आशुतोष राणा मशहूर फिल्म अभिनेता हैं और मुंबई में रहते हैं.


बात सत्तर के दशक की है. हमारे पूज्य पिताजी ने, बड़े भाई मदन मोहन की सलाह पर हम तीन भाइयों (नंदकुमार, जयंत और मैं, आशुतोष) का दाखिला जबलपुर के क्राइस्ट चर्च स्कूल में करा दिया. इससे पहले हम सभी गाडरवारा के एक कस्बाई विद्यालय में पढ़ा करते थे. क्राइस्ट चर्च उस समय मध्य प्रदेश के महाकौशल अंचल में अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में शीर्ष पर था.

पूज्य बाबूजी और मां ने हम तीनों का दाख़िला करवाने के बाद हमें हॉस्टल में छोड़ा और अगले रविवार को आने का आश्वासन देकर वापस चले गए.

मुझे नहीं पता था कि जो इतवार आने वाला है वह मेरे जीवन में सदा के लिए अंकित होने वाला है. इतवार का मतलब छुट्टी होता है लेकिन सत्तर के दशक का वह इतवार मेरे जीवन की ‘घुट्टी’ बन गया.

इतवार की सुबह से ही मैं बहुत खुश था. ये मेरे जीवन के पहले सात दिन थे जब मैं बिना मां-बाबूजी के घर से बाहर रहा था. मन मिश्रित भावों से भरा हुआ था. हृदय के किसी कोने में मां-बाबूजी को प्रभावित करने का भाव बलवती हो रहा था. यही वह दिन था जब मुझे यह समझ आया कि बच्चे अपने माता-पिता से सिर्फ़ प्रेम ही पाना नहीं चाहते, उन्हें प्रभावित भी करना चाहते हैं.

दोपहर साढ़े तीन बजे हम हॉस्टल के विज़िटिंग रूम में आ गए. ग्रीन ब्लेजर, वाइट पैंट, वाइट शर्ट, ग्रीन एंड वाइट स्ट्राइप्स वाली टाई और बाटा के ब्लैक नॉटी बॉय शूज़, ये हमारी स्कूल यूनीफ़ॉर्म थी.

हमने विज़िटिंग रूम की खिड़की से स्कूल के मेन गेट से आती हमारी मिलेट्री ग्रीन कलर की ओपन फ़ोर्ड जीप को देखा. उसे मेरे बड़े भाई मोहन, जिन्हें पूरा घर भाईजी कहता था, ड्राइव कर रहे थे. मां-बाबूजी भी गाड़ी में बैठे हुए थे. मैं बेहद उत्साहित था. मुझे पूरा विश्वास था कि आज इन दोनों को इम्प्रेस कर ही लूंगा. मैंने पुष्टि करने के लिए जयंत भैया, जो मुझसे छह वर्ष बड़े हैं, से पूछा मैं कैसा लग रहा हूं? भैया बोले शानदार लग रहे हो. नंद भैया ने भी उनकी बात का समर्थन कर मेरे हौसले को और बढ़ा दिया.

जीप रुकी. उलटे पल्ले की गोल्डन-ऑरेंज साड़ी में मां और झक्क सफ़ेद धोती, कुर्ता, गांधी टोपी और काली जवाहर बंड़ी में बाबूजी उससे उतरे. हम दौड़कर उनसे नहीं मिल सकते थे. यह स्कूल के नियमों के ख़िलाफ़ था. सो मीटिंग हॉल में, जैसे सैनिक विश्राम की मुद्रा में अलर्ट खड़ा रहता है, एक लाइन में तीनों भाई खड़े मां-बाबूजी का अपने पास पहुंचने का इंतज़ार करने लगे. जैसे ही वे क़रीब आए, हम तीनों भाइयों ने सम्मिलित स्वर में अपनी जगह पर खड़े खड़े होकर, गुड ईवनिंग मम्मी, गुड ईवनिंग बाबूजी, कहा.

