यह कई लोगों का व्यक्तिगत अनुभव होगा कि अगर उन्हें सामने से आती कार में महिला ड्राइवर नजर आ जाए तो वे सड़क पर कुछ ज्यादा ही सतर्क होकर चलने लगते हैं. साथ ही महिलाओं के प्रति कोई दुराग्रह न रखने वाले भी दबी जुबान से यह स्वीकार करते नजर आ सकते हैं कि महिला ड्राइवरों के साथ दुर्घटना की संभावना हमेशा ज्यादा होती है. यह लोगों में अकारण फैली एक धारणा भर नहीं है बल्कि कई सारे उदाहरण और शोध कुछ इस तरफ ही झुके हुए लगते हैं कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले बुरी ड्राइवर होती हैं.

महिलाओं के इस क्षेत्र में खराब प्रदर्शन को कुछ मनोवैज्ञानिक हेलो इफ़ेक्ट से जोड़कर देखते हैं. हेलो इफ़ेक्ट से प्रभावित व्यक्ति अपने या अपने समुदाय के साथ किए गए व्यवहार के अनुरूप व्यवहार का प्रदर्शन करने लगता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्कूलों में देखने को मिलता है. जैसे कि अगर दो तकरीबन एक सी बुद्धिमत्ता वाले बच्चे हैं लेकिन उनमें से एक को मेधावी छात्र समझा जाता है और दूसरे को कमजोर तो स्कूली परीक्षाओं में इस बात की ज्यादा संभावना होती है कि मेधावी बच्चा दूसरे के मुकाबले कहीं बेहतर प्रदर्शन करे. यह सिद्धांत महिलाओं पर भी जस का तस लागू होता है. हमारे सामूहिक मानस में यह बात बैठ चुकी है कि महिलाएं ढंग से वाहन नहीं चला सकतीं. ज्यादातर महिलाएं यह धारणा स्वीकार कर उसी तरह से व्यवहार करती हैं और शायद इसलिए यह आम राय और पुख्ता होती चली गई.

मिशिगन विश्विद्यालय की एक शोध टीम ने 2011 में तकरीबन 65 लाख कार दुर्घटनाओं का अध्ययन किया था. इस शोध में पाया गया कि लगभग 20.5 प्रतिशत दुर्घटनाएं तब घटी हैं जब दोनों चालक महिलाएं थीं. पुरुष-पुरुष चालकों द्वारा की गई दुर्घटनाएं लगभग 32% रहीं और महिला-पुरुष चालकों के बीच दुर्घटना का यह आंकड़ा 47.6% रहा. इन सभी आंकड़ो में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि शोधकर्ताओं के एक गणितीय अनुमान के मुताबिक बाद के दो आंकड़े तो तकरीबन सही थे लेकिन पहला आंकड़ा ज्यादा था. शोधकर्ताओं की राय थी कि महिलाओं द्वारा ही चलाए जा रहे तो वाहनों के बीच दुर्घटना का आंकड़ा 15% के आसपास रहना चाहिए था. यहां यह बात भी महत्वपूर्ण है कि महिलाएं कुल पुरुष ड्राइवरों की संख्या के मुकाबले एक चौथाई से भी कम थीं.

इस शोधपत्र के प्रमुख लेखक माइकल सिवाक कार दुर्घटनाओं में चालक (मनुष्य) की भूमिका का अध्ययन कर रहे हैं. उनका कहना है कि महिलाओं को सीधे-सीधे बुरा चालक नहीं कहा जा सकता, वह भी तब जब पुरुष प्रतिदिन महिलाओं की तुलना में मीलों ज्यादा ड्राइव करते हैं. इस मामले में महिलाएं हमेशा पुरुषों से कम अनुभवी रहती हैं. इसके साथ ही सिवाक एक सामाजिक प्रवृत्ति की ओर भी इशारा करना नहीं भूलते कि दो महिला चालकों में हुई टक्कर को हमेशा पुरुष चालकों में हुई टक्कर की तुलना में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है.

