हमें जयंतियों की आदत है, वर्षगांठों की, सालगिरहों की, मील के पत्थरों को गिनने की. मीडिया की ज़ुबां में इन मील के पत्थरों को हम स्पेशल कहते हैं - इलेक्शन स्पेशल, फ्लड स्पेशल, वन ईयर ऑफ़ मोदी स्पेशल. यह पोस्ट नेपाल स्पेशल है. 25 मई की ये पोस्ट दरअसल 25 अप्रैल के नाम है. उस पर भी उन पत्रकारों के जो 25 अप्रैल की आपदा के बाद नेपाल पहुंचे थे.
नेपाल में आए भूकंप के बाद हर हाल में काठमांडू पहुंच जाने के लिए जितनी बेचैनी भारत सरकार की राहत और बचाव एजेंसियों के लोगों में रही होगी, उससे कहीं बहुत-बहुत ज़्यादा हम जैसे मीडियाकर्मियों में थी. हम देश के हर कोने से किसी तरह नेपाल पहुंच जाने को तैयार थे. गुजरात, तमिलनाडु, बंगाल. दिल्ली-यूपी-बिहार तो ख़ैर था ही. काठमांडू वह पंख हो गया था जिसे हम सबको किसी तरह अपनी-अपनी टोपियों पर लगा लेना था. साल 2015 का सबसे ख़ास पंख. साल 2015 की सबसे बड़ी ख़बर.
उन्हें देखकर अपनी तैयारी पर शर्म आई. उन्हें शायद उम्मीद थी कि सब ठीक ही होगा, और हमारे पास यह भरोसा था कि कुछ भी ठीक नहीं होगा.
मैं भूकंप आने के चार दिन बाद दिल्ली से जा रही थी. विमान में एक भी सीट खाली नहीं थी. कुछ साथी पत्रकार थे, और बहुत सारी गैर-सरकारी एजेंसियों के लोग थे. कुछ नेपाली लोग भी थे. मुट्ठी भर ही सही, लेकिन थे. बर्बादी के बाद वे लोग घर जा रहे थे और हम डिसास्टर रिपोर्टिंग करने जिसे फ़ेसबुक पर कुछ साथी 'डिसास्टर टूरिज़्म' भी कह रहे थे. उन्हें देखकर अपनी तैयारी पर शर्म आई. उन्हें शायद उम्मीद थी कि सब ठीक ही होगा, और हमारे पास यह भरोसा था कि कुछ भी ठीक नहीं होगा. इसलिए मेरी तैयारी भी वैसी ही थी. क्लोरीन की गोलियों से लेकर ड्राई फ्रूट तक, सैनिटाइज़र से लेकर साबुन तक, बिस्कुट के पैकेट से लेकर पानी की बोतल तक - सबकुछ बैग में अंटा पड़ा था. यहां तक कि स्लीपिंग बैग भी.
लेकिन काठमांडू में किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ी. होटलों में जगह की कमी नहीं थी. पांच सितारा होटलों से लेकर बेड एंड ब्रेकफास्ट बजट होटल तक - सबकुछ उपलब्ध था. हल्की-फुल्की कहीं कुछ मुश्किल थी भी तो इसलिए कि भारत से सैंकड़ों की तादाद में पत्रकार और राहत एजेंसियों के लोग वहां पहुंच गए थे. लेकिन जगह मिल गई. दरअसल मेरे जैसे लोग जिन एजेंसियों के लिए काम किया करते हैं, उनके पाउंड, यूरो, डॉलर या रुपया भी नेपाल जैसे छोटे से देश में आई किसी भी प्राकृतिक आपदा पर भारी पड़ते हैं.
