दो साल पहले यानी आठ नवंबर 2016 को पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को रातोंरात रद्द करने के बाद कहा गया था कि इससे काला धन और जाली नोट छूमंतर हो जायेंगे. अर्थव्यवस्था दौड़ने लगेगी. आम आदमी चहकने लगेगा. लेकिन जब बैंकों के आगे अंतहीन क़तारें लगने लगीं और लोग चहकने के बदले भड़कने लगे तो कहा जा रहा है कि हमें पश्चिम के उन्नत देशों की तरह बिना नक़दी के लेनदेन करना सीखना चाहिये. पर्स या बटुए का स्थान क्रेडिट-डेबिट कार्ड या मोबाइल फ़ोन को मिलना चाहिये. नकदी के इस लेन-देन यानी कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने कई विशेष नीतियों की घोषणाएं भी की हैं.

यह सब सुनने में दूर के ढोल की तरह सुहावना तो लगता है, पर भारत जैसे विशाल देश में, जहां एक-तिहाई जनता अब भी निरक्षर है और 90 प्रतिशत से अधिक लेनदेन नक़द-नारायण से होता है, यह क्रांति क्या बिना किसी भ्रांति के उस तेज़ी से हो सकती है, जिसकी सरकार अपेक्षा कर रही है?

देखते हैं पश्चिम के उन कुछ प्रमुख देशों का हाल, जो नकदी-मुक्त लेनदेन के अगुआ कहलाते हैं और भारत जिनका अनुसरण करना चाहता है.

उत्तरी यूरोप का स्वीडन नकदी-मुक्त समाज बनाने में विश्व में सबसे आगे है. वह यूरोपीय संघ का सदस्य तो है, किंतु संघ की साझी मुद्रा यूरो के बदले अभी भी अपनी पारंपरिक मुद्रा ‘क्रोना’ (क्रोन या अंग्रेज़ी में क्राउन) से ही चिपका हुआ है. वहां का केंद्रीय बैंक ‘स्वेरिजेस रिक्सबांक’ (स्वीडिश नैशनल बैंक) संसार का सबसे पुराना मुद्रा बैंक हैे. उसी ने 1661 में संसार का पहला बैंक-नोट जारी किया था.

स्वीडन स्वेच्छा से नकदी-मुक्त

लेकिन पिछले क़रीब दो दशकों से स्वीडन का समाज स्वेच्छा से नकदी-मुक्त होता जा रहा है. रिक्सबांक का कहना है कि 2015 में वहां हुए सारे लेनदेन में नक़दी का हिस्सा केवल दो प्रतिशत था. आने वाले कुछ सालों में यह घट कर केवल 0.5 प्रतिशत रह जाने की संभावना है. खुदरा लेनदेन में भी यहां केवल 20 प्रतिशत नकद पैसा हाथ बदलता है, जबकि पांच साल पहले यह अनुपात 50 प्रतिशत हुआ करता था. यदि पूरे विश्व के स्तर पर देखा जाये तो नक़द लेनदेन की मात्रा इस समय 75 प्रतिशत है.

भारत की तुलना में स्वीडन बहुत छोटा देश है. जनसंख्या मुश्किल से एक करोड़ है - मुंबई या दिल्ली की आधी. पर जीवनस्तर बहुत ऊंचा और साक्षरता शतप्रतिशत है. वहां हर कोई कहता मिलेगा कि ‘मैं तो अब नक़द पैसा साथ रखता ही नहीं. ज़रूरत ही नहीं पड़ती. दुकानें नकदी नहीं चाहतीं. बैंकों में नक़दी होती नहीं. चाय-काफ़ी या अख़बार-टॉफ़ी के लिए भी अदायगी किसी कार्ड या मोबाइल फ़ोन से की जाती है. ट्रेन, ट्राम या बस का टिकट भी कार्ड या मोबाइल फ़ोन से ही मिलता है.’ हाल यह है कि देश के सभी बैंकों की कुल लगभग 1600 शाखाओं में से 900 शाखाएं न तो नकदी लेती हैं और न ही देती हैं. नकदी देने वाली जो गिनी-चुनी एटीएम मशीनें कहीं दिख जाती हैं, वे देश के पांच बड़े बैंकों की एक साझी कंपनी ‘बैंकोमाट’ ने लगाई हैं.

