मनीषा गुंजन एक स्वतंत्र समाज-सेविका हैं और बिहार के सुपौल जिले के भेलाही नामक गांव में रहती हैं.


मैं चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थी. मुझसे बड़े दो भैया और एक छोटी बहन. घर के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत छुटपन में मैं एकदम मंदबुद्धि जैसी थी. सबका मानना था कि देवघर के वैद्यनाथधाम वाले भोले बाबा का आशीर्वाद होने के कारण मैं एकदम भोली थी. बाबूजी ने वहां जाकर मनौती में बेटी मांगी थी और उसके बाद मैं पैदा हुई. मैं ऐसी थी कि अक्षर तक पहचानने में मुझे कई वर्ष लग गए. हर बार वसंत पंचमी पर मेरी निरक्षर मां सरोसती (सरस्वती) माता के सामने आंखें भर-भरकर भावुक होकर रोती और विनती करती कि किसी तरह उसकी बेटी पढ़ने-लिखने लग जाए. आगे पढ़ने-लिखने में तो मैं जो रही सो रही, धीरे-धीरे आस-पड़ोस के बच्चों की संगति में बदमाशी जरूर सीख गई थी.

पहले गांव में बच्चों पर कोई बंदिश नहीं होती थीं. हम दिन भर आस-पास के खेत-खलिहानों, गलियों और गोशालों में धमाचौकड़ी करते रहते थे. प्रायः सभी वर्गों और समुदायों के बच्चे वहां होते और हम बिना किसी भेदभाव या वर्गीय चेतना के एक साथ खेलते. मुझे और मेरे से ठीक बड़े वाले भैया को किसानों के बच्चों का जीवन ज्यादा आकर्षित करता था लेकिन हम यह भी समझते थे कि हमारा जीवन और बोलचाल इनसे अलग है और यहां तक कि हम पर बदिशें भी ज्यादा हैं. फिर भी हम उन्हीं की तरह मिट्टी में लेटे-घोटे रहना चाहते.

गाली बकने की मेरी नौसिखिया आदत घर से कब तक छिपी हुई रहती! अक्सर मझले भैया मेरी गालियों की बौछार का शिकार बनते थे

गांवों में, विशेषकर किसान-मजदूर तबके में तब अक्सर महिलाओं के बीच छोटी-छोटी बातों को लेकर भी झगड़े और गाली-गलौज होते ही रहते थे. मेरे लिए अजीब-अजीब तरह की गालियां आकर्षण का विषय थीं. सो मैंने वो सीख लीं. इनमें से ज्यादातर गालियों के अर्थ समझ में नहीं आते थे. समझते थे तो बस इतना कि जब बहुत गुस्सा आए तो सामने वाले को गाली बकना चाहिए क्योंकि इससे उसे बहुत बुरा लगता है. मैंने यह भी सीखा कि कोई मुझे गाली दे तो उसका बदला गाली से देना चाहिए. फिर मैंने यह भी सीखा कि कुछ गालियां लड़कियों के लिए होती हैं और कुछ गालियां खास लड़कों के लिए.

गाली बकने की मेरी नौसिखिया आदत घर से कब तक छिपी हुई रहती! अक्सर मझले भैया मेरी गालियों की बौछार का शिकार बनते थे. असल में मैं और मेरे मझले भैया एकपीठिया थे. हमारे यहां उम्र में ठीक आगे-पीछे के बच्चों को ‘एकपीठिया’ कहा जाता है. एकपीठिया संतानों की जोड़ी में आपसी नोंक-झोंक, झगड़ा या ईर्ष्या चलती रहती है. हम दोनों में भी हर चीज के लिए झगड़ा होना तय था. खाने की कोई अच्छी चीज हो तो वह मुझ से मेरा हिस्सा भी छीनकर खाने की कोशिश करते थे. खासकर दूध और दही के लिए दोनों में खूब लड़ाई मचती थी. एक तो उनको उम्र में बड़ा होने का रौब था और दूसरा कहीं न कहीं बेटा होने का घमंड भी. सो वे हाथ चलाने और खूब जोर से चिकोटी काटने से भी बाज नहीं आते. मुझे हिम्मत नहीं पड़ती कि जवाब में मैं भी उन्हें मारूं. फिर मैं छोटी और उससे कमजोर भी थी लेकिन कमजोर होते हुए भी मुंहजोर थी. इसलिए उनकी मार का जवाब मैंने गाली से देना शुरू किया.

