इंसान की कल्पना हमेशा श्रेष्ठतम की खोज में रहती है. ऐसा शुरू से चला आ रहा है इसलिए स्वास्थ्य की बात आते ही सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य के लिए चिरयौवन जैसे शब्द हर संस्कृति में पाए जाते हैं. लेकिन यह एक आदर्श स्थिति है. ऐसी स्थितियां हासिल करना बेहद मुश्किल होता है लेकिन चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों की तमाम कोशिशें चलतीं इसी तरफ हैं. और इस हफ्ते हुई एक खोज चिरयौवन या कायाकल्प जैसे विचारों की दिशा में अब तक की सबसे लंबी छलांग कही जा सकती है. यह खोज जीन थेरेपी के क्षेत्र में हुई है.

बीते कुछ दशकों में जीन थेरेपी एक क्रांतिकारी चिकित्सा पद्धति के रूप में उभरी है. ऐसी आनुवांशिक बीमारियां जिनका इलाज प्रचलित चिकित्सा विज्ञान नहीं कर सकता, इस थेरेपी से दूर की जा सकती हैं. लेकिन इस थेरेपी की भी अपनी सीमाएं हैं.

जींस की बुनियादी इकाई है डीएनए. डीएनए की जरा सी विकृति जीन्स की खामी बन सकती है और जो आगे जाकर आनुवांशिक बीमारियों की वजह बनती 

आनुवांशिक बीमारियां माता-पिता से मिलने वाले जींस में गड़बड़ियों की वजह से उनकी संतान में आती हैं. जींस मानव शरीर की कोशिकाओं में मौजूद वो बुनियादी इकाई है जो शारीरिक खूबियां-खामियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते हैं. और जींस की बुनियादी इकाई है डीएनए. डीएनए की जरा सी विकृति जीन्स की खामी बन सकती है और जो आगे जाकर आनुवांशिक बीमारियों की वजह बनती है.

मानव शरीर के कुछ ही अंगों में कोशिकाएं समय के साथ नष्ट होती और बनती रहती हैं. नई कोशिकाओं का निर्माण उनमें विभाजन की प्रक्रिया से होता है. जीन थेरेपी की प्रक्रिया में कोशिका विभाजन की अहम भूमिका होती है. दरअसल यह थेरेपी किसी कोशिका के डीएनए से छेड़छाड़ के बुनियादी सिद्धांत पर आधारित है.

मान लिया जाए किसी व्यक्ति के डीएनए में गड़बड़ी की वजह से उसे कोई त्वचा रोग है. अब जीन थेरेपी के तहत संबंधित व्यक्ति के उस जींस की पहचान की जाएगी जो इस बीमारी के लिए जिम्मेदार है. इसके बाद जींस में मौजूद डीएनए की विकृति का पता लगाया जाता है. अब अगर किसी प्रक्रिया से इस डीएनए की विकृति दूर कर दी जाए तो जींस की खामी भी दूर हो जाती है. इस तरह वह बीमारी भी ठीक हो जाती है.

प्रचलित जीन थेरेपी के तहत संबंधित डीएनए का सही हिस्सा या पूरा डीएनए किसी अंग की कोशिकाओं पहुंचा दिया जाता है. धीरे-धीरे ये कोशिकाएं अपनी संख्या बढ़ा लेती हैं और आखिरकार बीमारी पैदा करनी वाली कोशिकाओं की जगह बिल्कुल नई कोशिकाएं आ जाती है.

अब अगर मान लें कि बीमारी मानव शरीर के उन अंगों से संबंधित है जिनकी कोशिकाएं एक समय के बाद विभाजित होना बंद कर देती हैं तो फिर इसे कैसे ठीक किया जाए? जीन थेरेपी अब तक इस चुनौती से पार नहीं पा सकी थी लेकिन इसी हफ्ते जारी हुए शोधपत्र के मुताबिक वैज्ञानिकों ने इस अहम बाधा को भी पार कर लिया है.

जीन थेरेपी की एक तकनीक है ‘क्रिस्पर’. जिस तरह हम अपने कंप्यूटर में ‘कॉपी-पेस्ट’ को अंजाम देते हैं, क्रिस्पर के जरिए भी डीएनए को कॉपी-पेस्ट किया जा सकता है

मानव शरीर में आंखों का तंत्र, लीवर, हृदय और सबसे महत्वपूर्ण अंग मस्तिष्क की कोशिकाएं एक समय के बाद विभाजित नहीं होतीं. अगर कोई आनुवांशिक बीमारी इनसे संबंधित है तो प्रचलित जीन थेरेपी से उसे ठीक करना तकरीबन नामुमकिन था. लेकिन एक तकनीक के विकास ने जीन थेरेपी की इस सबसे बड़ी चुनौती पर विजय हासिल कर ली है.

