2001 की अप्रत्याशित हिट फिल्म ‘तुम बिन’ से जुड़ी यादों को ढंक चुके बादल तब छंटने लगते हैं जब जगजीत सिंह की सुरीली आवाज उन्हें भेदते हुए जमीन पर स्वर्ग से उतरती हुई प्रतीत होती है. ‘तुम बिन 2’ में जगजीत सिंह की गाई बेमिसाल गजल ‘कोई फरियाद’ पहली वाली ‘तुम बिन’ से उधार ली गई है और उसे एक ऐसा नया चोला पहनाया गया है जिससे वो पुरानी के करीब भी रहती है.

संगीत निर्देशक अंकित तिवारी ने ‘कोई फरियाद’ के दो नए वर्जन बनाए हैं और उनका नामकरण ‘तेरी फरियाद’ किया है. प्रचारित किया जाने वाला पहला वर्जन तीन मिनट का है और एक्सटेंडिड वर्जन 10 मिनट 35 सेकंड का. जगजीत सिंह की रूहानी आवाज को रेखा भारद्वाज की अनोखी आवाज संग अंकित तिवारी ने बखूबी मिलाया है और एक पुरानी रिकॉर्डिड आवाज को नये साजों, अल्फाजों और नयी आवाज की टेक देकर मुख्तलिफ बनाने की अच्छी कोशिश की है. ‘तुम बिन’ के लिए ‘कोई फरियाद’ को जहां निखिल विनय ने संगीतबद्ध किया था और गजल फैज अनवर ने लिखी थी, वहीं ‘तुम बिन 2’ के लिए उसी गजल के लिए कई नए शेर शकील आजमी ने लिखे हैं.

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‘तुम बिन 2’ के इस ट्रैक को रोजमर्रा के रीमिक्स की जगह ट्रिब्यूट कहकर प्रचारित किया जा रहा है. इसमें नए वाद्य यंत्रों का साथ लेकर जगजीत की ओरिजनल आवाज को फिर से दर्शकों की नजर किया गया है और यह ट्रिब्यूट पुराने गीतों को नयी आवाजों और नयी बीट्स के साथ रीसाइकल करने के ट्रैंड से अलग है. बहुत कम संगीतकारों ने इससे पहले इस तरीके से दोबारा किसी स्थापित पुराने गाने को नया लिबास ओढ़ाया है, और ऐसा करने के लिए अंकित तिवारी तारीफ के हकदार हैं. उनके द्वारा बनाए गए दोनों ही गीत ‘कोई फरियाद’ की आत्मा को संवारे रहते हैं और 10 अक्टूबर 2011 को हमारे बीच से उठकर चले गए गजल सम्राट जगजीत सिंह को वाजिब श्रद्धांजलि देते हैं.

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2014 में आई ‘क्वीन’ में भी ‘अनहोनी’ (1973) फिल्म के गीत ‘हंगामा हो गया’ के रीमिक्स वर्जन का इसी अंदाज में प्रयोग किया गया था. ओरिजनल गीत को वर्मा मलिक ने लिखा था, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीत दिया था और आशा भोंसले ने अपनी ऊर्जावान आवाज का जादू चलाया था. ‘क्वीन’ के लिए अमित त्रिवेदी के बनाए ‘हंगामा हो गया’ में आशा भोंसले की उसी आवाज का उपयोग किया गया है और गाने को पेरिस के एक डिस्कोथेक में शूट किया गया, ठीक उसी तरह जैसे ओरिजनल गीत में फिल्म की नायिका पब की टेबल के ऊपर खड़े होकर नाचती और यह गीत गाती थी. ‘क्वीन’ के निर्देशक विकास बहल ने शायद इसीलिए इस गीत को चुना ताकि दारू के नशे में चूर कंगना रनोट के कई सारे इमोशन्स– जिसमें आजाद होना प्रमुख है - एक पुराने गीत के नए संस्करण के माध्यम से वे स्क्रीन पर दिखा सकें.

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1988 में आई ‘तेजाब’ के लिए नितिन मुकेश द्वारा गाए अपने करियर के सबसे बढ़िया गीत ‘सो गया ये जहां’ को भी इसी तर्ज पर 2012 में ‘नौटंकी साला’ में रीमिक्स किया गया. ओरिजनल कंपोजीशन लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की थी और उसे जावेद अख्तर ने लिखा था. वहीं ‘नौटंकी साला’ के लिए म्यूजिक डायरेक्टर माइकी मैक्लेरी ने टेंपो को बढ़ाया और सर्फ गिटार का प्रयोग कर एक और कर्णप्रिय रोड-सॉन्ग बनाया, जिसमें नितिन मुकेश की उसी पुरानी आवाज और उसके जादू को बरकरार रखा गया.

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करण जौहर की ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में भी नाजिया हसन की ओरिजनल आवाज को बरकरार रखा गया और बेनी दयाल व सुनिधि चौहान की उससे संगत कराकर नया ‘द डिस्को’ सॉन्ग बनाया गया. नाजिया हसन के 1981 में आए पॉप एलबम ‘डिस्को दिवाने’ के टाइटल ट्रैक में से उनकी आवाज ली गई और विशाल-शेखर ने तेज रफ्तार वाली मॉडर्न लय और ताल को अपने संगीत में मिलाकर व अन्विता दत्ता से कुछ नयी पंक्तियां लेकर वह तड़कता-भड़कता डांस नम्बर रचा जिसे रिलीज के वक्त कईयों ने पसंद किया.

पुराने गानों को यूं नए लिबास पहनाने का मकसद इन्हें आज के वक्त के ज्यादा करीब लाना होता है. लेकिन हमेशा ऐसा होता नहीं कि इस तरह की कोशिशें सफल ही हों. ‘शैतान’ (2011) का ‘खोया खोया चांद’, ‘डॉन’ (2006) का ‘ये मेरा दिल’ और ‘बचना ऐ हसीनो’ (2008) व ‘दम मारो दम’ (2011) के टाइटल गीत क्लासिक गीतों के आधुनिक वर्जन बनने की कोशिश में गिमिक्री ज्यादा लगते हैं और इसीलिए उन्हें कई वर्षों बाद दोबारा सुना जाए, इसकी कोई खास वजह नजर नहीं आती.

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1978 में आई फिल्म ‘गमन’ के लिए हरि देवी मिश्रा की गाई बेहद उत्तम ठुमरी ‘आजा संवरिया’ को वक्त के साथ भुला दिया गया था लेकिन 2001 में आई फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ ने इसे कई सालों बाद संगीत प्रेमियों की नयी पीढ़ी के लिए फिर से अनमोल बना दिया. जयदेव की रची कम्पोजीशन को मीरा नायर की फिल्म के लिए मिडिवल पंडित्ज नामक फ्यूजन बैंड ने रीमिक्स किया और मॉडर्न वाद्य यंत्रों और हरि देवी मिश्रा की ईश्वरीय आवाज की जादुई संगत ने आजा संवरिया को वह सम्मान दिलाया जिसकी वो हमेशा से हकदार थी.