राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अब तक अपनी महिला शाखा को सिर्फ घरेलू भूमिका तक सीमित रखा है. संघ की सरपरस्ती में उसे कभी-भी लैंगिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर भूमिका निभाते हुए नहीं देखा गया. अगर हम हाल ही में संपन्न हुए संघ के एक आयोजन का विश्लेषण करें तो साफ पता चलता है कि इस यथास्थिति में फिलहाल कोई बदलाव नहीं आने जा रहा है.

बीते शुक्रवार को दिल्ली में संघ की महिला शाखा राष्ट्रीय सेविका समिति का तीन दिवसीय शिविर आयोजित शुरू हुआ था. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसका उद्घाटन किया था. अपने उद्घाटन भाषण में भागवत ने लैंगिक न्याय या महिलाओं को अपनी पसंद के चुनाव के अधिकार का जिक्र तक नहीं किया. इसके बजाय उन्होंने ‘मातृशक्ति’, ‘स्त्रीशक्ति’ पर ज्यादा जोर दिया. उन्होंने ‘कुटुम्ब प्रबोधन’ शब्द का भी इस्तेमाल किया. यानी पारिवारिक मूल्यों को स्थापित करने में महिलाओं की भूमिका पर जोर दिया. इन बातों से साफ होता है कि संगठन की महिला शाखा को पुरुषों के मुकाबले अपनी भूमिका में जरा भी बदलाव की इजाजत नहीं दी गई है जबकि इस शाखा के गठन को अब तक आठ दशक गुजर चुके हैं.

हेडगेवार संघ की पुरुष शाखाओं में महिलाओं को शामिल करने के पक्ष में नहीं थे. ऐसे में मजबूरन लक्ष्मीबाई केलकर को राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना करनी पड़ी

इस शिविर में देशभर से सैकड़ों की तादाद में संघ की महिला सदस्य इकट्ठी हुई थीं. इन्हें संबोधित करते हुए भागवत ने कहा, ‘जब तक देश की मातृशक्ति सक्रिय नहीं होगी. जब तक वह आगे नहीं आएगी, देश अपनी पूरी क्षमता का लाभ नहीं ले सकेगा. अपना पुराना गौरव हासिल नहीं कर सकेगा. दुनिया को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में काम नहीं कर सकेगा.’

अपने करीब एक घंटे के भाषण में संघ प्रमुख ने जोर देते हुए यह राय जाहिर की कि बच्चों में श्रेष्ठ संस्कार डालने में महिलाओं की केन्द्रीय भूमिका है. इस तरह समाज और देश को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका है. भागवत का कहना था, ‘हमारी कुटुम्ब व्यवस्था ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है.’

इसे दिलचस्प बात भी माना जा सकता है और विडंबना भी कि संघ की वैचारिक स्थिति 1936 में भी ऐसी ही थी. तब लक्ष्मीबाई केलकर ने संघ संस्थापक और संगठन के पहले प्रमुख केशव बलीराम हेडगेवार के कहने पर राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना की थी. यह समूह वास्तव में, संघ की पहली शाखा थी.

शुरू में केलकर अलग से कोई महिला मोर्चा बनाने के पक्ष में नहीं थीं. उन्होंने हेडगेवार से अपील की थी कि वे संघ की पूर्णत: पुरुषों के वर्चस्व वाली शाखाओं के द्वार ही महिलाओं के लिए खोल दें. लेकिन तत्कालीन संघ प्रमुख इस विचार के पक्ष में नहीं थे. ऐसे में मजबूरन केलकर को राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना करनी पड़ी.

राष्ट्रीय सेविका समिति की प्रमुख सीता अन्नदनम पैतृक संपत्ति में महिलाओं को हिस्सा देने का खुला विरोध करती हैं. उनके मुताबिक इससे परिवारों में बिखराव हो जाएगा

लेकिन संघ ने हमेशा अंधराष्ट्रवादी हिंदू पुरुषों को ही लामबंद करने पर ज्यादा ध्यान दिया. उसने बमुश्किल ही महिलाओं को कभी संगठन के कामों से जोड़ा. लिहाजा महिलाओं की इस शाखा का अस्तित्व हमेशा कमतर बना रहा और यह समूह अपने पुरुष समकक्षों की विचारधारा के आधार पर, उसी को ही आगे बढ़ाने का काम करता रहा.

पुरुषों की प्रधानता पर ज्यादा भरोसा

अब लगता है कि बीते आठ दशकों के दौरान संघ की यही विचारधारा उसके इस समूह में भी गहरे तक जा बैठी है और इसकी ताजा मिसाल भी इसी कार्यक्रम से संबंधित है. अभी बीते नौ नवंबर को राष्ट्रीय सेविका समिति की मुखिया सीता अन्नदनम ने इस प्रशिक्षण शिविर के बारे में जानकारी देने के लिए पत्रकारों को बुलाया था. इसमें उनसे संघ की शाखाओं से संबंधित सवाल किया गया तो उन्होंने साफ कहा, ‘हमारी संस्कृति यह इजाजत नहीं देती कि पुरुषों और महिलाओं की संयुक्त शाखाएं लगाई जाएं. इसीलिए हम उनके लिए अलग शाखाएं लगाते हैं.

अन्नदनम वास्तव में, परिवारों में पुरुषों की प्रधानता वाले विचार से गहराई से बंधी हुई लगीं. इसका प्रमाण एक अन्य सवाल पर उनके जवाब से मिला. इसमें उन्होंने पैतृक संपत्ति में महिलाओं को हिस्सा देने का खुला विरोध किया. वे बोलीं, ‘हमारी परंपराओं को महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन होना चाहिए. और यह सब हमारे शास्त्रों में जिस तरह से बताया गया है, उसी आधार पर किया जाना चाहिए नहीं तो इस तरह हमारे परिवारों में ही बिखराव हो जाएगा. भाई अपनी बहनों के खिलाफ ही खड़े हो जाएंगे.’

इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने साक्षात्कार में भी उन्होंने इसी तरह का विवादित बयान दिया. यह साक्षात्कार 11 नवंबर को प्रकाशित हुआ था. इसमें उन्होंने कहा था, ‘वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) जैसा कुछ होता ही नहीं है. विवाह एक पवित्र बंधन है. सह-अस्तित्व (साथ-साथ रहना) को आशीर्वाद में परिणत होना चाहिए. अगर हम इस अवधारणा को समझ सकें, तो सभी चीजें आराम से, बिना किसी परेशानी के ही चलती रहती हैं.’

शायद यही वजह है कि संघ के ‘संस्कारीय ढांचे’ से बंधी राष्ट्रीय सेविका समिति का दायरा मोटे तौर पर अब तक महाराष्ट्र और उसके आसपास के राज्यों तक ही सीमित है. खासतौर पर उन क्षेत्रों तक ही जिनमें संघ का पारंपरिक और मजबूत आधार माना जाता है. अपनी स्थापना के आठ दशक बाद भी यह समिति अब तक अपने पितृ संगठन के पूर्व प्रमुख माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के विचार-मंत्र को ही पकड़कर बैठी है. अपनी किताब, ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में गोलवलकर ने लिखा था, ‘महिलाएं मुख्य रूप से पहले मां हैं. जिन्हें अपने बच्चों को पालना-पोसना और उनमें अच्छे संस्कार डालना चाहिए.’