परिवार में तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी होने के कारण मुझे बाकी सब से ज्यादा प्यार मिला हो, ऐसा याद नहीं. दूसरे परिवारों के बच्चों में जहां यह होड़ रहती थी कि उनमें से किसको मां-बाप से ज्यादा प्यार मिला है, वहीं हमारी होड़ कुछ इन मायनों हुआ करती थी कि हम तीनों में किसने पिताजी की मार सबसे ज्यादा खाई है. पता नहीं वह क्या वजह थी कि हम भाई-बहन एक दूसरे को यही जताने में लगे रहते थे कि ‘मैंने ज्यादा मार खाई या मुझे ज्यादा डांट पड़ी है.’

इस तरह मेरा बचपन लाड़-प्यार में नहीं बल्कि डांट, मार और घोर तनाव में बीत रहा था. इसी कारण जब मैं छोटी बच्ची थी, तभी से दब्बू बन गई थी. हालांकि अपनी दूसरी तमाम कोशिशों से मां-पिताजी हम तीनों भाई-बहनों में कड़ी मेहनत, ईमानदारी और स्वाभिमान का जज्बा भरना चाहते थे, पर बचपन में मुझे इन आदर्शों से कोई मतलब नहीं था. मेरे लिए अच्छे-बुरे की तराज़ू पर सिर्फ प्यार-पुचकार वाला पलड़ा भारी था. जो प्यार से पेश आए वह मेरे लिए अच्छा, जो डांटे फटकारे वह बुरा, इसलिए घर वाले मेरे लिए ज्यादा अच्छे कभी नहीं बन पाए थे. घर मुझे जेल लगता था और स्कूल जाने पर मैं खूब राहत महसूस करती थी.

उन दिनों हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़ौत में रहा करते थे. यह किराए का घर था जहां पहली मंज़िल पर हमारा डेरा था. ग्राउंड फ्लोर पर मकान मालिक रहा करते थे. उनके घर के आंगन से होकर हम अपने घर की सीढ़ियों तक पहुंचते थे और उनके ड्राइंग रूम का एक दरवाज़ा बाहर वाले आंगन में खुलता था और दूसरा भीतर वाले आंगन में. एक दिन मैं हमेशा की तरह बस्ता कंधे पर टांगे बोझिल कदमों से घर आ रही थी. तभी अचानक मकान मालिक के ड्राइंग रूम का दरवाज़ा खुला और मलिक अंकल (मकान मालिक) ने दरवाजे से थोड़ा बाहर झांका और मुझे इशारे से कमरे में बुलाया. मैं उनके ड्राइंग रूम की तरफ बढ़ गई.

अंकल ने मुझे बड़े प्यार से अपनी गोदी में बैठाया, गालों पर चूमा, सिर पर हाथ फेरा और फिर कहा, ‘स्कूल से दोपहर में आती है, थक जाती होगी धूप के कारण. इतना घूमकर क्यों जाती है? हमारे ड्राइंग रूम से चली जाया कर.’ उनका कहना था कि मैं चाहूं तो ड्राइंग रूम से होते हुए अपने घर की सीढ़ियों तक जा सकती थी. इतना सुनकर मैं चली आई या कहूं कि मुझे छोड़ दिया गया.

उस दिन ‘कुछ‘ हुआ नहीं था, लेकिन इस कुछ न होने पर भी मैं अजीब तरह से असहज हो गई थी. हालत यह थी कि स्कूल से लौटते वक्त बाहर वाले आंगन में घुसते हुए मैं मन ही मन सोचती, ‘हे भगवान! गिद्ध जैसी आंखों वाले मलिक अंकल दरवाजे पर खड़े न मिलें.’ अब मैं उनसे थोड़ा हट-बचकर रहने लगी थी. चूंकि घर में सहज संवाद की गुंजाइश थी नहीं, तो इस बारे में मैं किसी से जिक्र भी नहीं कर सकी. फिर यूं भी हुआ कि धीरे-धीरे यह घटना मेरे जेहन से उतर गई.

ऐसे ही एक दिन मलिक अंकल ने मुझे फिर बुलाया और पूछा, ‘रसगुल्ले पसंद हैं...खाएगी? (अब भला कौन बच्चा रसगुल्ले, चॉकलेट और आइसक्रीम को मना करेगा!) मेरे हां कहते ही वे बोले, ‘ठीक है मैं कल लाकर रखूंगा...स्कूल के बाद यहां आ जाना.’ अगले दिन अंकल ने मुझे कमरे में बुलाकर दो सफेद रसगुल्ले खाने को दिये और फिर से गाल पर चूमा, और वापस घर भेज दिया.

उन दिनों हमारे घर पर टीवी नहीं था, सो हम टीवी देखने मकान मालिक के घर ही जाया करते थे. इतवार की रामायण देखने तो पूरा परिवार पहुंचता था, हालांकि मेरा मन टीवी देखने के लिए ज्यादा ही ललचाया रहता था. जैसा मैंने पहले बताया कि घर में मुझे घुटन सी होती थी सो ऐसे ही किसी दिन तब शायद स्कूल की छुट्टी थी, मैं मलिक अंकल के घर टीवी देखने चली गई. उन्होंने मुझे आते देखा और मुस्कुरा दिए.