मैंने देखा यह सुनकर बाबूजी हल्का सा चौंके. फिर तुरंत ही उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्काराहट आई जिसमें बेहद लाड़ था. मैं समझ गया कि वे प्रभावित हो चुके हैं. मैं जो मां से लिपटा ही रहता था, उनके क़रीब ही नहीं जा रहा था, यह दिखाने के लिए कि मैं इंडिपेंडेंट हो गया हूं. मां ने अपनी स्नेहसिक्त मुस्कान से मुझे छुआ. मैं मां से लिपटना चाहता था लेकिन मैंने ऐसा किया नहीं. मां ने बाबूजी को देखा और मुस्कुरा दीं. मैं समझ गया कि वे भी प्रभावित हो गईं हैं.

मां, बाबूजी, भाईजी और हम तीन भाई हॉल के एक कोने में बैठकर बातें करने लगे. हमसे पूरे हफ़्ते का विवरण मांगा गया, और साढ़े छह बजे के लगभग बाबूजी ने हमसे कहा कि अपना सामान पैक करो, तुम लोगों को गाडरवारा वापस चलना है, वहीं आगे की पढ़ाई होगी. हमने अचकचाकर मां की तरफ़ देखा. मां, बाबूजी के समर्थन में दिखाई दीं.

हमारे घर में प्रश्न पूछने की आज़ादी थी. घर के नियम के मुताबिक़ छोटों को पहले अपनी बात रखने का अधिकार था. सो पहला सवाल मैंने दागा और बाबूजी से गाडरवारा वापस ले जाने का कारण पूछा?

उन्होंने कहा, ‘राणा जी मैं तुम्हें मात्र अच्छा विद्यार्थी नहीं, एक अच्छा व्यक्ति बनाना चाहता हूं. तुम लोगों को यहां नया सीखने भेजा था, पुराना भूलने नहीं. कोई नया यदि पुराने को भुला दे तो उस नए की शुभता संदेह के दायरे में आ जाती है. हमारे घर में हर छोटा अपने से बड़े परिजन, परिचित, अपरिचित जो भी उसके सम्पर्क में आता है, उसके चरण स्पर्श कर अपना सम्मान निवेदित करता है. लेकिन इस नए वातावरण ने मात्र सात दिनों में ही मेरे बच्चों को परिचित तो छोड़ो अपने माता-पिता से ही चरण स्पर्श की जगह गुड ईवनिंग कहना सिखा दिया है. मैं नहीं कहता कि इस अभिवादन में सम्मान नहीं है, किंतु चरण स्पर्श करने में सम्मान होता है, यह मैं विश्वास से कह सकता हूं. विद्या व्यक्ति को संवेदनशील बनाने के लिए होती है, संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं. मैंने देखा कि तुम अपनी मां से लिपटना चाहते थे लेकिन दूर ही खड़े रहे. विद्या दूर खड़े व्यक्ति के पास जाने का हुनर देती है न कि अपने से जुड़े हुए से दूर करने का काम करती है.’

बाबूजी बोले जा रहे थे, ‘आज मुझे विद्यालय और स्कूल का अंतर समझ आया. व्यक्ति को जो शिक्षा दे वह विद्यालय. जो उसे सिर्फ़ साक्षर बनाए वह स्कूल. मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे सिर्फ़ साक्षर होकर डिग्रियों के बोझ से दब जाएं. मैं अपने बच्चों को शिक्षित कर किसी के दर्द को समझने, उसके बोझ को हल्का करने की महारथ देना चाहता हूं. मैंने तुम्हें अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए भेजा था, आत्मीय भाव भूलने के लिए नहीं. संवेदनहीन साक्षर होने से कहीं अच्छा संवेदनशील निरक्षर होना है. इसलिए बिस्तर बांधो और घर चलो.’

हम तीनों भाई तुरंत मां-बाबूजी के चरणों में गिर गए. उन्होंने हमें उठा कर गले से लगा लिया और शुभाशीर्वाद दिया कि किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो. जब भी कभी थकता हूं या हार की कगार पर खड़ा होता हूं तो बाबूजी का यह आशीर्वाद मेरे लिए संजीवनी का काम करता है.

आशुतोष राणा अपना यह अनुभव सोशल मीडिया पर साझा कर चुके हैं.