यह खोज इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि अब इंसान न सिर्फ मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां ठीक कर सकता है बल्कि जीन थेरेपी से उसे और बेहतर बनाने की भी कोशिश कर सकता है. यह ताजा खोज कैलिफोर्निया के साल्क इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने की है.

जीन थेरेपी की एक तकनीक है ‘क्रिस्पर’. जिस तरह हम अपने कंप्यूटर में ‘कॉपी-पेस्ट’ को अंजाम देते हैं, क्रिस्पर के जरिए भी डीएनए को कॉपी-पेस्ट किया जा सकता है. इस तकनीक के द्वारा किसी डीएनए के एक विशेष हिस्से को काटकर उसकी जगह दूसरा कृत्रिम और स्वस्थ हिस्सा लगाया जा सकता है. चूंकि वयस्क कोशिकाओं में डीएनए तक आसानी से नहीं पहुंचा जा सकता सो यहां क्रिस्पर की वर्तमान ‘कॉपी-पेस्ट’ तकनीक काम नहीं करती.

साल्ट इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने क्रिस्पर के आधार पर ही एक नई तकनीक ‘हिटी’ का विकास किया है जो विभाजित न होने वाली कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव कर सकती हैं. हिटी के जरिए कोशिकाओं में खुद की मरम्मत का काम करने वाले तंत्र से छेड़छाड़ की जाती है और इस तरह जरूरी डीएनए में बदलाव कर दिया जाता है.

चूहे पर इस नई तकनीक का परीक्षण सफल साबित हुआ है

कुछ चूहों में जींस की विकृति की वजह से एक प्रकार का अंधापन आ जाता है. इसे रेंटिनाइटिस पिगमेंटोसा कहते हैं. साल्ट इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने हिटी तकनीक के माध्यम से एक चूहे की इसी बीमारी को आंशिक रूप से दूर करने में सफलता हासिल की है. वैज्ञानिकों ने इस बीमारी के शिकार एक तीन हफ्ते के चूहे के रेटिना की कोशिकाओं में एक वायरस भेजा था. इस वायरस में जीन को जरूरत के मुताबिक सुधारने के लिए जरूरी निर्देश, डीएनए के रूप में थे.

उम्र बढ़ने के साथ जो बीमारियां पैदा होती हैं वे इस तकनीक से दूर की जा सकती हैं. तब व्यक्ति की आयु तो बढ़ेगी लेकिन वो बूढ़ा नहीं होगा

जब यह चूहा आठ हफ्ते का हुआ तो वैज्ञानिकों ने पाया कि वह प्रकाश को लेकर प्रतिक्रिया देने लगा है. यानी कि उसकी आंखों की रौशनी वापस आ रही है. इसका मतलब था कि इस तकनीक से चूहे की रेटिना की कोशिकाओं में सुधार हो रहा है. दुनिया के हर चार हजार इंसानों में एक इस बीमारी से आंशिक या पूरी तरह पीड़ित होता है. इस तरह भविष्य में यह तकनीक इंसानों के लिए भी कारगर सिद्ध हो सकती है. इस शोध से जुड़े प्रोफेसर इजपिसुआ बेलमोंटे कहते हैं, ‘हम पहली बार ऐसी कोशिका में प्रवेश करने में सफल हुए हैं जो विभाजित नहीं होती. यहां हम अपनी मर्जी के मुताबिक डीएनए में बदलाव कर सकते हैं.’

इंसानों के लिए यह तकनीक ईश्वरीय चमत्कार साबित हो सकती है

इस तकनीक के विकास का मतलब है कि अब वैज्ञानिक इंसान के दिमाग, दिल और लीवर जैसे महत्वपूर्ण अंगों के जींस में भी बदलाव कर सकते है. और यह बदलाव सिर्फ किसी बीमारी से बचने के लिए नहीं होगा.

उम्र बढ़ने के साथ जो बीमारियां पैदा होती हैं वे इस तकनीक से दूर की जा सकती हैं. तब व्यक्ति की आयु तो बढ़ेगी लेकिन वो बूढ़ा नहीं होगा.

किसी भी इंसान में दिमाग और दिल दो सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण अंग हैं. यह तकनीक इन अंगों की भी आनुवांशिक बीमारियां ठीक करके उन्हें और कारगर बना सकती है. यही वो रास्ता है जो कायाकल्प या चिरयौवन जैसी आदर्श स्थिति की दिशा में जाता है.