खाने का इंतज़ाम बेशक पूरी तरह पटरी पर न आया हो लेकिन काठमांडू में पीने के लिए सब-कुछ उपलब्ध था. हर जगह, मुफ़्त वाई-फ़ाई के साथ. सिगरेट से लेकर कोल्ड ड्रिंक और ठंडी बीयर तक - सबकुछ. यहां तक कि दूर-दराज के गांवों में भी. जहां फ़ोन नहीं चल रहे थे, वहां ढाबे चल रहे थे. टूटी-फूटी झोंपड़ियों में उड़ी हुई टीन की छत के साथ ही सही, लेकिन जहां-जहां चल सकती थी वहां दुकानें चल रही थीं. राहत का सामान पहुंचाने में जुटे एक नेपाली दोस्त प्रवीण ने हंसकर कहा था, "गोरखा जाओ गोरखा. काम का काम और लॉन्ग ड्राईव की लॉन्ग ड्राईव." नेपाल में जितने दिन थे हम, बस लॉन्ग ड्राईव पर थे. कुछ भी ऐसा नहीं था, जो मिल न रहा हो.
दरअसल मेरे जैसे लोग जिन एजेंसियों के लिए काम किया करते हैं, उनके पाउंड, यूरो, डॉलर या रुपया भी नेपाल जैसे छोटे से देश में आई किसी भी प्राकृतिक आपदा पर भारी पड़ते हैं.
आपदाओं पर रिपोर्टिंग करते पत्रकारों की ज़रूरतें वैसे भी बहुत कम होती हैं. टीवी पत्रकारों की तो उससे भी कम. आर्थिक तंगी के हालिया दिनों में ये कम से कमतर होती जा रही हैं. ऊपर से प्रतिस्पर्द्धा इस कदर बढ़ी है कि अपनी जान की बाज़ी लगाकर हर जगह 'सबसे पहले' और 'सबसे तेज़' पहुंचने के अलावा नौकरी बचाने का कोई और रास्ता नहीं है. इसलिए पूरी क़ौम को गालियां मिलने और बुरी तरह कोसे जाने के बाद भी पत्रकार दिग्भ्रमित नहीं होता, न झल्लाता है. वह अपने काम में कहीं कोई कोताही नहीं करता. अर्जुन को जिस तरह सिर्फ़ चिड़िया की आंख दिखती थी, उस तरह पत्रकार को सिर्फ़ अपनी स्टोरी दिखती है. राहत और बचाव बेशक किसी दूर-दराज़ के गांव में न पहुंचा हो, ओबी वैन और चॉपर पर लदकर पहुंचने वाले पत्रकार ज़रूर पहुंच जाते हैं स्टोरी इकलौता शाश्वत कर्म है और कर्म के रास्ते में आनेवाली हर अड़चन को हटाना पत्रकार का इकलौता धर्म. चाहे वह अड़चन इंसानियत के नाम की पुकार ही क्यों न हो. एक कर्मठ पत्रकार से इंसानियत की बातें करना नक्कारखाने में तूती बोलना है.
इस तरह की किसी बड़ी आपदा की रिपोर्टिंग का थ्रिल ही कुछ अलग होता है. सबसे कमाल की चीज़ तो यह होती है कि आप किसी को पकड़कर भी उससे बात करें तो आपको काम की कहानियां मिल जाएंगी. स्टोरी को अपनी समझ के हिसाब से तोड़-मरोड़ भी दिया जाए तो कोई सवाल नहीं पूछेगा. आपदा या हादसा किसी के मुंह में माइक घुसा देने, किसी से भी सवाल पूछ लेने की छूट दे देता है. कैमरे को कहीं भी मोड़ दीजिए - बर्बादी की 'पहली' तस्वीरें दिखाने का दावा आप कर सकते हैं. मेरे जैसे एक औसत पत्रकार के लिए भी डिसास्टर रिपोर्टिंग सबसे आसान रिपोर्टिंग है.
दुनिया पत्रकारों को कोसती है, उन पर तिल का ताड़ बनाने के गंभीर आरोप लगाती है, उनके काम को अमानवीय तक करार देती है. लेकिन वह यह नहीं जानती कि डिसास्टर रिपोर्टिंग किसी आपदाप्रभावित इलाके के पुनर्निमाण की दिशा में कितनी ज़रूरी भूमिका अदा करती है. दुनिया यह भी नहीं जानती कि डिसास्टर रिपोर्टिंग का टर्नओवर कितना बड़ा हो सकता है. इन्ही रिपोर्ट्स और न्यूज़ कटिंग्स को आधार बनाकर बाद में विपक्ष सरकार को कोसता है, सरकार अपना बचाव ढूंढती है और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मदद मांगती है, फंडिंग एजेंसियां अपना बजट निर्धारित करती हैं, रिहैब और रिकंस्ट्रक्शन के नाम पर अरबों डॉलर आवंटित किए जाते हैं.
