पाकिस्तान ने हाल ही में तीन मैचों की टी20 सीरीज में श्रीलंका को 3-0 से शिकस्त दी. इससे पहले उसने यूएई में श्रीलंका को वनडे सीरीज भी 5-0 से हराई थी. सितंबर में उसने सितारों से सजी विश्व एकादश की टीम से भी टी20 सीरीज जीती. पाकिस्तान की इसी टीम ने अप्रैल में इंग्लैंड में हुई चैंपियंस ट्रॉफी भी अपने नाम की थी. इस टूर्नामेंट में उसने दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड और भारत जैसी वनडे की सबसे मजबूत टीमों को हराया था. वह इस समय टी20 की नंबर एक टीम भी है.

पाकिस्तान क्रिकेट टीम की इन उपलब्धियों का एक अहम पहलू यह भी है कि उसने ये तब हासिल की हैं जब इस टीम में विराट कोहली, एबी डीविलियर्स, हासिम अमला और डेविड वार्नर जैसा कोई सूरमा मौजूद नहीं है. ये उपलब्धियां पूरी टीम के एकजुट प्रयासों से हासिल की गई हैं.

यहीं से कुछ अहम सवाल उठते हैं. जैसे किसी टीम के लिए ये तथाकथित सुपरस्टार कितने महत्वपूर्ण होते हैं? उनकी मौजूदगी का क्या असर होता है? टीम के साथ खेले जाने वाले किसी खेल में अगर कोई एक खिलाड़ी सारी जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले लेता है तो इसका मतलब यह भी है कि वह दूसरे खिलाड़ियों के योगदान को भी रोकता है. तो क्या ऐसे बड़े खिलाड़ियों के नाम के साथ जुड़े हैरतअंगेज आंकड़े एक झूठा आभामंडल बनाते हैं ?

बेशक ये सवाल खेल के दायरे से बाहर किसी ऐसी स्थिति के लिए भी लागू हो सकते हैं जहां दो या इससे ज्यादा लोगों की टीम किसी एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रही हो. कहते हैं कि किसी महान टीम के लिए पूर्णता के मायने अलग-अलग अंशों के कुल योग से ज्यादा होते हैं. लेकिन अगर कोई एक अंश बाकियों से कहीं ज्यादा बड़ा हो तो क्या वह इस पूर्णता का कोई नुकसान करता है ?

मसीहा या भ्रम?

इस तरह की कोई भी बहस सिर्फ आंकड़ों के आधार पर नहीं की जा सकती क्योंकि ये आंकड़े ही अक्सर किसी टीम के लिए एक मसीहा का भ्रम रचते हैं जिसके बिना उस टीम की कल्पना नहीं की जा सकती. जिनका दिमाग आंकड़ों की ही सुनता है वे इन तथ्यों पर गौर कर सकते हैं. अपने पूरे करियर के दौरान सचिन तेंदुलकर भारत के लिए 176 एकदिवसीय मैचों में नहीं खेले. उन मैचों में टीम की जीत-हार का अनुपात उन मैचों की तुलना में थोड़ा बेहतर ही था जिनमें तेंदुलकर खेले.

इससे पहले कि भारत के सबसे महान क्रिकेटर को छोटा साबित करने के लिए आप अपनी मिसाइलें मेरी तरह तानें मैं यह साफ कर दूं कि यह आंकड़ा सचिन की क्षमताओं का दर्पण नहीं है. बल्कि इससे यह समझा जा सकता है कि उनकी महानता का उनके इर्द-गिर्द रहने वाले खिलाड़ियों पर क्या असर पड़ा होगा. मैं यह भी समझता हूं कि पूरी तस्वीर समझने के लिए इन आंकड़ों को भी बारीकी से देखना जरूरी है. उदाहरण के लिए अपने करियर के आखिर में तेंदुलकर ने कई ऐसे मैच छोड़े जो कमजोर टीमों के खिलाफ थे जिसने उनकी गैरमौजूदगी में टीम की जीत-हार का अनुपात सुधार दिया. इसके बावजूद मैच जीतने के लिए टीम की तेंदुलकर पर निर्भरता की जितनी बात होती थी उसे देखते हुए मुझे उम्मीद थी कि ये आंकड़े एक अलग तस्वीर बताएंगे.

जिन्हें एकदिवसीय क्रिकेट में विराट कोहली के शुरुआती दिन याद होंगे उन्हें यह भी पता होगा कि उनकी चर्चा तभी शुरू हुई जब चोटों से घायल तेंदुलकर की टीम में गैरमौजूदगी के दौरान उन्होंने लगातार अच्छी पारियां खेलीं. अगर तेंदुलकर फिट होते तो हो सकता है कि कोहली ने इनमें से कुछ मैच नहीं खेले होते. और अगर खेले भी होते तो टॉप ऑर्डर में तेंदुलकर के चलने की स्थिति में शायद उनका योगदान इतना अहम नहीं होता.

एक तरह से ऐसी स्थिति बुराई में छिपी किसी भलाई की तरह भी होती है. तब टीम को किसी नए मसीहा की जरूरत होती है जिसमें किसी ऐसे खिलाड़ी को हाथ खोलने का मौका मिल जाता है जिसकी क्षमता तब तक छिपी हुई हो. माना जाता है कि किसी नायक के उभार के लिए अक्सर एक संकट की जरूरत होती है.

बुराई में छिपी भलाई

इन दिनों खासकर सीमित ओवरों के मैचों में भारत की कोहली पर निर्भरता उस वक्त की याद दिलाती है जब तेंदुलकर शिखर पर थे और जीत के लिए भारत उनकी तरफ ही देखता था. पिछले छह साल के दौरान कोहली दुर्लभता से ही खराब फॉर्म के शिकार हुए हैं. ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि टीम में बाकी खिलाड़ी अपने बीच उनकी आश्वस्तकारी मौजूदगी के इतने आदी हो चुके हैं कि जैसे ही कोहली आउट होते हैं टीम में घबराहट शुरू हो जाती है. यही टीम में एक ऐसा खिलाड़ी होने का नुकसान है जिसके प्रदर्शन में इतनी निरंतरता है कि बाकी खिलाड़ियों को मैच में मुश्किल परिस्थितियों से दो-चार होने के पर्याप्त मौके नहीं मिलते.

लेकिन क्या महानता को इस तरह संभालना मुमकिन है कि यह अपने इर्द-गिर्द मौजूद क्षमताओं को दबाए नहीं? खिलाड़ियों को बदल-बदलकर खिलाना यानी रोटेशन पॉलिसी इसका जवाब हो सकती है. कई टीमें समय-समय पर इसे आजमाती भी हैं. लेकिन अक्सर इसका मकसद कुछ अहम खिलाड़ियों को आराम देना होता है ताकि किसी अहम मैच से पहले वे थके न रहें. इसका उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि दूसरी पांत के खिलाड़ियों को प्रतिभाशाली खिलाड़ियों से मैच विनर्स में तब्दील होने का मौका मिले. लेकिन, एक ऐसे दौर में जब खेल को चलाने के लिए टीवी से होने वाली कमाई सबसे अहम है, क्या कोहली जैसे खिलाड़ी को सिर्फ इस मकसद से किसी बड़ी सीरीज से बाहर रखा जा सकता है? जवाब आप सबको पता है.