यह एक और त्रासदी है, जो अब तक 30-35 हजार लोगों की जान ले चुके भोपाल गैस कांड से जुड़ी है. दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं में शुमार किए जाने वाले इस हादसे के तीन अहम किरदारों ने आज तक कभी भारतीय अदालतों में इस मामले से जुड़े मुकदमे का सामना नहीं किया. तीनों ने बिना किसी बाधा के अपनी नौकरी पूरी की और उच्च पदों से रिटायर हुए. इन तीन किरदारों में से दो तो अपने ऊपर लगे आरोपों की कहानी खुद ही कह रहे हैं. लेकिन सरकार (वह चाहे किसी की भी हो) हमेशा यही कहती रही है कि उसके पास इन पर एफआईआर दर्ज करने के लिए सबूत नहीं हैं.

इन तीन किरदारों में पहले हैं - वॉरेन एंडरसन. ये भोपाल गैस कांड के वक्त यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन थे. हादसे के चार दिन बाद यानी सात दिसंबर 1984 को एंडरसन हालात का जायजा लेने भोपाल आए. इन्हें भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की ऐसी गंभीर धाराओं के तहत गिरफ्तार भी किया गया, जिन पर अदालत की इजाजत के बिना जमानत नहीं मिल सकती थी. लेकिन महज चार-पांच घंटे के भीतर इन्हें न सिर्फ जमानत मिल गई, बल्कि इनके लिए भोपाल से तो क्या देश से भागने का इंतजाम कर दिया गया. इसके बाद इनके खिलाफ अदालतों में सुनवाइयां होती रहीं, अमेरिका से इनके प्रत्यर्पण की कथित कोशिशें भी की जाती रहीं. लेकन ये कभी भारत लौटे नहीं. एंडरसन 1986 में यूनियन कार्बाइड के सर्वोच्च पद से रिटायर हुए और 92 साल की उम्र में 29 सितंबर 2014 को इनकी मौत हो गई.

दूसरे किरदार हैं- स्वराज पुरी. गैस हादसे के वक्त भोपाल के एसपी हुआ करते थे. एंडरसन को भोपाल में पहले गिरफ्तार करने और फिर उसकी जमानत का इंतजाम इन्होंने ही किया था. यही नहीं, खुद गाड़ी ड्राइव करके उसे बाइज्जत भोपाल एयरपोर्ट तक छोड़ने भी यही गए थे. इन्होंने गैस कांड की जांच करने वाले आयोग के सामने खुद माना था, ‘हमने एंडरसन को लिखित आदेश के आधार पर गिरफ्तार किया था. लेकिन मौखिक आदेश के आधार उसे छोड़ दिया. ये मौखिक आदेश हमें ऊपर से मिला था.’ आदेश किसने दिया, इन्होंने कभी किसी को नहीं बताया. सरकार के ‘सच्चे सेवक’ पुरी 23 सितंबर 2006 को मध्य प्रदेश के महानिदेशक (डीजीपी) जैसे सर्वोच्च पद से रिटायर हुए. सेवानिवृत्ति के बाद इन्हें राज्य की भाजपा सरकार ने नर्मदा घाटी परियोजना के शिकायत निवारण प्राधिकरण का सदस्य बना दिया. इस बीच 2010 में जब इनके खिलाफ अदालत में कुछ संगठनों ने निजी तौर पर मामला दर्ज कराया तो इन्हें इस पद से हटा दिया गया. लेकिन मई 2015 में फिर भाजपा की ही सरकार ने इन्हें मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग का सदस्य बना दिया.

तीसरे किरदार हैं, आईएएस मोती सिंह. फिलहाल 80 साल के हो चुके हैं और भोपाल की एक पॉश रिहाइश में स्थित अपने निजी बंगले में रहते हैं. जब गैस दुर्घटना हुई, तब ये भोपाल के कलेक्टर थे. मध्य प्रदेश शासन में सचिव/आयुक्त जैसे शीर्ष पदों पर रहते हुए सेवानिवृत्त हुए. इसके बाद भी सरकार इनकी ‘उत्कृष्ट सेवाओं’ के लिए समय-समय पर इन्हें लाभ के पद से नवाज़ती रही. उदाहरण के लिए 19 जनवरी 2015 में ही इन्हें भोपाल नगर निगम के चुनावों के लिए पर्यवेक्षक बनाया गया था. इन्हीं की सरकारी कार को खुद चलाते हुए स्वराज पुरी वॉरेन एंडरसन को हवाई अड्‌डे तक छोड़ने गए थे. उस कार में एंडरसन के साथ मोती सिंह भी थे. इस तरह से कहा जा सकता है कि ये एंडरसन की गिरफ्तारी, जमानत और फिर उसे भागने का रास्ता सुलभ कराने की पूरी योजना में बराबर के साझीदार थे. इस बात का जिक्र इन्होंने खुद अपनी किताब ‘भोपाल गैस त्रासदी का सच’ में किया है. यह किताब 2009 में आई थी. इसमें इन्होंने 1984 के उस वाकये का विस्तार से जिक्र किया है. स्थानीय अखबारों में जब-तब इस किताब के अंश प्रकाशित हुए. ये कुछ इस तरह हैं...

