‘समय आ गया है कि इस देश के नागरिक यह समझ लें कि वे एक राष्ट्र में रहते हैं और राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने को कर्तव्यबद्ध हैं, जो कि संवैधानिक देश प्रेम और अंतर्निहित राष्ट्रीय गुण का प्रतीक है.’

यह वाक्य अगर कोई छात्र लिखता तो उसके अध्यापक को यह पूछना ही पड़ता कि संवैधानिक देश प्रेम का क्या मतलब है. और इस वाक्य में जिस राष्ट्रीय गुण की बात की जा रही है, वह किसमें अन्तर्निहित है? अध्यापक अपने छात्र को इस वाक्य की अस्पष्टता दूर करने को कहते हुए इसे दुबारा लिखने को कहता.

परेशानी यह है कि अगर कोई अध्यापक यह करना चाहे तो उसे न्यायालय की अवमानना का आरोप झेलना पड़ सकता है क्योंकि यह भाषा की कक्षा का नहीं, उच्चतम न्यायालय की एक दो सदस्यीय पीठ के एक निर्णय का एक अंश है. ध्यान रहे, निर्णय अंतरिम है. अंतरिम अंतिम नहीं होता.

निर्णय भले अंतरिम हो, लेकिन दस दिन के भीतर सभी अधिकारियों और संस्थाओं को इसका अनुपालन करने और कराने का हुक्म दिया गया है. जिस मामले में यह फैसला सुनाया गया है, वह दिलचस्प है. 2001 में भोपाल की ज्योति टॉकीज़ में करण जौहर की फ़िल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ देखते हुए भोपाल निवासी जय प्रकाश चौकसे को अपमान का सामना करना पड़ा था. उस फ़िल्म में एक दृश्य है जिसमें विदेशी भूमि पर भारत का राष्ट्र गान गाया जा रहा है. चौकसे राष्ट्र गान सुनते ही उसके प्रति सम्मान भाव से विवश हो उठ खड़े हुए. उनके खड़े होते ही पीछे के दर्शकों ने शोर मचाया कि वे उनके और सिनेमा के परदे के बीच रुकावट बन रहे हैं. जब चौकसे ने उन्हें भी राष्ट्र गान के प्रति सम्मान जतलाने को खड़ा होने को कहा तो उन्होंने उनकी खिल्ली उड़ाई. इस पर अपमानित चौकसे ने फिल्म के खिलाफ मुकदमा दायर किया कि उसमें राष्ट्र गान को हल्के तरीके से प्रदर्शित किया गया है. उनकी यह भी शिकायत थी कि सिनेमा में राष्ट्र गान वाले दृश्य में लोग खड़े भी नहीं हुए!

2003 में चौकसे साहब की इस अर्जी को सही मानते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय की पीठ की ओर से न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने फिल्म पर तब तक के लिए रोक लगा दी जब तक यह आपत्तिजनक दृश्य हटा नहीं दिया जाता. 2004 में उच्चतम न्यायालय ने यह रोक हटा ली और फिल्म को ज्यों का त्यों दिखाने की इजाजत दे दी. यह आदेश तीन सदस्यीय पीठ का था और उसकी ओर से तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वीएन खरे ने कहा कि किसी वृत्त चित्र, न्यूज़ रील या फ़िल्म के दौरान अगर राष्ट्र गान दिखाया जा रहा हो तो दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जाती. क्योंकि इससे हलचल होती है और राष्ट्र गान की इज्जत में कोई इजाफा भी नहीं होता.

अब न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा उच्चतम न्यायालय में हैं. अब जब यह प्रसंग उनके सामने आया तो इस मामले में उच्चतम न्यायालय के पिछले फैसलों की विवेचना किए बगैर उन्होंने अंतिम निर्णय होने तक यह अंतरिम निर्णय सुनाया.

भले ही न्यायिक हो, लेकिन है यह भाषा का मामला भी. साहित्य की कक्षा में हम अक्सर कहते हैं कि भाषा के प्रयोग में सटीकता और सुनिश्चितता रहनी चाहिए और इसके लिए अकसर हम अदालती फैसलों को पढ़ने की सलाह देते हैं.

