दुनिया के ज्यादातर साहित्यालोचकों और संपादकों ने लियो टॉल्सटॉय को 19वीं सदी का महानतम साहित्यकार माना है. आज भी उनकी कृति ‘अन्ना केरेनिना’ और ‘वॉर एंड पीस’ उस सदी की सबसे महान साहित्यिक कृतियों में मानी जाती हैं. लेकिन टॉल्सटॉय का अपना निजी जीवन और दर्शन उनके साहित्य संसार पर कहीं भारी रहा. इतना कि टॉल्सटॉय के जीवित रहते ही रूस और अन्यत्र भी एक ‘टॉल्सटॉयवाद’ तक चल पड़ा था. दुनिया में ऐसे कम ही साहित्यकार हुए होंगे, जिन्होंने अपने समकालीन समाज को इस तरह प्रभावित किया हो कि प्रचलित नैतिकता और जीवन के तमाम अस्तित्ववादी प्रश्नों की जड़ें ही हिल जाएं.

बच्चों के बीच के आपसी संवाद को आधार बनाकर लिखी गई उनकी लघु-पुस्तिका ‘विज़डम ऑफ चिल्ड्रन’ में बच्चे आपस में और अपने बड़ों से कुछ ऐसे सरल सवाल पूछते हैं कि उसका नैतिक और संतोषजनक जवाब देने में किसी के भी पसीने छूट जाएं. हालांकि भीतर तक झकझोर देनेवाली ऐसी सरलता और सहजता दूसरे रूसी लेखकों में भी देखी गई. लेकिन विरोधियों में भी करुणा जगा देने वाली यह सरलता टॉल्सटॉय में उस स्तर को जाकर छूती थी, जो उपनिषद् के ऋषियों से लेकर कबीर और गौतम बुद्ध जैसों में ही देखी जाती है. भारतीय परंपरा में इसे ‘ऋजुता’ कहा गया है, जो आध्यात्मिक ऊंचाई के शीर्ष पर जाकर ही प्राप्त होती है. आधुनिक भारतीय संदर्भों में यह सरलता कुछ-कुछ महात्मा गांधी, विनोबा और जेपी जैसों के व्यक्तित्व में भी देखने को मिलती है.

एक समय जब टॉल्सटॉय ने अपने लिए दुनिया के महान ग्रंथों से सुंदर विचारों के हीरा-मोती चुनने का उपक्रम शुरू किया, तो उसमें महान यूनानी विचारकों, बुद्ध, लाओत्से और ईसा मसीह के साथ-साथ वेद और उपनिषदों के वचनों को भी यहां-वहां नोट किया

उस दौर के अन्य पश्चिमी विचारकों की तरह टॉल्सटॉय को भी पूरब के ज्ञान और चिंतन ने स्वाभाविक ही आकर्षित किया. एक समय जब टॉल्सटॉय ने अपने लिए दुनिया के महान ग्रंथों से सुंदर विचारों के हीरा-मोती चुनने का उपक्रम शुरू किया, तो उसमें महान यूनानी विचारकों, बुद्ध, लाओत्से और ईसा मसीह के साथ-साथ वेद और उपनिषदों के वचनों को भी यहां-वहां नोट किया. इसे उन्होंने ‘सर्किल ऑफ रीडिंग’ या ‘कैलेंडर ऑफ विज़डम’ के रूप में संकलित किया था. इनमें ‘हितोपदेश’ के कथन तो कई स्थानों पर मिलते हैं. लेकिन प्राच्य के प्रति टॉल्सटॉय का यह आकर्षण अपना बौद्धिक ज्ञान बढ़ाने के लिए नहीं था. बल्कि उस समय वे अपने जीवन में घनघोर निराशावादी और अस्तित्ववादी संकट के दौर से गुजर रहे थे. स्थिति इतनी विकट थी कि उन्होंने अपनी बंदूक को सात तालों के भीतर केवल इसलिए बंद करके रख दिया था कि कहीं वे स्वयं अपनी जान न ले बैठें.