‘सात दिसंबर को मुख्यमंत्री जी (उस वक्त अर्जुन सिंह थे) का फोन आया. मुझे तत्काल सीएम हाउस बुलाया गया… कुछ देर बाद वहां पुलिस अधीक्षक (स्वराज पुरी) भी आ गए. यहां हमें बताया गया कि एंडरसन, केशव महिंद्रा (यूनियन कार्बाइड इंडिया के अध्यक्ष) और विजय गोखले (कंपनी के प्रबंध निदेशक) सर्विस फ्लाइट से भोपाल आ रहे हैं. इन्हें गिरफ्तार करना है. आदेश मिलते ही हम भोपाल हवाई अड्‌डे के लिए रवाना हो गए... सुबह करीब दस बजे हवाई अड़डे पर विमान उतरा. और एयरोड्रम ऑफिसर खन्ना की मदद से हम विमान के कॉकपिट वाले रास्ते की सीढ़ी से एंडरसन, महिंद्रा और गोखले को उतारकर नीचे ले आए. मेरा इशारा पाते ही एसपी मेरी कार को तुरंत हवाई जहाज के पास ले आए और हम तीनों को उसमें बिठाकर यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हाउस की तरफ चल पड़े. हमने हवाई अड्‌डे से निकलने के लिए टर्मिनल बिल्डिंग के सामने से निकलने के बजाय दूसरा रास्ता चुना, ताकि कोई कैमरामेन हमारी फोटो न ले सके… गेस्ट हाउस पहुंचकर मैंने एंडरसन को उनकी गिरफ्तारी के बारे में बताया... जरूरी इंतजाम करने के बाद जब हम बाहर निकल रहे थे, तो गेस्ट हाउस के गेट पर मीडिया का जमावड़ा हो चुका था. उस वक्त भी कार से उतरकर मैंने ही मीडिया को एंडरसन की गिरफ्तारी की सूचना दी. इसके बाद बाकी सवालों से बचते हुए हम वहां से निकल गए…’

‘उसी दिन दोपहर ढाई बजे मुख्य सचिव (ब्रह्म स्वरूप) के बुलावे पर मैं एसपी के साथ उनसे मिलने सचिवालय स्थित उनके चेंबर में गया. वहां उन्होंने बताया कि बैरागढ़ हवाई अड्‌डे पर स्टेट प्लेन तैयार खड़ा है. एंडरसन को उसी प्लेन से तत्काल दिल्ली भेजना है... ये निर्देश मिलने के बाद हम सीधे यूनियन कार्बाइड गेस्ट हाउस की तरफ रवाना हो गए… वहां कुछ देर चर्चा के बाद एंडरसन ने जमानत के कागजात पर दस्तखत किए… इसके बाद हम उन्हें कार में बिठाकर चुपके से रीजनल कॉलेज की तरफ से नए बनाए गए ऊबड़-खाबड़ रास्ते से निकल गए… जिस रास्ते से हम हवाई अड्‌डे पर पहुंचे, उसका किसी को पता ही नहीं चला. हवाई अड्‌डे पर पहले से स्टेट प्लेन तैयार खड़ा था. हमने उसमें एंडरसन को बिठाया और दिल्ली भेज दिया...’ (केशव महिंद्रा और विजय गोखले को पुलिस ने अदालत में पेश कर उनकी रिमांड ले ली थी)

इस किताब में इतनी साफगोई से किए गए इकरार के बाद 2010 में भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के प्रमुख अब्दुल जब्बार और वकील शाहनवाज खान ने 20 जून 2010 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत में निजी इस्तगाशा पेश किया. इस मामले में अदालत ने अपने एक आदेश में साफ कहा है कि मोती सिंह की पुस्तक से पता चलता है कि एंडरसन को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. उसके बाद उसे विशेष विमान मुहैया कराकर भागने में मदद की गई, जबकि वह कोर्ट की इजाजत के बगैर जमानत पर छोड़े जाने का पात्र नहीं था.

यानी अदालत भी मान रही है कि ये आरोपित हैं. इन पर कार्रवाई होनी चाहिए. अदालत इनके खिलाफ जमानती वारंट भी जारी कर चुुकी है. लेकिन कुछ स्थानीय अखबारों में छपी खबरें जो संकेत लगातार दे रही हैं वह तो यही है कि सरकार अभी इस मामले में पुरानी फाइलें खोलने के मूड में नहीं है. और उधर अदालत में यह मामला विचाराधीन फाइलों के ढेर में शुमार हो चुका है. अब सोचिए, यह त्रासदी नहीं तो क्या है!