कविता युवा साहित्यकार हैं और दिल्ली में रहती हैं.


मैं अपनी जिंदगी के उस मुकाम पर पहुंच गई हूं कि अब बचपन हर दिन याद नहीं आता. वे स्मृतियां अक्सर तीज-त्यौहारों के समय ही कौंधती हैं और वह भी तब जब मैं इन त्यौहारों को अपनी बेटी के साथ मनाती हूं. तब ऐसा लगता है कि मैं बेटी के साथ वह त्यौहार मनाते हुए खुद अपना बचपन फिर जी रही हूं. हालांकि मेरी बेटी और इस दौर के बच्चे जिस तरह त्यौहार मनाते हैं वह हमारे समय से एकदम जुदा है.

हाल ही में दीवाली बीती है. दीवाली के नाम पर जो बात मुझे सबसे ज्यादा याद आती है वो है मिट्टी वाला हमारा घरौंदा. इसे बनाने के लिए दीपावली आने के बहुत पहले से ही हम सब बच्चे दोपहरियों में भटकना शुरू कर देते थे. घरौंदे बनाने का जरूरी सामान जैसे एस्बेस्टस, ईंटें और अलग-अलग तरह का कबाड़ लगने वाला सामान जो हमारे काम आ सकता था, को इकट्ठा करने का काम हम दीवाली के हफ्तों पहले शुरू कर देते थे. हम सारे दोस्त ये चीजें इकट्ठे करते हुए अगली-पिछली कॉलोनी, पार्क, कंस्ट्रक्शन की जगहें, सब छान मारते. इस अभियान के दौरान हमारे लड़ाई-झगड़े भी होते पर आखिर में सब के पास उसकी जरूरत का सामान होता. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि किसने क्या खोजा है. कुल मिलकर यह एक टीमवर्क होता था.

खोज अभियान ख़त्म होने के बाद घरौंदा बनना शुरू होता. कभी-कभी तो इसमें महीना भर भी लग जाता था. मुझे घर बनाने का चाव तो बहुत था लेकिन यह मेरे बस का काम नहीं था. इसकी दो वजहें थीं. एक तो मैं बहुत छोटी थी और दूसरी उस तरह की कलाकार भी नहीं थी. सो मेरे यहां घर हमेशा मेरी बड़ी बहन बनाती थीं. वो पहले उसका ढांचा तैयार करती थीं, फिर उस पर मिट्टी चढ़ातीं और सूखने पर चूने और गेरू से उसकी पुताई होती. हमेशा व्यस्त रहने वाली मां भी बिना कुछ कहे इस काम में दीदी की मदद के लिए वक्त निकाल लेती थीं और दीवार पर तरह-तरह की आकृतियां रच देती थीं. इस तरह हमारा सुंदर सा घर तैयार हो जाता था.

एक बार मैंने यह कहते हुए विद्रोह कर दिया कि मैं क्यों खाऊं चकला-बेलन? मैंने मां से सवाल किया कि सब एक जैसा क्यों नहीं खाते और सिर्फ लड़के ही चित्रगुप्त की पूजा क्यों करते हैं?

दीपावली के दिन हम घरौंदे में छोटे-छोटे मिट्टी के बर्तन रखते और उनमें बताशे, चीनी के खिलौने, मिठाइयां और लईया भरकर रखते थे. अम्मा इसे घर भरना कहती थी, ‘भाई का घर भरना.’ मैं छोटी-सी थी फिर भी मुझे यह बात पसंद नहीं आती थी. सिर्फ भाई का घर क्यों, मेरा भी क्यों नहीं? इसलिए मां जब उसमें रखी चीजें भाई को खिलाने भेजती तो मैं पहले ही चोरी-छिपे थोड़ा खुद खा लेती थी. समझ नहीं आता था कि जब सारी मेहनत हमने की तो उस पर भाई का हक़ पहले कैसे है.

ऐसा ही कुछ मैं गोवर्धन पूजा वाले दिन महसूस करती थी. उस दिन हमारे यहां चावल के आटे के पकवान बनते थे. ये पकवान कलम-दवात और रसोई से जुड़े सामान जैसे चकला, बेलन, तवा, चूल्हा, चम्मच की आकृतियों के होते थे. घर के मर्द चित्रगुप्त की पूजा करते और औरतें गोवर्धन की. इसके बाद अन्नकूट होता और प्रसाद में पुरुष चावलों का बना वही कलम-दवात खाते और महिलाएं रसोई के बरतन.

मां हमें भी कभी चकला-बेलन तो कभी चम्मच-कटोरी खाने को दे देती थी. मुझे इस रस्म और इसमें होने वाले भेदभाव से भी दिक्कत थी. एक बार मैंने यह कहते हुए विद्रोह कर दिया कि मैं क्यों खाऊं चकला-बेलन? मैंने मां से सवाल किया कि सब एक जैसा क्यों नहीं खाते और सिर्फ लड़के ही चित्रगुप्त की पूजा क्यों करते हैं? मां ने यह कहते हुए मुझे समझाने की कोशिश की कि उस समय हमें भाई दूज की पूजा करनी होती है और एक ही वक्त में दो पूजा कैसे की जा सकती हैं. फिर बहलाते हुए उन्होंने यह भी पूछा कि क्या मुझे अपने भाइयों की लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना नहीं करनी चाहिए? तब इन बातों से मैं और चिड़ गई. मुझे मां के ये फुसलावन तर्क कमजोर और बेतुके लगे. इसके बाद मैं सवाल पर सवाल करती गई जिनके उन्होंने अपने हिसाब से जवाब भी दिए लेकिन उनसे मैं संतुष्ट नहीं थी.

बाद में मैंने एक राह और निकाली. गोवर्धन पूजा के बाद मैं भी चित्रगुप्त की पूजा करती क्योंकि यह कलम दवात की पूजा थी. और मैं इस पर अपना हक़ समझती थी

उस दिन मैंने नाराज होकर चकला-बेलन फेंक दिए और कलम-दवात खाने की अपनी जिद पूरी करवाकर ही मानी. इस घटना के बाद सालों-साल मैंने अपने हिस्से के चकला बेलन फेंके और कलम-दवात खाती रही. जब मांगने से मिला मांगकर वरना चुराकर. बाद में मैंने एक राह और निकाली. गोवर्धन पूजा के बाद मैं भी चित्रगुप्त की पूजा करती क्योंकि यह कलम दवात की पूजा थी. और मैं इस पर अपना हक़ समझती थी.

मैंने अपने बाद की पीढ़ी को किसी भी त्यौहार के बारे में यह नहीं बताया है कि कौन सी पूजा मर्द करेंगे कौन सी औरतें. त्यौहार और रस्मों पर हर इंसान का हक़ होता है जिसके लिए उसका स्त्री पुरुष होना जरूरी नहीं है. मैंने यह लड़कर लिया है. मैं नहीं चाहती कि आगे की पीढियां भी इसमें अपनी उर्जा खर्च करें.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)