उन दिनों पिताजी ‘सादा जीवन उच्च विचार’ वाले फलसफे से कुछ ज्यादा ही प्रभावित रहा करते थे. इस वजह से हम तीनों भाई-बहनों को खादी का साधारण कुर्ता-पाजामा पहनाया जाता था. मैं लड़की थी, पर इतनी बड़ी नहीं कि मेरे लिए लड़कियों वाली पोशाकों का ढेर लगा हो. हां दो-एक फ्रॉक जरूर थीं. उस दिन जब मैं टीवी देखने मलिक अंकल के कमरे में पहुंची तब फ्रॉक ही पहने हुए थी.

मैं सोफे पर बैठी ध्यान से टीवी देख रही थी. थोड़ी ही देर बाद अचानक मलिक अंकल उठे और उन्होंने मुझे अपनी गोद में बिठा लिया. फिर चूमना शुरू कर दिया, लेकिन इस बार सिर्फ चूमना नहीं था. उस दिन उनका एक हाथ मेरे पैरों पर घूम रहा था. अंकल के हाव-भाव विचित्र से हो गए थे और मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी. अब घुटने और जांघ से होते-होते उनके हाथ वहां पहुंच गए जहां उन्हें नहीं होना चाहिए था... और वे तब तक वहां रहे जब तक मैंने दर्द और डर के कारण दबी आवाज में रोना शुरू नहीं कर दिया.

मेरी हालत देखकर अंकल ने तुरंत मुझे पुचकारना शुरू कर दिया. फिर भुट्टा ऑफ़र किया और भुट्टा भूनने रसोई में चले गए. उनके जाते ही मैं इस डर के चलते वहां से दबे पांव निकली कि कहीं वे फिर से आकर मुझे दबोच न लें. मैं बाहर तो निकल आई, लेकिन सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ते हुए मैंने खुद को समझाना शुरू कर दिया कि कुछ भी तो नहीं हुआ है! पता नहीं मैं यह क्यों कर रही थी. शायद इसलिए कि घर में कोई मुझे इस तरह भयभीत सा न देख ले या कोई पूछताछ न करे.

डर और सदमे से भरी मैं जाकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गई. हालांकि बाद के दिनों में भी मेरी चुप्पी पर किसी घर वाले का ध्यान नहीं गया. वैसे भी पिताजी के डर से अक्सर हम लोग चुपचाप ही रहा करते थे. इस ‘गंदी‘ बात का ज़िक्र मैंने घर या बाहर किसी से नहीं किया. हां, अब मैंने अंकल के पास अकेले जाना बिलकुल छोड़ दिया. टीवी देखने भी नहीं. भैया-दीदी अंकल के यहां से अखबार या और कुछ लाने को बोलते तो भी नहीं जाती थी. मुझे कहना न मानने वाली गंदी लड़की बनना मंजूर था, लेकिन अंकल के पास जाना नहीं.

इस ‘असामान्य घटना‘ के बाद भी जीवन तो सामान्य चलता रहा, लेकिन दिमाग में हर वक्त कुछ खौलता रहता था. वह क्या था, यह नहीं पता. जैसा मैंने बताया कि मैं उस उम्र में कुर्ता-पाजामा पहना करती थी, वहीं लड़कों की तरह मेरे बाल भी छोटे रहते थे. इस कारण ज्यादातर लोग मुझे लड़का ही समझते थे. हालांकि घटना वाले दिन मैंने फ्रॉक पहना हुआ था, लेकिन फिर भी धीरे-धीरे उस घटना को मैंने अपने कुर्ता-पाजामा पहनने से जोड़ लिया.

मैंने मानना शुरू कर दिया था कि मेरा नाम लड़कियों वाला है और पहनावा लड़कों वाला, तो शायद मलिक अंकल यह पता लगाना चाहते थे कि मैं लड़का हूं या लड़की. यह सोच-सोचकर उस घटना के लिए मैं मलिक अंकल से ज्यादा अपने मां-बाप पर गुस्सा रहने लगी. फिर जैसा होता है, समय बीतता गया और इस घटना की स्मृति पर भी धूल पड़ने लगी.

बड़े होकर एक दिन मैं ‘मॉनसून वेडिंग‘ फिल्म देख रही थी, तब अचानक से उस घटना पर पड़ी धूल अपने आप साफ हो गई. मैं फिल्म देखते-देखते यह सोचकर रोने लगी कि वह सामान्य घटना नहीं, हादसा था और उसका मकसद यह पता लगाना नहीं था कि मैं लड़का हूं या लड़की, बल्कि वह हरकत तो इसीलिए ही अंजाम दी गई थी क्योंकि मैं लड़की थी!

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)