अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुछ ही दिन बाकी रह गए है. पूरी दुनिया इस समय इंतजार में है कि अमेरिकी मतदाता हिलेरी क्लिंटन के रूप में अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुनेंगे या फिर विवादित अरबपति कारोबारी डोनाल्ड ट्रम्प को. नतीजा चाहे जो हो लेकिन एक बात बहुत साफ है कि इन दोनों उम्मीदवारों में से किसी का भी चुनाव अमेरिकी विदेश नीति पर गहरा प्रभाव डालेगा.

भारत, जिसने कि अमेरिका से अपने संबंधों का आयाम बीते दो दशक में पूरी तरह बदल डाला है, के लिए भी इन चुनावों पर नजदीकी नजर रखने के अपने कारण हैं, खासतौर पर आर्थिक.

भारत क्या चाहता है

अभी दो साल पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक लक्ष्य निर्धारित किया था. इसके मुताबिक, दोनों देशों के बीच के कारोबार को 2020 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 33,375 अरब रुपए) तक ले जाना तय किया गया है. भारत सरकार को उम्मीद है कि अमेरिका का सत्ता संभालने वाला नया प्रशासन भी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए नए कदम उठाएगा.

भारत सरकार को यह भी उम्मीद है कि उसकी महत्वाकांक्षी ‘स्मार्ट सिटी परियोजना’ के लिए भी अमेरिका का नया प्रशासन प्रतिबद्ध रहेगा. अमेरिका ने अजमेर, विशाखापट्‌टनम और इलाहाबाद को स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित करने में रुचि दिखाई है.

भारत के परमाणु उत्तरदायित्व कानून-2010 (सिविल लायबिलिटी न्यूक्लियर डैमेज एक्ट-2010) को लेकर अमेरिकी चिंताओं का नरेंद्र मोदी की सरकार ने समाधान कर दिया है. इसके लिए परमाणु बीमा कोष स्थापित किया गया है. किसी भी दुर्घटना की स्थिति में परमाणु संयंत्र संचालक पर मुआवजे का जो वित्तीय भार आएगा, उसे यह कोष वहन करेगा. इस कदम के बाद दोनों देशों के बीच नागरिक-परमाणु सहयोग के रास्ते में आ रहा बड़ा गतिरोध हट गया है. अब यह अमेरिका की जिम्मेदारी है कि वह जितनी जल्दी हो सके, परमाणु समझौते के मुताबिक भारत में काम शुरू करे.

अमेरिका इस वक्त भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता भी हो चुका है. दोनों देशों के बीच 2015 में रक्षा साजो-सामान की आपूर्ति का कारोबार 14 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 934 अरब रुपए) तक पहुंच चुका है. ऐसे में, भारत को अब अपने ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की सफलता के लिए भी अमेरिका से नजदीकी मदद की दरकार है.

जहां तक सुरक्षा का ताल्लुक है तो विवादित इलाकों (जैसे कि उत्तर-पूर्व में अरुणाचल प्रदेश और उत्तर-पश्चिम में लद्दाख) में चीन की बढ़ती दखलंदाजी भारत की चिंताएं बढ़ा रही है. साथ ही, बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच बढ़ता सहयोग भी भारत की चिंता का विषय बना हुआ है. यहां बताते चलें कि इस वक्त पाकिस्तान को उसके रक्षा साजो-सामान का करीब 63 फीसदी हिस्सा चीन की ओर से उपलब्ध कराया जा रहा है.

ऐसे में नई दिल्ली को लगता है कि दक्षिण एशिया में अमेरिका की मौजूदगी से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को उसके पक्ष में बनाए रखने में मदद मिलेगी. भारत सरकार यह भी अच्छी तरह जानती है कि अपनी सेना के आधुनिकीकरण का अभियान वह तब तक प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ा सकती, जब तक कि अमेरिकी हथियारों और उनसे संबंधित तकनीक तक उसकी पहुंच न हो जाए.

आतंकवाद के मसले पर कार्रवाई न करने के मुद्दे पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए भी जरूरी है कि भारत लगातार अमेरिका से सुरक्षा संबंधी बातचीत करता रहे. समय-समय पर उसके साथ सैन्य अभ्यास भी किए जाते रहें.