महिलाओं के बुरा ड्राइवर होने के पीछे सबसे पहला और महत्वपूर्ण तर्क यही दिया जाता है कि आमतौर पर महिलाएं ड्राइव करने के बजाय सवारी करना ज्यादा पसंद करती हैं. अगर उनके साथ कोई पुरुष मौजूद है तो अधिकतम सम्भावना इस बात की होती है कि वह कार ड्राइव करेगा. अब चूंकि महिलाएं कम मौकों पर कार चलाती हैं इसलिए उन्हें इसका अभ्यास भी कम होता है. कम अभ्यास और कम अनुभव के चलते उनकी कुशलता भी कम होती है. यह ठीक वैसे ही है जैसे हफ्ते में एक बार तैरने वाला तैराक दिन में दो बार तैरने वाले तैराक से ज्यादा कुशल नहीं हो सकता और इस बात का संबंध महिला या पुरुष होने से बिलकुल नहीं है.

इस विषय पर हुए तकरीबन सभी शोध किसी अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंचे है क्योंकि महिलाओं और पुरुषों के पास अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग मनोदशाओं के ड्राइविंग अनुभव होते हैं. इसके साथ ही, एक ही परिस्थिति से निपटने के उनके तरीके भी अलग-अलग होते हैं. जैसे महिलाएं अक्सर बच्चों के साथ यात्रा कर रही होती हैं. बच्चों को संभालना जमीन पर ही मुश्किल काम है तो फिर अगर महिला पहियों पर हो तो उसका ध्यान भटकना स्वाभाविक है और यहां पर ध्यान भटकने का मतलब दुर्घटना को बुलावा देना है.

दुनियाभर से लिए गए सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े बताते हैं कि पुरुष चालकों के साथ होने वाली ज्यादातर दुर्घटनाएं जहां तेज गति या असंतुलन के कारण होती हैं तो वहीं महिलाएं अक्सर टी (T) प्वाइंट पर मुड़ते हुए दुर्घटनाओं का शिकार होती हैं. इस तरह की दुर्घटनाओं के पीछे वैज्ञानिक महिलाओं की शारीरिक संरचना को जिम्मेदार ठहराते हैं. दरअसल में महिलाएं अपेक्षाकृत कम ऊंचाई की होती है और इसके साथ ही वे बहुत कम मौकों पर खिड़की से झांककर बाहर देखने की जहमत उठाती हैं. ये शारीरिक और स्वभावगत कमियां इस तरह की टक्कर का कारण बनती हैं.

शारीरिक संरचना अलग होने के साथ-साथ दिमागी तौर पर भी महिलाएं पुरुषों से अलग होती हैं. जैविक विकास के क्रम में पुरुष शिकार करते रहे हैं और महिलाएं घर में रहकर एक ही समय पर अलग-अलग काम निपटाती थीं. मनोवैज्ञानिकों का एक बड़ा तबका मानता है कि लंबे समय तक शिकार करने के कारण महिलाओं की तुलना में पुरुषों में दूरी और समय का आकलन करने की क्षमता बेहतर होती चली गई वहीं महिलाएं एक साथ कई कामों को करने में कुशलता हासिल करती चली गईं. पुरुषों की यह क्षमता उन्हें बेहतर ड्राइवर बनने में मदद करती है. वे तेजी से दूरी और समय का अंदाजा लगाकर संभावित दुर्घटना की की स्थितियां समझ सकते हैं. इसी निपुणता के साथ वे उससे बचने का रास्ता निकाल लेते हैं. इसके उलट महिलाओं की कई काम साथ करने की कुशलता उनके खिलाफ जाती है. यह आदत ही उन्हें एक तरफ ध्यान नहीं लगाने देती जिससे वे सड़क पर एकाग्र नहीं हो पातीं. महिलाओं के अच्छा ड्राइवर न होने के पीछे एक यह तर्क भी दिया जाता है.