लेकिन लॉरेंस लियांग ने अदालती फैसलों को लेकर उत्साह से सावधान किया है. वे न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर की याद करते हैं. उनके फैसलों को उनकी आलंकारिक अंग्रेज़ी की वजह से याद किया जाता है, लेकिन इधर भावुकतापूर्ण आलंकारिकता ने भाषा के सौंदर्य की जगह ले ली है. लियांग ठीक ही कन्हैया कुमार को जमानत देने वाली न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी के निर्णय का हवाला देते हैं. इसमें वे राष्ट्र विरोध के इन्फेक्शन, गैंग्रीन आदि की बात करते-करते आखिरकार मनोज कुमार की फिल्म के देशभक्तिपूर्ण गाने पर पहुंच जाती हैं और भारत का गुणगान यों करती हैं, ‘मेरे देश की धरती, सोना उगले उगले हीरे मोती.’

भाषा में यह जो आधिक्य का तत्व है वह बौद्धिक सावधानी को बाधा पहुंचाता है. इसलिए यह आवश्यक है कि हम अदालती फैसलों को इस लिहाज से भी देखें.

फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्र गान बजाने के निर्णय से लिए गए और ऊपर लिखे वाक्य में यह अन्तर्निहित है कि राष्ट्र गान का सम्मान किस कारण से किया जाना चाहिए और वह कारण यह है कि वह संवैधानिक देश प्रेम और (किसी के या किसी में?) अन्तर्निहित गुण का प्रतीक है.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या संविधान ने देश प्रेम को परिभाषित किया है? अगर नहीं, तो यह जानने का क्या तरीका होगा कि वह आखिर है क्या?

यह देश प्रेम राष्ट्रवाद है या उससे अलग है? विद्वानों ने और लेखकों ने दोनों में फर्क बताया है. जो पैट्रियोटिज्म का समानार्थक है, उस देश प्रेम को व्यापक और उदार अवधारणा माना गया है, जबकि राष्ट्रवाद को संकीर्ण और हिंसक ख़याल ठहराया जाता है. देशप्रेम में किसी स्थान से लगाव का भाव है.

राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गांव’ में गंगौली के ग्रामीण मुसलमान यह समझ ही नहीं पाते कि उनके गांव से दूर पाकिस्तान कैसे बन सकता है. उनकी निगाह में जो उनका देस है, वही राष्ट्र हो सकता है. इसलिए वे पाकिस्तान से वैसा उन्मादी लगाव महसूस नहीं कर पाते जिसके अभाव के चलते जिन्ना के पाकिस्तानी राष्ट्रवादी अनुयायी उन मुसलमानों को खुद से कमतर मानते हैं.

देश को राष्ट्र में बदलने के लिए एक यात्रा करनी पड़ती है. इसके लिए कई कर्मकांड करने पड़ते हैं. अगर सीमा पर सैनिक मारे जाते हैं तो उन्हें न तो दफनाया उनके राष्ट्र में जाता है न ही उनका अंतिम संस्कार वहां किया जाता है. वे आखिरकार अपने देश या वतन लाए जाते हैं. हम सब चाहते हैं कि हमारी मिट्टी हमारे वतन की मिट्टी से मिले, हम राष्ट्र की मिट्टी नहीं कहते.

ऐसी स्थिति में न्यायमूर्तियों से अगर हम यह जानना चाहें कि आखिर यह संवैधानिक देश प्रेम क्या है तो क्या हम गलत मांग कर रहे होंगे?

इस फैसले में यह भी कहा गया है कि हमें व्यक्ति की श्रेष्ठता की खामखयाली से खुद को आज़ाद कर लेना चाहिए. हर फर्द खुद को राष्ट्र के हवाले कर दे या उसमें अपनी सत्ता को विलीन कर दे, यह न्यायमूर्तियों का आदेश है. लेकिन जनतंत्र तो व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी संप्रभुता पर टिकी अवधारणा है. फिर जनतंत्र बड़ा मूल्य है या राष्ट्रवाद? अगर दोनों में टकराहट हो, तो मैं किस तरफ से लडूं?

नास्तिक आधुनिकता से निकले व्यक्तिवाद को छोड़ दें. इस ब्रह्मांड को ईश्वरीय रचना मानने वाले लोगों को ईश्वर के बनाये मानव को सर्वोच्च मानना चाहिए या मानव के बनाये राष्ट्र को? हमारे माननीय न्यायमूर्ति यह भी तो बताएं कि जो तुलसी राम की अपनी आराध्य छवि छोड़ कर कृष्ण के आगे सर झुकाने को राजी न थे, वे राम नाम की जगह कोई और नाम जाप करने से इनकार करें तो क्या उन्हें कसूरवार ठहरा दिया जाएगा?