एक तरफ दुनिया का साहित्यिक तबका उन्हें सिर आंखों पर बिठाए हुए था और रियासत के बंटवारे में साढ़े छह हजार गांव उनके हिस्से आए थे; लेकिन दूसरी ओर वे अपने जीवन का वास्तविक अर्थ ढूंढ़ रहे थे. दुनिया के कई वैज्ञानिकों, दार्शनिकों और धार्मिक नेताओं से उन्होंने प्रत्यक्ष संवाद किया कि कोई उन्हें इस सवाल का जवाब दे दे कि उनके होने का अर्थ या उद्देश्य क्या है. पदार्थवादी विज्ञान, तर्कवादी फिलॉसफी और धर्म की प्रचलित ईसाई व्याख्याएं उन्हें संतुष्ट न कर सकीं. बल्कि उनके प्रश्नों ने स्वयं उस समय के कुलीन तबकों में ग्लानि, अपराधबोध और निरर्थकता का बोध भरना शुरू कर दिया था.

ऐसे समय में उपनिषद्, बुद्ध और लाओत्से के चिंतन ने टॉल्सटॉय को धर्म और श्रद्धा का एक नया ही अर्थ ढूंढ़ने में मदद की. टॉल्सटॉय ने रामायण और महाभारत भी पढ़ी थी. लेकिन जब शोपनहार के दर्शन ने उन्हें प्रभावित किया, तो उसके पीछे उपनिषदों और बुद्ध का चिंतन ही कार्य कर रहा था. क्योंकि शोपनहार स्वयं उपनिषदों और बुद्ध से अत्यधिक प्रभावित थे और इन पर उन्होंने लिखा भी था. इसलिए जब तत्वज्ञान के बजाय टॉल्सटॉय ने अध्यात्म की राह पकड़ी, तो उन्होंने सीधे वेदांत, बुद्ध और लाओत्से को देखना शुरू किया. ईसा मसीह के संदेशों का सही मर्म भी उन्हें तभी जानने में आया. तब उन्हें निश्छल श्रद्धा का एक ऐसा स्वरूप दिखाई पड़ा, जिसकी वजह से समाज के सबसे निचले तबके की जीजिविषा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी दम नहीं तोड़ती है. इस तरह अहिंसा, त्याग, मानव सेवा, ब्रह्मचर्य, करुणा, निर्भयता, शरीर-श्रम और असंग्रह जैसे विचारों ने मानो टॉल्सटॉय के जीवन को एक नई राह दे दी.

‘स्त्री-पुरुष संबंध’ नाम के अपने पुस्तक में जब उन्होंने ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम पर बल दिया, तो उन्हें अपनी खुद की उम्र और स्वयं तेरह-तेरह बच्चों का पिता होने की सच्चाई कचोटती थी

लेकिन विडंबना यह थी कि एक तरफ उन्हें व्यक्तिगत स्तर अपने प्रश्नों का जवाब मिलता जा रहा था और दूसरी तरफ उनकी गृहस्थी भावनात्मक झंझावातों का शिकार होती जा रही थी. सत्य को जीवन में उतारने का प्रयास करने वाले किसी भी साधक-साधिका को देर-सवेर यह समस्या आती ही है. भारत में महात्मा गांधी के साथ भी हमने ऐसा ही कुछ देखा. टॉल्सटॉय को उस समय दुनिया के किसी भी लेखक से ज्यादा रॉयल्टी मिलती थी. और ऐसे समय में कोई गृहस्थ यह कह दे कि लेखनकर्म एक प्रकार की चोरी और अकर्मण्यता जैसी है, इसलिए उसे यह रॉयल्टी नहीं चाहिए, तो पत्नी और बच्चों पर क्या बीतेगी?

टॉल्सटॉय को स्वयं अपने सिद्धांतों और अपने व्यवहारों के बीच की खाई कचोटने लगी थी. वे चाहते थे कि जो उपदेश वे समाज को देते हैं, उसे सबसे पहले उन्हें ही अपने जीवन में उतारना चाहिए. और निर्भीक इतने थे कि एक मजदूर, किसान या बढ़ई का जीवन जीने में न तो लोकलाज और न ही सुख-सुविधा छिन जाने का डर सताता था. लेकिन उनके ऐसे कुछेक प्रयासों को जहां उनके कुल-परिजन और साथियों ने सनक और पागलपन करार दिया, वहीं किसान और बढ़ई भी समझते थे कि यह किसी अमीरजादे के नए चोंचले या शौक जैसा है. पोप ने तो उल्टे उन्हें ईसाई धर्म का विरोधी बताकर उनका बहिष्कार ही कर रखा था. लेकिन टॉल्सटॉय हार माननेवालों में से नहीं थे. निजी संपत्ति और संग्रह से छुटकारा पाने के लिए उन्हें अपना इस्टेट और अपने साहित्य का सर्वाधिकार अपनी पत्नी के नाम करते देर न लगी. लेकिन उम्र के जिस पड़ाव पर वो थे, उसमें थोड़ी देर उन्हें अवश्य हो गई थी.