यह मसला दक्षिण एशिया के तेजी से बदलते सुरक्षा संबंधी माहौल के मद्देनजर और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. सितंबर में जम्मू-कश्मीर के उरी में भारतीय सैन्य शिविर पर आतंकी हमले के बाद तो स्थिति ज्यादा तनावपूर्ण है.

क्या ट्रंप भारत के अच्छे दोस्त हो सकते हैं?

भारतीय-अमेरिकी समुदाय के मतदाताओं को लुभाने की गरज से चुनाव के आखिरी चरण में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप भारत और उसके लोगों पर कई तरह की टिप्पणियां कर चुके हैं. इनमें भी अधिकांश सकारात्मक ही रही हैं.

वे नरेंद्र मोदी को एक ‘महान शख्सियत’ बता चुके हैं. साथ ही, यह भी कह चुके हैं कि वे ‘हिंदुओं के बड़े प्रशंसक हैं.’

ट्रंप ‘हिंदू राष्ट्रवादी शब्दावली’ से भारतीय-अमेरिकी समुदाय का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहते हैं. उन्होंने उरी में हुए आतंकी हमले की सख्त शब्दों में निंदा कर यह भी संकेत देने की कोशिश की है कि उनका प्रशासन सीमा पार आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान से सख्ती से बातचीत करेगा.

एक कारोबारी के तौर पर भी भारत के साथ ट्रंप के साथ निजी हित हैं. खबरों के मुताबिक, उनकी कम्पनी मुम्बई के पॉश इलाके में एक शानदार व्यावसायिक इमारत बना रही है.

लेकिन इस मामले में भारत के लिए एक बड़ी चिंताजनक बात भी है, अमेरिका की आव्रजन नीति को लेकर ट्रंप के विचार. अमेरिका के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक उच्च कुशल कामगारों के लिए अमेरिका में जारी होने वाले एच-1बी वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी भारतीय नागरिक हैं. वित्तीय वर्ष 2014 में वहां कुल 8,16,000 एच-1बी वीजा जारी हुए. इनमें से करीब 70 फीसदी भारतीय नागरिकों के खाते में गए थे.

इस संबंध में ट्रंप पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगर वे राष्ट्रपति चुने गए तो उनका प्रशासन आव्रजन नीति को सख्त बनाने की दिशा में काम करेगा. साथ ही, एच-1बी वीजा लेने वालों पर दिया जाने वाला न्यूनतम शुल्क भी बढ़ाएगा. इसका मतलब यह लगाया जा रहा है कि इससे भारतीय और अन्य पेशेवरों के लिए अमेरिका में रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं.

अमेरिका की प्रवासी जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, 2013-14 में अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में भारत में जन्मे 1,03,000 विद्यार्थियों ने दाखिला लिया था. दूसरे देशों में से अमेरिका आने वाले छात्र-छात्राओं के मामले में यह चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी संख्या थी.

ट्रंप का एक और बयान भारत के लिए चिंताजनक है. वे कह चुके हैं कि उनके शासनकाल में मुस्लिमों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे. और यहां याद रखना होगा कि दुनिया में इस वक्त दूसरी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी भारत में रहती है.

अंत में. यह जाहिर हो चुका है कि डोनाल्ड ट्रंप रूस के प्रति नरम रवैया रखते है. इससे वे चीन के प्रति अमेरिकी विदेश नीति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हो सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो इसके असर के रूप में भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चिंताएं खड़ी हो सकती हैं.

क्या हिलेरी भारत के लिए बेहतर साबित हो सकती हैं?

हिलेरी क्लिंटन के भारत के साथ संबंध कुछ निजी और बेहतर कहे जा सकते हैं. खासकर 1995 में उनकी भारत यात्रा के बाद से तो इन संबंधों में नया आयाम जुड़ चुका है.

ऐसा माना जाता है कि जब उनके पति बिल क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो भारत-अमेरिका संबंधों को फिर से दुरुस्त करने में उन्होंने (हिलेरी ने) अहम भूमिका निभाई थी. दरअसल 1998 में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण के बाद भारत-अमेरिका संबंध काफी खराब स्थिति में पहुंच चुके थे. उस दौर में हिलेरी ने बिल क्लिंटन को प्रोत्साहित किया कि वे इन संबंधों को नई ऊर्जा देने के लिए प्रयास करें.