मोबाइल फ़ोन से लेनदेन फ़ैशन

2009 में स्वीडन के अर्थचक्र में 106 अरब क्रोना के बराबर नक़दी घूम रही थी. 2015 में वह घट कर 80 अरब रह गई. अब तक सबसे अधिक भुगतान किसी न किसी कार्ड द्वारा होता था. लेकिन, अब यहां मोबाइल फ़ोन से लेनदेन का फ़ैशन तेज़ी से बढ़ रहा है. देश के प्रमुख बैंकों ने मिल कर ‘स्विश’ नाम का एक ऐसा साझा ऐप बनाया है, जो स्मार्ट फ़ोन वालों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हुआ है. बताया जाता है कि स्वीडन की आधी जनता अब बैंक और भुगतान संबंधी अपने सारे काम ‘स्विश’ ऐप की सहायता से ही निपटाती है.

सड़कों पर की छोटी-मोटी दुकानों से लेकर पत्र-पत्रिकाएं बेचने वाले बेघर लोग ‘ईत्सेटल’ नाम की एक ऐसी हल्की और सस्ती युक्ति का उपयोग करते हैं, जो विशेष तौर पर छोटे व्यापारियों और अकेले धंधा करने वालों के लिए बनी है. इस युक्ति में विक्रेता अपने मोबाइल फ़ोन को ‘ईत्सेटल’ नाम के एक विशेष ऐप से लैस करता है और उसे ग्राहक का क्रेडिट या डेबिट कार्ड पढ़ने वाले एक मिनी कार्डरीडर से जोड़ कर बेची गई वस्तु की क़ीमत अपने नाम दर्ज कर लेता है.

इलेक्ट्रॉनिक धोखाधड़ी में दोगुनी वृद्धि

नक़दी-मुक्त लेनदेन से स्वीडन में बैंक-डकैती की घटनाएं 2008 में 110 से घट कर 2012 में केवल पांच रह गयी थीं. पर 2014 तक बैंक-खातों में सेंधमारी (हैकिंग) जैसे ‘इलेक्ट्रॉनिक धोखाधड़ी’ के मामले 1,40,000 हो गए थे, जो एक ही दशक में दोगुनी वृद्धि से भी अधिक है. कारण शायद यह है कि अपराधियों को अब घर से बाहर जाने और किसी को लूटने-धमकाने की ज़रूरत ही नहीं रही. वे घर बैठे बड़े आराम से अपने कंप्यूटर के द्वारा - या घर से बाहर अपने टैबलेट या मोबाइल फ़ोन के द्वारा - बैंकों या खाताधारियों को चकमा देकर धन लूटते हैं. वे इसके लिए ऑनलाइन या मोबाइल बैंकिंग करने वालों के कंप्यूटर, राउटर या फ़ोन में किसी वाइरस के जरिये सेंध लगाकर उनके एकाउन्ट और पिन-नंबर जान लेते हैं. बाद में इस जानकारी का लाभ उठा कर वे उनके खातों से पैसा उड़ा लेते हैं. न तो खाताधारियों को तुरंत इसकी कोई भनक मिलती है और न बैंक को. ज़रूरी नहीं कि ऐसे अपराधी स्वीडन में ही कहीं बैठे हों. वे दुनिया भर में कहीं भी हो सकते हैं और शायद ही कभी पकड़ में आते हैं.

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हर छोटा-बड़ा लेनदेन तुरंत दर्ज होते रहने और हर बार किसी पदचिन्ह जैसे उसके डिजिटल-निशान बनते रहने से स्वीडन के जनसाधारण की निजता तो वित्तीय मामलों में खत्म होती जा रही है, लेकिन डाटा के इतने बड़े भूसे में इलेक्ट्रॉनिक सेंधमारों का सुराग ढ़ूंढना बेहद मुश्किल होता जा रहा है. नक़दी रखने और गिनने के अभ्यस्त बड़े-बूढ़ों को इन आधुनिक तकनीकों को अपनाने में जो परेशानी होती है, सो अलग से.

