाशित हुईं. इस वेबसाइट पर दर्ज टैगोर के परिचय में उनके संगीत का जिक्र अंतिम वाक्य में आता है जिसमें लिखा है कि इस कलाकार ने इसे कई गीत भी लिखे जिनका संगीत उन्होंने खुद दिया. ऐसा लगता है कि पुरस्कार देने वालों को काफी लोकप्रिय रहे उनके इस काम का ख्याल बाद में आया.

लेकिन 2000 गीतों के आंकड़े के साथ अकेले संगीत के मामले में ही टैगोर का काम असाधारण रूप से असरदार है. उनके कई गीत आज भी फिल्मों में इस्तेमाल होते हैं. इतना ही नहीं, उनके तीन गीत तो भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका के राष्ट्रगीत हैं. यह उपलब्धि किसी और के पास नहीं है.

आज गीतकार के रूप में टैगोर के महत्व पर कोई दोराय नहीं हो सकती. रवींद्र संगीत लिखकर यूट्यूब पर सर्च करें तो करीब दो लाख 34 हजार गीत मिलते हैं.

टैगोर भारत में संगीत के एक बड़े दिग्गज के रूप में जाने जाते रहे हैं लेकिन, पश्चिमी दुनिया में उनके काम के इस पहलू की खास चर्चा नहीं हुई. शायद यही वजह थी कि 1913 में उन्हें सम्मान देने वाली नोबेल समिति उनके संगीत से खास या जरा भी प्रभावित नहीं लगती. इसका अंदाजा समिति के तब के अध्यक्ष हैरल्ड येर्ने के पुरस्कार समारोह के मौके पर दिए गए भाषण से भी होता है. पुरस्कार की घोषणा में भी संगीत का जिक्र कहीं नहीं था. हालांकि यह बात भी नोट करने लायक है कि येर्ने के मुताबिक टैगोर के जिस काम ने खासकर चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा वह 1912 में आया उनका कविताओं का संग्रह गीतांजलि था.

डिलन : गीतों से पहचान

हो सकता है कि टैगोर के संगीतकार वाले पहलू को उतना महत्व न देने के नोबेल समिति के फैसले के पीछे वही सोच काम कर रही हो जिसके चलते डिलन को यह सम्मान मिलना लंबे समय तक टलता रहा-यह द्वंद कि गीतों को साहित्य की श्रेणी में कैसे रखा जाए.

कहा जाता है कि इस पुरस्कार के लिए डिलन का नामांकन पहली बार 1996 में हुआ था. अगर यह सच है तो इसका मतलब है कि नोबेल समिति इस असाधारण गीतकार को सम्मानित करने के बारे में दो दशक से सोच रही थी. मशहूर रॉक बैंड रोलिंग स्टोन का कहना है कि यह ‘लॉर्ड ऑफ द फ्लाइज’ के लेखक को मिले सम्मान के बाद से सबसे विवादित नोबेल सम्मान है और उस सम्मान पर भी सिर्फ इसलिए विवाद हुआ था कि वह 1982 में विश्वविख्यात लेखक गैब्रियेल गार्सिया मार्ख़ेज को मिले नोबेल सम्मान के ठीक बाद आया था.

टैगोर को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा पर गौर करें तो लगता है जैसे उनके गीतों का ध्यान समिति को बाद में आया. लेकिन डिलन के पुरस्कार की घोषणा में यह साफ कहा गया है कि कुछेक दूसरे साहित्यिक योगदानों को छोड़ दें तो यह पुरस्कार उन्हें उनके संगीत के लिए ही दिया जा रहा है. यही विवाद की जड़ है. कुछ का कहना है कि उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था क्योंकि वे एक पॉप कल्चर आइकन हैं जिन्होंने गीत लिखे और इसलिए वे इसके पात्र नहीं हैं.

लेकिन कई महान साहित्यिक हस्तियों की तरह डिलन की पहचान भी उनके शब्दों से बनती है. उनके गीत ऐसे दिग्गजों के नामों से भरे पड़े हैं जो उनसे पहले आए. ‘डेजोलेशन रो’ में ये एज्रा पाउंड और टीएस इलियट हैं तो ‘आई फील अ चेंज कमिंग ऑन’ में जेम्स जॉयस.

सवाल है कि बॉब डिलन को बॉब डिलन की तरह क्यों न देखा जाए? क्यों न उनके काम को अब तक अपरिचित, असाधारण और ऐतिहासिक रूप से अहम मानकर उसका जश्न मनाया जाए? टैगोर की कविताओं का सबसे मशहूर संकलन गीतांजलि अंग्रेजी में भी मौजूद है जिसका अनुवाद खुद टैगोर ने ही किया है. इसकी भूमिका बटलर यीट्स (जिन्हें 1923 में साहित्य का नोबेल मिला) ने लिखी है. और यूट्यूब तो टैगोर के कुछ सबसे मशहूर गीतों का असाधारण भंडार है ही.

संगीतप्रेमियों का एक वर्ग लंबे समय से उम्मीद करता रहा है कि साहित्य के मानकों का विस्तार होगा और गीत भी उसमें आएंगे. डिलन की जीत निश्चित रूप से इस उम्मीद पर मुहर लगाती है, लेकिन अपने गीतों के लिए नोबेल जीतने वाले डिलन पहले शख्स नहीं हैं और यह याद करना आने वाले वर्षों में और संगीतकारों के लिए भी इस पुरस्कार को जीतने की राह प्रशस्त कर सकता है.

(अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में संगीत के प्रोफेसर एलेक्स ल्यूबेट का यह आलेख मूल रूप से द कनवर्जेशन पर प्रकाशित हुआ है)