अमेरिकी विदेश मंत्री (2009-2013) रहते हुए हिलेरी ने सीनेट-इंडिया कॉकस की सह-अध्यक्षता की थी. साथ ही, भारत-अमेरिका के बीच परमाणु नागरिक समझौता कराने में भी अहम भूमिका निभाई थी. दोनों देशों के बीच पारस्परिक सहयोग को बढ़ाने के लिए उन्होंने इसके अलावा भी काफी प्रयास किए हैं.

उच्च तकनीक और रक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए किए गए उनके योगदान और प्रयासों को भारत के रणनीतिक विचारकों-चिंतकों ने भी मान्यता दी है. दोनों देशों के बीच जुलाई 2009 सामरिक वार्ता बहाल करने के लिए हिलेरी को श्रेय दिया जाता है.

यानी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पहले कार्यकाल में भी उन्होंने विदेश मंत्री की हैसियत से नई दिल्ली के साथ सहयोग-संबंध मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है. चेन्नई में उन्होंने 2011 जो भाषण दिया था, उसे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से ऐतिहासिक माना जाता है. अपने इस भाषण में उन्होंने कहा था, 'अब वह वक्त आ चुका है, जब भारत नेतृत्व करे… एशिया में 21वीं शताब्दी के इतिहास में काफी कुछ लिखा जाने वाला है. इसके परिणामस्वरूप भारत-अमेरिका संबंधों में इसका असर दिखाई देगा. साथ ही, पड़ोसियों के साथ भारत के संबंधों पर भी.'

इसी भाषण में उन्होंने भारत की लुक ईस्ट नीति के संदर्भ में टिप्पणी की थी, ‘भारत को पूर्व की तरफ सिर्फ देखना ही नहीं चाहिए, बल्कि पूर्व से संबंध बेहतर करना चाहिए, उसके साथ काम करना चाहिए. तभी वह समग्र रूप से एशिया में महाशक्ति के तौर पर उभर सकता है, स्थापित हो सकता है.’ आतंकियों की पनाहगाहों को खत्म करने में पाकिस्तान के कमजोर प्रदर्शन पर उनके सख्त रवैए के असर भी अब तक भारतीय लोगों के दिमागों में बरकरार है.

हिलेरी के चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले जॉन पॉडेस्टा कह चुके हैं कि वे दोनों देशों (भारत-अमेरिका) के संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाएगीं. भारत के साथ बेहतर आर्थिक संबंध एशिया में अमेरिका के लिए मजबूत आधार बनेंगे.

हालांकि हिलेरी पर कई तरह के आरोप भी लग रहे हैं. इन्हीं में से उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी डोनाल्ड ट्रंप ने लगाया है. इसके मुताबिक, उन्होंने (हिलेरी ने) परमाणु समझौते का समर्थन करने के लिए भारतीय नेताओं से पैसे लिए थे.

नई दिल्ली में सर्वसम्मति

भारतीय-अमेरिकी समुदाय, खासतौर पर इस वर्ग के युवाओं के बीच हिलेरी की साख बहुत अच्छी है. बेशक, उन्हें यह भी फायदा है कि वे अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंदी डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में भारत को ज्यादा अच्छी तरह से जानती हैं. लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय को अपनी तरफ खींचने के लिए ट्रंप ने जो प्रयास किए हैं, उनका भी असर दिख रहा है.

जहां तक भारत सरकार और उसके रणनीतिकारों का सवाल है तो पहले के मौकों से ठीक उलट इस बार उन्होंने इसमें खास रुचि नहीं दिखाई है कि अमेरिका में कौन राष्ट्रपति चुना जा रहा है. भारत की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक अमेरिकी चुनाव पर अपना कोई रुख स्पष्ट नहीं किया है.

हालांकि इस बात पर सरकार तथा रणनीतिकारों में सर्वसम्मति है कि अमेरिका में राष्ट्रपति कोई भी चुना जाए, नई दिल्ली और वॉशिंगटन को साथ मिलकर काम करते रहना चाहिए. बल्कि दोतरफा संबंधों को और घनिष्ठ बनाया जाना चाहिए.

(पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शोधकर्ता सुमित कुमार झा का यह आलेख मूल रूप से ‘द कनवर्जेशन’ पर प्रकाशित हुआ है.)