व्यक्ति की निजता के लिए ख़तरा

स्वीडन की ‘ईत्सेटल’ युक्ति के जन्मदाता याकोब दे ग्रेएर को अब खुद शक होने लगा है कि हर गण्य और नगण्य लेन-देन को दर्ज करते जाने वाली एक पूर्ण इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली व्यक्ति की निजता के लिए कहीं ख़तरा तो नहीं बन जायेगी! इसी ख़तरे के डर से इंटरपोल के अध्यक्ष रह चुके और इस समय स्वीडन की निजी सुरक्षादाता कंपनियों के संघ की अध्यक्षता कर रहे ब्यौर्न एरिक्ससोन ने ‘कैश अपराइज़िंग’ (नक़दी के लिए बग़ावत) नाम की एक संस्था बना कर एक आंदोलन भी छेड़ दिया है. उनका कहना है कि नक़दी पाना, रखना और कहीं भी जमा करना हर व्यक्ति का अधिकार होना चाहिये. उपभोक्ताओं, पेंशनभोगियों, विकलागों और विदेशी प्रवासियों के संघ इस आंदोलन में ‘कैश अपराइज़िंग’ का पूरा साथ दे रहे हैं.

दूसरी ओर, स्वीडन का राष्ट्रीय मुद्रा बैंक ‘स्वेरिजेस रिक्सबांक’ अब एक और क़दम बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. बैंक की उपप्रमुख सेसीलिया स्किंज्स्ली ने नवंबर के मध्य में कहा कि अब वे एक डिजिटल मुद्रा प्रचलित करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘हम पता लगा रहे हैं कि उसका देश की मुद्रानीति और वित्तीय स्थिरता पर क्या प्रभाव पडेगा? उसकी (डिजिटल मुद्रा की) रूपरेखा क्या होनी चाहिये? क्या वह ऐसे कार्ड के रूप में हो, जिस पर धन बार-बार चढ़ाया (री-लोड किया) जा सके? या उसे किसी ऐप के रूप में या फिर किसी दूसरे रूप में होना चाहिये?... लोगों को इस ‘ई-क्रोन’ के लिए राष्ट्रीय बैंक में ही क्या अपना कोई खाता खोलना होगा? और यदि खोलना होगा तो क्या उन्हें कोई ब्याज भी मिलेगा? यह सब अभी सोचा जाना है.’

सेसीलिया स्किंज्स्ली का कहना था कि दो वर्षों में अधिकतर प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे, पर यह भी तय है कि डिजिटल मुद्रा नक़दी मुद्रा को पूरी तरह विस्थापित नहीं करेगी. यानी, स्वीडन का राष्ट्रीय मुद्रा बैंक भी मानता है कि केवल निराकार आभासी (डिजिटल या वर्चुअल) मुद्रा से काम नहीं चलेगा, सिक्कों और नोटों के रूप में साकार वास्तविक मुद्रा भी होनी चाहिये.

डेनमार्क में नकदी की अर्थी टली

नकदी-रहित लेनदेन के मामले में स्वीडन के पड़ोसी डेनमार्क और नॉर्वे उससे बस कुछ ही पीछे हैं. डेनमार्क ने भी यूरोपीय संघ का सदस्य होते हुए भी संघ की साझी मुद्रा यूरो को नहीं अपनाया है, जबकि नॉर्वे की जनता ने तो दो बार हुए जनमतसंग्रहों में यूरोपीय संघ की सदस्यता को ही ठुकरा दिया. केवल 56 लाख निवासियों वाला डेनमार्क जनसंख्या की दृष्टि से स्वीडन के भी केवल आधे के बराबर है. वहां की सरकार ने 2015 में देश के संसदीय चुनावों से ठीक पहले घोषित किया कि दुबारा बहुमत मिलने पर वह क़ानून बनाएगी कि जनवरी 2016 से अधिकतर दुकानों, पेट्रोल पंपों और रेस्त्रां जैसे व्यापारिक प्रतिष्ठानों को नक़द पैसा लेने से मना करने का अधिकार होगा. केवल डाकघर, औषधि विक्रेता और सुपर बाज़ार नक़दी लेने से मना नहीं कर सकेंगे. लक्ष्य था, समय के साथ नक़द लेनदेन की अर्थी उठा देना. किंतु, चुनाव के बाद सरकार बदली और नक़दी की अर्थी कुछ और समय के लिए टल गई.

