नोटबैंक के जरिए वोटबैंक को साधने की कोशिश में केंद्र सरकार ने देश को कतार में ला खड़ा किया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि दो से तीन हफ्ते यानी तकरीबन 21 दिन में चीजें पटरी पर आ जाएंगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके लिए 50 दिन मांगते हैं. सवाल उठता है कि बयानों का यह गड़बड़झाला क्यों है. दोनों के अनुमान अलग-अलग क्यों हैं? दरअसल, यह ठोक बजा कर फैसला नहीं किए जाने का नतीजा है.

ढाई साल गुजर चुके हैं देश की बागडोर संभाले, पर व्यवस्थाएं अब तक नहीं संभल पाईं. जनता की उम्मीदों और उससे किए गए वादों पर हम खरे नहीं उतर पाए, यह बात भाजपा शायद शिद्दत के साथ महसूस कर रही थी. उसे शायद यह भी लग रहा था कि देशभक्ति की चाशनी में लिपटे वाक्यों या नारों से छद्म राष्ट्रवाद तो पैदा किया जा सकता है लेकिन, वह टिकाऊ नहीं होता. विदेशों में रखा काला धन हम देश में नहीं ला पाए, पर कम से कम देश में छुपे काले धन को सामने लाकर दिखाएं. जनता को दिखाना बहुत जरूरी है कि हम बदलाव की कोशिशों में लगे हैं, शायद यही सब सोच कर बड़े नोटों को अमान्य करने का फैसला झटके में लागू कर दिया गया.

सवाल यह है कि अगर इस योजना को अमल में लाना ही था, तो जो 50 दिन अब जनता से मांगे जा रहे हैं और जो तैयारी अब की जाएगी, वह इसे लागू करने के पहले क्यों नहीं की गई

बेशक, यह योजना अच्छी है. बहुत हद तक कारगर भी. कम से कम नक्सलियों या आतंकियों के पास रखे पैसे पर कुछ लगाम तो लगेगी. पर इस कदम के पीछे वोटबैंक हासिल करने की जो मंशा दिखती है वह बेहद खतरनाक है. कुछ वैसे ही जैसे जाति, धर्म या आरक्षण के नाम पर देश को बांट देना और फिर इस कवायद से वोटों का इंतजाम करना. कालेधन को बाहर लाने के नाम पर देश की जनता में छद्म राष्ट्रवाद पैदा करने की कोशिश खतरनाक है. खबरें आई हैं कि मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के बैंक खाते में नोटबंदी की घोषणा से एक दिन पहले करोड़ों रुपए जमा कराए गए. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के पंजाब शाखा के अध्यक्ष संजीव कंबोज पर आरोप लगाए कि 2000 के नोट बाजार में आने से पहले कंबोज के पास दिखे. अगर यह सच है तो कैसे?

खबरें तो और भी हैं. जैसे कि दिल्ली के कुछ इलाकों में नोटबंदी से परेशान घरेलू सहायिकाओं को खुले नोट देने का प्रलोभन दे रईसजादे कपड़े खोलने को कह रहे हैं. अब तक कतार से परेशान हो कई लोगों ने खुदकुशी कर ली. सच तो यह है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से मध्य और निम्न वर्ग बुरी तरह त्रस्त हुआ है. खाने-पीने से लेकर आने-जाने तक का संकट उठ खड़ा हुआ है. महज हफ्ते भर में जिंदगी बेपटरी हो चुकी है. आम आदमी की इस परेशानी को प्रधानमंत्री जैसा खास शख्स नहीं समझ सकता.

सवाल यह है कि अगर इस योजना को अमल में लाना ही था, तो जो 50 दिन अब जनता से मांगे जा रहे हैं और जो तैयारी अब की जाएगी, वह इसे लागू करने के पहले क्यों नहीं की गई? किस बात की हड़बड़ी थी? यह नाटकीय भावुक अपील कर किन मुद्दों से देश का ध्यान हटाने की साजिश रची जा रही है?

इस नोटबंदी के फरमान के बाद बड़ी तेजी से बैंकों में नकदी की सप्लाई हुई है. ये बैंक पैसा आने के बाद दोबारा जो कर्ज देंगे तो आखिर किन बड़े आसामियों को? इस पर नजर रखने की जरूरत है.

2008 की आर्थिक मंदी से अगर यह देश उबर सका था या कहें कि उस तरह चपेट में नहीं आया था जैसे अमेरिका या बाकी यूरोपीय देश तो इसकी एक बड़ी वजह थी कि यहां के बैंक केंद्रीकृत रहे. एक दूसरी बड़ी वजह यह भी थी कि इस देश के मध्य और निम्न वर्ग की महिलाओं के पास घर में एक छुपा हुआ ‘निजी बैंक’ है. यानी वे पैसे जो अपने बुरे दौर के लिए वे अपनी हैसियत के मुताबिक खाद्यानों के डब्बों में घर के पुरुषों से बचाकर रखती रही थीं. यह ‘निजी बैंक’ उन धनाढ्यों के ‘निजी बैंक’ की तरह नहीं जिसका मकसद ही काला धन छुपाना होता है. इस फैसले ने उस निजी बैंक को तोड़ कर रख दिया. इस ‘निजी बैंक’ के पैसे तेजी से देश के केंद्रीकृत और निजी हाथों के बैंकों में जमा होने लग गए.

गौर करें तो ये बैंक अभी नकदी के संकट से जूझ रहे थे. इस नकदी के संकट की दो बड़ी वजहें हैं. एक तो यह कि बड़े उद्योगपतियों ने बैंकों का पैसा दबा लिया है और दूसरा कि रियल एस्टेट के कारोबार में बैंकों का पैसा डूबा है. इस नोटबंदी के फरमान के बाद बड़ी तेजी से बैंकों में नकदी की सप्लाई हुई है. ये बैंक पैसा आने के बाद दोबारा जो कर्ज देंगे तो आखिर किन बड़े आसामियों को? इस पर नजर रखने की जरूरत है.

केंद्र के इस फैसले से जाहिर तौर पर मध्य और निम्न वर्ग के ‘निजी बैंक’ टूट गए. बड़े कारोबारियों के निजी बैंक अब भी सुरक्षित हैं. हम राष्ट्रवाद के नाम पर छले जा रहे हैं. अब जो 50 दिन हमसे मांगे जा रहे हैं और जो तैयारी की जाएगी, पहले कर ली जाती तो शायद इस देश का गरीब तबका न ऐसे परेशान होता, न ही उसके निजी बैंक टूटते.