तभी तो ‘स्त्री-पुरुष संबंध’ नाम के अपने पुस्तक में जब उन्होंने ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम पर बल दिया, तो उन्हें अपनी खुद की उम्र और स्वयं तेरह-तेरह बच्चों का पिता होने की सच्चाई कचोटती थी. उन्होंने इस पुस्तक में एक स्थान पर लिखा- ‘जब मनुष्य जीवनभर (अज्ञानता के) अंधेरे में रहता है और उसे अचानक कहीं से (ज्ञान की) रोशनी दिखाई पड़ती है, तो उसे बड़ी खुशी होती है. लेकिन फिर उसे यह सोच कर बड़ा दुख होता है कि अहंकारवश उसने एक पशु का जीवन बिताया और अब वह अपने अतीत को मिटा नहीं सकता. दुख इसलिए भी होता है कि लोग कहेंगे- तुम तो कब्र में पैर लटकाए हो, इसलिए तुम्हारे लिये यह सब कहना ठीक है, लेकिन तुम्हारा खुद का जीवन पहले कैसा था. जाओ, हम भी जब बूढ़े हो जाएंगे न, तो हम भी तुम्हारी जैसी ही बातें करेंगे.’ हालांकि ज्यो-ज्यों उनकी आध्यात्मिक परिपक्वता दृढ़ होती गई और सत्य का साक्षात्कार होता गया, वैसे-वैसे वे इस द्वंद्व और ग्लानि से भी मुक्त होते गए.

टॉल्सटॉय के लिए अपने दाम्पत्य जीवन की पहेलियों को सुलझाना इतना आसान नहीं रहा. नाटक के रूप में लिखी गई अपनी अंतिम साहित्यिक रचना ‘दी लाइट शाइन्स इन दी डार्कनेस’ (अंधेरे में उजाला) में उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन की कटु सच्चाइयों को जीवंत करके रख दिया था

एक राजसी ठाट-बाट वाला यूरोपीय गृहस्थ भौतिक जीवन के उत्कर्ष पर जाकर जब अचानक संन्यासी जैसा व्यवहार करने लग जाए, तो पत्नी पर क्या बीतेगी. शुरुआती प्रेमालाप को छोड़कर पत्नी सोफिया के साथ प्रायः अनबन ही रही, लेकिन पत्नी ने टॉल्सटॉय की अनुपम कृतियों की पांडुलिपि की नकलनवीसी और संपादन जिस सफाई से किया और जिस व्यवस्थित रूप से और ध्यानपूर्वक टॉल्सटॉय के दैनिक जीवन को अपनी डायरी में सिलसिलेवार लिखा, उसकी मिसाल इतिहास में कम ही देखने को मिलती है. ऐसा मालूम होता है जैसे तमाम मतभेदों और सांसारिक ऊहापोह के बावजूद सोफिया को अपने पति की आध्यात्मिक ऊंचाई का एहसास हो चला था.

टॉल्सटॉय के लिए अपने दाम्पत्य जीवन की पहेलियों को सुलझाना इतना आसान नहीं रहा. नाटक के रूप में लिखी गई अपनी अंतिम साहित्यिक रचना ‘दी लाइट शाइन्स इन दी डार्कनेस’ (अंधेरे में उजाला) में उन्होंने अपने पारिवारिक जीवन की कटु सच्चाइयों को जीवंत करके रख दिया. टॉल्सटॉय के निजी जीवन की तरह ही यह रचना सांसारिक कसौटियों पर दुखांत, लेकिन आध्यात्मिक कसौटियों पर सुखांत ही कही जाएगी. टॉल्सटॉय इस नाटक का क्लाइमैक्स पूरी तरह से लिख नहीं पाए थे और उनकी डायरी में लिखे नोट के आधार पर इसे किसी तरह पूरा किया जा सका.