शुरू-शुरू में तो गालियां जानवरों के नाम पर ही थीं (आप बेहतर समझ सकते हैं). धीरे-धीरे ये गालियां बड़ी महिलाओं से सीखी गईं अत्यंत अशोभनीय गालियों तक पहुंच गयीं. भैया कई बार जवाब में केवल यह कहते कि जो गाली तू मुझे देती है, उसकी बहन भी तो वही हुई ना? मां मुझे प्यार करती थी, इसलिए वह प्यार से समझाती कि मैं भैया से उलझूं ही नहीं. पर बचपन में ऐसी सीखें मानने का सब्र कहां होता है!

एक दिन मैंने जोर से एक बहुत ही खराब गाली बकी और अचानक बाबूजी बाहर से आ गए. उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. बाबूजी मुझे बहुत प्यार करते थे. मेरे पढ़ाई में कमजोर होने के बावजूद उन्हें यकीन था कि एक दिन मैं बुद्धिमान और व्यवहारकुशल बनूंगी. उस दिन जब उन्होंने मेरे मुंह से निकली वह गाली सुनी तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उन्होंने पूछा यह सब कबसे चल रहा है. मेरी मां ने सबकुछ सच-सच बता दिया. मेरे तो पैर तले से जमीन खिसक गई. मैं एकदम डर गई कि आज से बाबूजी मुझे प्यार करना छोड़ देंगे. उस खराब शब्द के लिए मन ही मन लज्जित थी सो अलग. उनके सामने जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. बाबूजी ने उस समय मुझे कुछ भी नहीं कहा.

बाबूजी ने पूछा, अब तक तुमने भैया से कितनी मार खाई है? मैंने कहा- बहुत. फिर उन्होंने पूछा- यदि गाली और मार का यही सिलसिला चलता रहा तो आगे कितना मार खाओगी? मैंने कहा- बहुत

शाम को बाबूजी रोज रेडियो पर बीबीसी लंदन का प्रसारण सुनते थे. मां ने मुझ से कहा कि मैं बाबूजी को रेडियो दे आऊं. मैंने ना-नुकूर किया तो मां ने मुस्कुराते हुए प्यार से कहा कि बाबूजी बिल्कुल भी गुस्सा नहीं हैं और मुझे कुछ भी नहीं कहेंगे. मां ने कहा कि बाबूजी उल्टे मेरी तारीफ कर रहे थे. मेरा डर थोड़ा कम हो गया. मैं बिल्कुल सहज होने की कोशिश करते हुए उनके पास पहुंची. बाबूजी ने मुझे बड़े प्यार से अपने पास बुलाया और बिठाया. उन्होंने कहा कि उन्हें मालूम है कि मेरी कोई गलती नहीं है. सारी गलती भैया की है. वह मुझसे बड़ा होकर भी कुछ नहीं समझता. उन्होंने कहा कि मैं कितनी अच्छी हूं जो भैया की मार के जवाब में उसे मारती नहीं. यह सब सुनते ही मेरी आंख से आंसू बहने लगे और मैंने सुबकना शुरू कर दिया.

बाबूजी ने सांत्वना देते हुए सिर पर हाथ फेरा. फिर कहा आज मैं तुम्हें एक ऐसा तरीका बताता हूं कि तुम्हें ऐसी गंदी बात बोलने ही न पड़ें. यह सुनते ही मैं मन ही मन बहुत उत्साहित हो गयी और भोलेपन से पूछा- क्या भैया अब मुझे मारना छोड़ देगा? उन्होंने कहा अभी तुरंत तो नहीं, लेकिन जल्दी ही पूरी तरह छोड़ देगा. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था. मैंने पूछा - लेकिन कैसे? उन्होंने कहा कि इसके लिए मुझे वह काम पूरी तरह से करना होगा जो वे बताएंगे. लेकिन क्या? मैंने जल्दी बताने की जिद में पूछा.

बाबूजी ने पूछा, अब तक तुमने भैया से कितनी मार खाई है? मैंने कहा- बहुत. फिर उन्होंने पूछा- यदि गाली और मार का यही सिलसिला चलता रहा तो आगे कितना मार खाओगी? मैंने कहा- बहुत. लेकिन एक दिन थोड़ा मार खाकर यदि हमेशा के लिए मार-लड़ाई से बचा जा सके तो? मैंने सोचा, ये क्या बात हुई कि जिसमें मार खानी ही पड़े. वे शायद मेरे मन की बात समझ गए. उन्होंने कहा- देखो अगर तुमने यह तरकीब ठीक से आजमाई तो भैया न केवल मारना छोड़ देगा, बल्कि वह तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार करना शुरू कर देगा? मैंने सोचा, बाबूजी कह रहे हैं तो जरूर ठीक ही होगा. मैंने कहा जल्दी बताइये करना क्या होगा?