अगर नेपाल और नेपाल से जुड़ी डिसास्टर रिपोर्टिंग से हमारा मन भर गया हो तो अब सिद्धिचरण श्रेष्ठ के जैसी पत्रकारिता की ओर लौट जाने का वक़्त आ गया है शायद.
हालांकि इन रिपोर्टों और ख़बरों को हम और आप हफ़्ते भर देखकर फिर भूल जाते हैं. हमारे सोशल मीडिया के टाइमलाईन पर भी बहुत नीचे चली जाया करती हैं ये ख़बरें. इन ख़बरों के बासी पड़ते ही डिसास्टर रिपोर्टर वापस लुट्यन डेल्ही रिपोर्टर या प्रेस क्लब रिपोर्टर या पार्लियामेंट रिपोर्टर बन जाता है. इन ख़बरों के पीछे और बाद का सच जानने-समझने की फ़ुर्सत एक पत्रकार को नहीं होती. एक स्पेशल, या किसी वर्षगांठ के बाद उस ख़बर का कोई मानी नहीं होता.
उस ख़बर को, एक आपदा के बाद जीने की वजहों को, ज़िन्दगी में संघर्ष को जिलाए रखने का काम एक पत्रकार की ज़िम्मेदारी नहीं मानी जाती. यह काम किसी कवि का होता है, या फिर एक क्रांतिकारी का. पत्रकार क्रांतिकारी नहीं होता. पत्रकार सिर्फ़ मीडियाकर्मी होता है. जो पत्रकार क्रांतिकारी होता है, वह किसी एक युग में बमुश्किल पैदा होता है - नेपाली पत्रकार और युगकवि सिद्धिचरण श्रेष्ठ की तरह, जिनकी मूर्ति भूकंप के बाद भी बसंतपुर दरबार स्क्वायर से एकाध किलोमीटर दूर एक चौक पर ख़ामोश खड़ी नेपाल को पुनर्निमाण में यकीन दिलाती मिलती है. हैरानी इस बात की है कि दरबार स्क्वायर पूरी तरह धराशायी हो गया, लेकिन सिद्धिचरण श्रेष्ठ अपनी दो बाई दो फुट की जगह में अभी भी सीना चौड़ा किए, सिर उठाए खड़े हैं. जिस भक्तपुर से सिद्धिचरण श्रेष्ठ के पूर्वज काठमांडू आए, वहां कुछ बाकी नहीं है भूकंप के बाद. जिस दरबार स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की, उसका हाल यह है कि सड़क पर खड़े होकर भूकंप के बाद नंगे पड़े क्लासरूमों में मौजूद मेज़ और कुर्सियां गिनी जा सकती हैं. लेकिन सिद्धिचरण श्रेष्ठ की कविताएं शेष हैं. दीवार पर की वह लिखाई अमिट बनी हुई है.
अगर नेपाल और नेपाल से जुड़ी डिसास्टर रिपोर्टिंग से हमारा मन भर गया हो तो अब सिद्धिचरण श्रेष्ठ के जैसी पत्रकारिता की ओर लौट जाने का वक़्त आ गया है शायद. नेपाल से, और अपने आस-पास से, निर्माण और तबाही - दोनों की ईमानदार कहानियां निकाल कर ले आना तभी मुमकिन है. मीडिया के चोट खाए अहं का, अपराधबोधग्रस्त ज़मीरों के पुनर्निर्माण का काम भी तभी मुमकिन है.
क्यारूं, म यो देश निमित्त क्यारूं
नाचूं कि गाउँ कि गला मिलाउं
सहर्ष काटी शिर नै चढ़ाऊं.
जम्मै श्वास जम्मे यसमै मिसाउं?
(मैं क्या करूं, अपने देश के लिए क्या करूं
नाचूं कि गाऊं कि इसे गले लगाऊं
या सहर्ष काटकर सिर इसे चढ़ाऊं
या अपनी सारी सांसें ही इसमें मिलाऊं?)
-युगकवि सिद्धिचरण श्रेष्ठ