दुखांत और सुखांत का यह आध्यात्मिक विरोधाभास अपनी संतानों के साथ उनके संबंध में भी रहा. अपनी तेरह में से जीवित बचे आठ संतानों में जिस बेटी को वे सबसे ज्यादा चाहते थे, उसका नाम था - मारिया. रूसी में उच्चारण की घरेलू शैली में उन्हें वह प्यार से माशा बुलाते थे. रूसी भाषा में ‘माशा’ शब्द का अर्थ होता है महान या शक्तिशाली महिला. माशा नाम उनके लिए इतना प्रिय हो गया था कि अपनी ज्यादातर कहानियों में उन्होंने किसी न किसी छोटी बच्ची या महिला चरित्र का नाम माशा अवश्य रखा. अपनी बेटी माशा के साथ उनका यह गहन भावनात्मक संबंध आध्यात्मिक गहराइयों के आदान-प्रदान तक पहुंचा था. हालांकि माशा का जीवन सासांरिक दृष्टि से दुखांत रहा.

पिता के डाले गए आध्यात्मिक संस्कारों ने विवाह के बाद भी माशा को कुलीन और सजावटी बहूभर बनकर नहीं रहने दिया. राजकुमारी होते हुए भी किसानों और मजदूरों के साथ दिनभर उन्हीं की तरह बनकर खेतों में बराबर का काम करती थी. एक बार गांव में आग लगी, तो कमर भर पानी में कूदकर बाल्टी भर-भर कर आग बुझाने दौड़ी. लेकिन दुर्भाग्य कि माशा को गर्भ तो ठहरता, लेकिन जीवित बच्चे को जन्म नहीं दे पाती थी. मां सोफिया को लगता था कि पिता टॉल्सटॉय ने उसे शुद्ध शाकाहारी बना दिया, इसलिए इसके साथ ऐसा होता है. लेकिन टॉल्सटॉय ने अपनी बेटी को लिखे आखिरी पत्र में कारुणिक स्वर में लिखा था- ‘सांसारिक दृष्टि से भले ही यह एक दुखद घटना हो, लेकिन तुम्हारे आध्यात्मिक जीवन के लिए यह निस्संदेह एक फायदे की बात ही है.’ न्यूमोनिया की वजह से 35 साल की अवस्था में बेटी ने पिता की गोद में ही अपने प्राण त्यागे.

महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने आश्रम का नाम ‘टॉल्सटॉय फार्म’ ही रखा था. आध्यात्मिक स्तर पर दोनों महापुरुषों के जीवन में कई विचित्र समानताएं देखने को मिलती हैं

सांसारिक भोग-विलास के जीवन से जब टॉल्सटॉय को वितृष्णा हुई, तो वे बार-बार घर छोड़कर चले जाने की बात करते. स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. पत्नी ने सेवा-सुश्रूषा में कोई कमी नहीं रखी थी. लेकिन सारा आध्यात्मिक पक्ष समझते हुए भी एक भिखारी की भांति अकेले घर छोड़कर निकल जाने वाली बात सोफिया को एकदम गैर-जिम्मेदाराना लगती थी. कड़ी निगरानी के बावजूद आखिरकार टॉल्सटॉय ने पूरी तरह संन्यास धारण करने की अपनी इच्छा पूरी कर ही ली.

सन् 1897 में उन्होंने पत्नी के नाम एक पत्र लिखा, मगर उसे भेजा नहीं गया. उसके ऊपर लिखा था, ‘मेरी मृत्यु के बाद दिया जाए.’ उसमें लिखा था :

प्रिय सोफिया,

मेरे धार्मिक सिद्धांतों और मेरे जीवन में जो विरोधाभास है, उसके कारण मुझे बहुत दिनों से मानसिक पीड़ा हो रही है. मैं तुम्हें इस जीवन-शैली को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने ही तुम्हें इस तरह की जीवन-शैली में ढाला है. लेकिन अब मैं वह कार्य करना चाहता हूं जिसे करने की मेरी बड़ी इच्छा है, यानी मैं तुम लोगों से विदा होकर कहीं और जाना चाहता हूं. इसके कई कारण हैं. पहला यह कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मुझे जीवन तकलीफदेह महसूस होने लगा है और एकांत में रहने की इच्छा प्रबल हो गई है. दूसरा यह कि लड़के बड़े हो गए हैं और मेरा घर पर रहना जरूरी नहीं रह गया है. तीसरा कारण यह है जिस तरह हिंदू लोग 60 वर्ष की अवस्था में जंगल चले जाते हैं, उसी तरह मैं भी अपने जीवन के अंतिम दिन ईश्वर का स्मरण करते हुए गुजारना चाहता हूं. यदि मैं अपने इस विचार पर खुलकर अमल करूंगा, तो लोग मुझे रोकेंगे, विनती करेंगे और संभव है कि मुझे कहीं नहीं जाने देंगे. अगर मेरे इस कार्य से तुम लोगों को कष्ट हो, तो तुम लोग मुझे क्षमा करना. तुम लोग खुशी-खुशी मुझे जाने की इजाजत दे दो, मेरी खोज मत करना और मुझे दोष मत देना.