उन्होंने कहा कि अब जब भैया मुझ से खाने की कोई चीज छीन तो मैं उसे अपने हिस्से का सबकुछ दे दूं. मैं इस बात से चिंता में आ गई- अरे, तो फिर मैं क्या खाउंगी? बाबूजी ने समझाया कि तुम्हें और मिल जाएगा और नहीं मिले तो भी संतोष कर लेना. यहां तक कि भाई यदि किसी भी बात को लेकर तुझे मारे, तो तुझे चुपचाप बर्दाश्त करना होगा. न मन में गुस्सा, न चेहरे पर गुस्सा. बल्कि उसके निकट ही खड़े रहकर उसकी आंखों में देखना होगा. बहुत चोट लगे तो थोड़ा रो सकते हैं. लेकिन बिल्कुल उसके निकट होकर देह को आगे कर उसकी मार को सहना है. वहां से भागना नहीं है, बचना भी नहीं है. जैसा कि तुम समझ ही रही होगी, यह आसान नहीं है, बहुत मुश्किल है. लेकिन इसका असर जादू की तरह होता है. मेरा विश्वास करो. एक-दो बार ऐसा करने पर ही सब ठीक हो जाएगा.

शाम को पढ़ाई के समय भैया ने किसी बात पर मुझे पेंसिल भोंक दी और पीठ पर मुक्का भी मारा. बड़े भैया बहुत शांत मिजाज के थे तो उन्होंने बीच-बचाव किया. मैंने भी कोई गाली नहीं दी. मझले भैया को कुछ समझ में नहीं आ रहा था

मैं ठीक से समझ नहीं पा रही थी. बहुत उधेड़बुन में थी. लेकिन बाबूजी को हामी भरकर मैं वहां से चली आई. बहुत देर तक बाबूजी की बताई बात को सोचती रही. समझने की कोशिश करती रही. उस दिन हमारे बीच झगड़े की कोई नौबत ही नहीं आई. अगले दिन सुबह-सुबह ही किसी चीज को लेकर झगड़ा हुआ और भैया ने मेरी कान उमेठ दी. मेरे मुंह से तुरंत गाली निकल गई लेकिन अगले ही पल मुझे बाबूजी की बात याद आ गयी. मैंने उनकी सलाह आजमाने की सोची लेकिन तब तक भैया को मेरी गाली बहुत बुरी लग चुकी थी. भैया ने मुझे बाल खींचकर मारा. मैंने कोई प्रतिकार नहीं किया. उस पर कोई असर न होते देख मुझे बाबूजी की सलाह एक बार को बेतुकी लगी.

शाम को पढ़ाई के समय भैया ने किसी बात पर मुझे पेंसिल भोंक दी और पीठ पर मुक्का भी मारा. बड़े भैया बहुत शांत मिजाज के थे तो उन्होंने बीच-बचाव किया. मैंने भी कोई गाली नहीं दी. मझले भैया को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अगले दिन हम लड़कियां अलग से खेल रही थीं और खूब जोर-जोर से शोर मचा रही थीं, भैया आए और खूब जोर से डांटते हुए मेरे बाल खींच दिए. मैंने न प्रतिकार किया और न गाली दी बल्कि उनके सामने खड़े होकर उनकी आंखों में देखती रही. उन्हें बहुत अजीब लगा और वे तुरंत वहां से चले गये. इसके बाद भी एक-दो अवसरों पर कुछ ऐसा ही हुआ. मैं चुपचाप मार खाती, गाली भी नहीं देती और उनकी आंखों में देखती रहती.

इसके बाद से मैंने देखा कि भैया ने मुझे मारना पीटना तो छोड़ दिया था लेकिन मुझ से कटे-कटे से रहने लगे. पढ़ाई के समय भी वह पहले की तरह मेरे बगल में नहीं बैठते थे. खाने के समय भी मुझसे दूर जाकर बैठते थे. अब मुझे भी उनका यह व्यवहार बहुत अजीब लगने लगा था. इसके बाद मां-बाबूजी एक बार देवघर की कांवड़ यात्रा पर गए. हम भी इस यात्रा में उनके साथ थे. इस यात्रा ने हम दोनों भाई-बहनों को मजबूरी में एक साथ ला दिया था. रास्ते भर हम दोनों में एक बार भी लड़ाई नहीं हुई बल्कि बहुत ही गहरी दोस्ती हो गई. उस यात्रा से लौटते-लौटते मैं और भैया दोनों ही बहुत बदल गए थे.

बाबूजी ने अनजाने में मुझमें सहनशीलता और क्षमा को जो भाव भर दिया था उसने न सिर्फ भैया को बल्कि मुझे भी सुधार दिया था.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)