सितंबर, 2011 में जब चीन ने अपना अंतरिक्ष स्टेशन – तियानगॉन्ग 1 - अंतरिक्ष में स्थापित किया तो इस एशियाई देश के लिए यह अंतरिक्ष विज्ञान में काफी लंबी छलांग थी. निश्चितरूप से यह चीन की बड़ी कामयाबी रही लेकिन जैसा कि हमारे यहां कहते हैं, ‘हाथी निकल गया, पूंछ रह गई’ वैसा ही अब चीन के इस अंतरिक्ष स्टेशन के बारे में कहा जा सकता है. दरअसल इससे पहले 2001 में रूस का मीर स्टेशन भी धरती पर गिरा था लेकिन तब तियांगगॉन्ग से तकरीबन 16 गुना भारी इस स्टेशन को नियंत्रित करते हुए प्रशांत महासागर में गिराया गया था. रूसी वैज्ञानिकों के मुकाबले चीन इस मामले में असफल साबित हुआ है.

तियानगॉन्ग 1 ने अपनी निर्धारित समयावधि तो पूरी कर ली है लेकिन अब यह स्टेशन चीनी अंतरिक्ष एजेंसी के काबू में नहीं है. अंतरिक्ष में एस्ट्रोनॉट भेजने के अभियानों को संभालने वाली चीनी एजेंसी सीएमएसई की डिप्टी डायरेक्टर वू पिंग ने सितंबर में जानकारी दी थी कि तियानगॉन्ग 1, अगले साल के आखिरी महीनों में धरती पर गिरेगा लेकिन इस बात की आशंका न के बराबर है कि इससे किसी तरह का जानमाल का नुकसान हो. जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह घोषणा की गई उसकी सबसे दिलचस्प बात थी कि उसी में चीन ने अपने दूसरे प्रायोगिक अंतरिक्ष स्टेशन तियानगान्ग 2 के छोड़े जाने की घोषणा भी की थी. यह स्टेशन सितंबर में ही अंतरिक्ष में स्थापित हो चुका है. अक्टूबर में 33 दिनों के लिए चीन के दो अंतरिक्ष यात्री भी इस पर पहुंच चुके हैं. लेकिन वैज्ञानिक हलकों में चीन की इस उपलब्धि के बजाय आज भी चर्चा तियानगॉन्ग 1 की ही चल रही है.

पृथ्वी के दो तिहाई हिस्से पर पानी है और साथ ही जमीन के एक बड़े हिस्से पर इंसानी आबादी निवास नहीं करती जिसके कारण इंसानों पर ये अवशेष गिरने की आशंका कम से कम हो जाती है. शून्य फिर भी नहीं होती

तियानगॉन्ग 1 का वजन तकरीबन 8500 किलोग्राम है और यह धरती के 370 किमी ऊपर चक्कर काट रहा है. वू पिंग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि इस अंतरिक्ष स्टेशन का मलबा पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश के दौरान जलकर नष्ट हो जाएगा. हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह दावा पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि अंतरिक्ष स्टेशन में ऐसी सामग्री भी होती है जो जलकर नष्ट नहीं होगी. उसका कुछ हिस्सा धरती पर गिरेगा ही. लेकिन यह भी सच है कि चूंकि पृथ्वी के दो तिहाई हिस्से पर पानी है और साथ ही जमीन के एक बड़े हिस्से पर इंसानी आबादी निवास नहीं करती जिसके कारण इंसानों पर ये अवशेष गिरने की आशंका कम से कम हो जाती है. शून्य फिर भी नहीं होती. ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ हेंप्टन से जुड़े एक अंतरिक्ष विशेषज्ञ ‘द गार्जियन’ से बातचीत में कहते हैं, ‘यह मॉड्यूल (तियांगगॉन्ग) खोखला है और इसका बड़ा हिस्सा वायुमंडल में प्रवेश के समय जल जाएगा लेकिन कुछ हिस्सों की धरती पर पहुंचने की संभावना है.’

अब से तकरीबन एक साल बाद होने जा रही यह घटना कुछ-कुछ 1978 में अमेरिकी अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन स्काईलैब के धरती पर गिरने जैसी है. उस वाकये से जुड़ा सबसे दिलचस्प पहलू है कि तब भारत में आतंक का एक माहौल बन गया था.

जब कई भारतीयों को लगा कि कयामत के दिन नजदीक हैं

स्काईलैब का अंतरिक्ष की अपनी कक्षा से फिसलकर पृथ्वी पर गिरना एक ऐसी घटना थी जिसकी वजह से कुछ ही महीनों के भीतर भारत सहित पूरी दुनिया में अंतरिक्ष विज्ञान की इन उपलब्धियों को मानवजाति के लिए खतरा समझा जाने लगा था. यह एक नौ मंजिला ऊंचा और 78 टन वजनी ढांचा था, जिसे अमेरिका ने 1973 में अंतरिक्ष में छोड़ा था. चार साल तक स्काईलैब ठीक से काम करती रही लेकिन 1977-78 के दौरान उठे सौर तूफान (सूर्य से निकलने वाली आग की लपटें) से इसे काफी नुकसान हुआ. स्काईलैब के सौर पैनल खराब हो गए और यह धीरे-धीरे अपनी कक्षा से फिसलकर पृथ्वी की ओर बढ़ने लगी. शुरू में अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी, नासा ने इसकी मरम्मत की कोशिश की लेकिन वे नाकाम रहे.