तुम्हारा स्नेही-

लियो टॉल्सटॉय

आखिरकार 10 नवंबर, 1910 को 82 वर्ष की अवस्था में आधी रात के समय टॉल्सटॉय बिना किसी को बताए घर से निकल गए. वह भयानक ठंड की रात थी. कंधे पर एक पोटली लादे और लकुटिया टेकते वे चल पड़े. रेल में बैठकर दूर दक्षिण को निकल पड़े. आम यात्रियों द्वारा टॉल्सटॉय को पहचान पाना आसान नहीं था. टॉल्सटॉय ने उनके साथ आत्म-संयम, त्याग, शरीर-श्रम, मानव-सेवा, इंसानी भाईचारा, शांति और अहिंसा जैसे विषयों पर खूब चर्चा की. दस दिन बाद किसी छोटे से स्टेशन पर वे अचेत अवस्था में पाए गए.

घनघोर प्रशंसक होने के नाते स्टेशन मास्टर उन्हें पहचानता था. टॉल्सटॉय जैसा जीवन जीना चाहते थे, वैसा भले ही न जी पाए हों, लेकिन मौत उन्हें वैसी ही आई जैसा वे चाहते थे. कहते हैं कि लाख पुलिस व्यवस्था के बावजूद उनकी अंत्येष्टि में हजारों किसान और मजदूर पहुंचे थे. विडंबना यह थी कि इनमें से ज्यादातर को टॉल्सटॉय के साहित्य और जीवन के बारे में कुछ विशेष मालूम न था. उनके लिए तो बस किसी बहुत प्रसिद्ध ‘काउंट’ या कुलीन की मृत्यु हुई थी. हां, कुछ किसानों और मजदूरों के पास टॉल्सटॉय के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव की कहानियां जरूर थी. कुछ बहुत ही कारुणिक कहानियां. शायद यह भी एक वजह थी कि बोल्शेविक क्रांति के प्रचंड दौर में टॉल्सटॉय के परिवार पर कोई आंच नहीं आई.

टॉल्सटॉय के जीवन के अंतिम एक वर्ष के दरम्यान ही गांधी और टॉल्सटॉय के बीच पत्रों के माध्यम से जो आत्मीय आदान-प्रदान हुआ, उसका एक आध्यात्मिक धरातल ही था

महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने आश्रम का नाम ‘टॉल्सटॉय फार्म’ ही रखा था. आध्यात्मिक स्तर पर दोनों महापुरुषों के जीवन में कई विचित्र समानताएं देखने को मिलती हैं. गृहस्थी और दाम्पत्य के उलझनों से लेकर संपत्ति त्याग और अहिंसक सेवा में जीवन समर्पित कर देने की उत्कंठा तक दोनों का जीवन स्वाभाविक विरोधाभासों और प्रयोगों से भरा जीवन रहा. आश्चर्य नहीं कि टॉल्सटॉय के जीवन के अंतिम एक वर्ष के दरम्यान ही गांधी और टॉल्सटॉय के बीच पत्रों के माध्यम से जो आत्मीय आदान-प्रदान हुआ, उसका एक आध्यात्मिक धरातल ही था. इन पत्रों की रोशनी में टॉल्सटॉय और गांधी के आपसी संबंध को लेकर अलग से एक पूरी चर्चा करने की जरूरत होगी. इसलिए इस पर बात फिर कभी.

आज उनकी पुण्यतिथि पर बस इतना कि जिन लोगों ने भी रूस की एक मैत्रिक रियासत यास्नाया पोल्याना के इस उच्चवर्गीय ताल्लुकेदार काउंट लेव निकोलायेविच तोल्सतोय को ‘महर्षि’ टॉल्सटॉय कहा होगा, एक ठोस आध्यात्मिक आधार पर ही कहा होगा. टॉल्सटॉय की जीवन-साधना किसी तपस्या से कम नहीं थी. उसके ताप में निखरकर मिलने वाली आध्यात्मिक उपलब्धियों में भी वह किसी महर्षि से कम नहीं कहे जा सकते.