भारत में तैनात विशेष दूत का कहना था कि अगर भारत और अमेरिका सिर्फ दो विकल्प हुए तो नासा निश्‍चितरूप से स्काईलैब को अमेरिकी जमीन पर ही गिराएगा. भारतीयों के बीच इस बयान का उल्टा ही असर हुआ

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आखिरकार स्काईलैब के धरती पर गिरने की घोषणा कर दी गई. इस घोषणा के साथ एक आशंका यह भी जताई गई थी कि इसका मलबा भारत पर गिर सकता है. शुरुआत में भारत में इस खबर की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई. लेकिन जैसे-जैसे स्काईलैब के धरती पर गिरने की तारीख पास आती गई, लोगों में दहशत बढ़ती गई. यहां तक कि देश के कई गावों में लोगों ने यह मान लिया कि बस कुछ दिन बाद दुनिया खत्म हो जाएगी. देश के कई हिस्सों में बुजुर्ग बताते हैं कि तब लोगों ने अपनी जमीन-जायदाद बेचकर पैसा ऊलजुलूल तरीके से खर्च करना शुरू कर दिया था.

अमेरिका ने उस समय हर देश के अपने दूतावास में एक विशेष दूत की नियुक्‍ति सिर्फ इसलिए की थी ताकि वह संबंधित सरकार को स्काईलैब से जुड़ी जानकारियां मुहैया कराता रहे. भारत में यह जिम्मेदारी थॉमस रेबालोविच संभाल रहे थे. इसी समय उन्होंने भारतीय पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि यदि नासा स्काईलैब को नियंत्रित कर सके और उसके पास इसे गिराने के दो‌ विकल्प हों, भारत और अमेरिका तो नासा निश्‍चितरूप से स्काईलैब को अमेरिकी जमीन पर ही गिराएगा. लोगों के बीच इस बयान का उल्टा ही असर हुआ.

भारत के गांव-कस्बे के एक बड़े तबके ने मान लिया कि स्काईलैब के टुकड़े भारत में ही गिरेंगे. इस बीच 1979 का वह दिन भी आ गया जब स्काईलैब को धरती के वायुमंडल में प्रवेश करना था. 12, जुलाई को भारत में सभी राज्यों की पुलिस हाईअलर्ट पर रखी गई. लेकिन जैसा कि नासा ने आखिरी समय में अनुमान लगाया था स्काईलैब ‌का मलबा ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच हिंद महासागर में गिरा, इसके कुछ टुकड़े पश्‍चिमी ऑस्ट्रेलिया के एक कस्बे एस्पेरेंस पर भी गिरे लेकिन इनसे किसी तरह के जानमाल का नुकसान नहीं हुआ.

इतने सालों के बीच अंतरिक्ष विज्ञान ने खासी तरक्की की है लेकिन अभी-अभी वह इस काबिल नहीं हो पाया है कि संपर्क टूटने के बाद किसी उपग्रह या अंतरिक्ष स्टेशन के धरती पर गिरने का सही समय और स्थान बता सके

इस घटना के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ऑस्ट्रेलिया सरकार से माफी मांगी थी. वहीं दूसरी तरफ कस्बे एस्पेरेंस के स्थानीय निकाय ने अमेरिका पर 400 डॉलर का जुर्माना लगाया था. हालांकि अमेरिकी सरकार ने यह कभी नहीं चुकाया.

स्काईलैब के धरती पर गिरने के इतने सालों के बीच अंतरिक्ष विज्ञान ने खासी तरक्की की है लेकिन अभी-अभी वह इस काबिल नहीं हो पाया है कि संपर्क टूटने के बाद किसी उपग्रह या अंतरिक्ष स्टेशन के धरती पर गिरने का सही समय और स्थान बता सके. वाशिंगटन पोस्ट से बात करते हुए हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के एस्ट्रो फिजिसिस्ट जोनाथन मैकडॉवेल कहते हैं, ‘आप इन चीजों को नियंत्रित नहीं कर सकते. यहां तक कि कुछ दिन पहले भी आप नहीं बता सकते है कि ये कब गिरेंगी. इसका मतलब है कि आप यह भी नहीं बता सकते कि कहां गिरेंगी.’

मेंडारिन भाषा में तियांगगॉन्ग का मतलब होता है ‘स्वर्ग का महल’. तकरीबन 11-12 महीने बाद यह स्वर्ग का महल धरती पर गिरने वाला है. संभावना भले कम हो फिर भी इसके टुकड़े आबादी पर गिरे तो वहां इस नाम से विपरीत - नारकीय स्थितियां बना सकती हैं.