स्वीडन की तरह डेनमार्क में भी नक़दी-मुक्त अर्थव्यवस्था लाने का काम लगभग ढाई दशक से चल रहा है. 2013 में डेनमार्क के सबसे बड़े बैंक ‘दांस्के बांक’ ने स्मार्टफ़ोन वालों के लिए ‘मोबाइल-पे’ नाम का एक ऐसा ऐप बनवाया जो इस बीच देश के 90 प्रतिशत स्मार्टफ़ोनों में इस्तेमाल हो रहा है. इसे इस्तेमाल करने से पहले अपना पंजीकरण करवाना पड़ता है, जिसके लिए केवल फ़ोन-नंबर और क्रेडिट कार्ड चाहिये. इसके लिए किसी बैंक का ग्राहक होना ज़रूरी नहीं है. नई सरकार ने राष्ट्रीय बैंक की एक समिति को डेनिश समाज में नक़दी की भूमिका का विश्लेषण करने और भावी दिशा के लिए सुझाव देने को कहा था. सरकार का कहना है कि इस समिति ने नक़दी की भूमिका का अंत कर देने जैसा कोई सुझाव नहीं दिया है. यानी, नकदी-मुक्त लेनदेन की भारी लोकप्रियता के बावजूद डेनमार्क भी निकट भविष्य में नोटों और सिक्कों को पूरी तरह तिलांजलि नहीं देने जा रहा.

बेल्जियम में 93 प्रतिशत लेनदेन नकदी-रहित

नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क में अब भी उनकी पुरानी राष्ट्रीय मुद्राएं ही चल रही हैं, जबकि बेल्जियम में यूरोपीय संघ की साझी मुद्रा ‘यूरो’ लेनदेन की एकमात्र मुद्रा है. भ्रष्टाचार और कालेधन पर लगाम लगाने के लिए जनवरी 2014 से बेल्जियम में नियम है कि केवल 3000 यूरो (इस समय 1 यूरो = 73 रुपये) तक का ही नक़द लेन-देन हो सकता है. इससे अधिक का लेनदेन नक़द-मुक्त होना चाहिये. इस कारण वहां 93 प्रतिशत लेनदेन में अब नक़द भुगतान नहीं होता.

फ्रांस में नक़द भुगतान की सीमा सितंबर 2015 से निवासी फ्रांसीसियों के लिए 1000 और अनिवासी फ्रांसीसियों के लिए 10,000 यूरो तय कर दी गई है. यूरो मुद्रा वाले यूरोप के प्रमुख देशों में इटली ऐसा देश है, जहां लाखों लोगों के पास कोई बैंक खाता नहीं है. तब भी सरकार ने नक़द भुगतान की छूट देने वाली सीमा 2011 में 999.99 यूरो कर दी. इस सीमा का उल्लंघन करने वाले को 3000 यूरो से शुरू कर भुगतान-राशि के 40 प्रतिशत के बराबर तक जुर्माना देना होता है. इसी प्रकार यूरोप के अन्य देशों में भी कहीं नक़द भुगतान की कोई सीमा है तो कहीं नहीं. जहां ऐसी सीमा है, वहां के लोग नक़दी-मुक्त लेनदेन को अपनाने के लिए विवश हैं. जहां नहीं हैं, वहां अधिकतर लेनदेन नक़दी के माध्यम से ही होता है.

जर्मनी में 80 प्रतिशत लेन-देन नक़द-नारायण

यही कारण है कि जर्मनी में - जिसकी सवा आठ करोड़ की जनसंख्या और निर्यात-प्रधान अर्थव्यवस्था यूरोप में सबसे बड़ी है, पर जहां यूरो के नक़द लेनदेन पर सरकार की ओर से कोई रोक-टोक नहीं है - 80 प्रतिशत लेनदेन नक़द-नारायण से होता है. जर्मन सरकार तो नहीं, किंतु यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) यूरो वाले मुद्रा-ज़ोन के व्यावसायिक बैंकों से 5000 यूरो की एक नकदी-सीमा ज़रूर चाहता है.

कार्ल-लूडविश थीले जर्मनी के मुद्रा-बैंक ‘बुंडेसबांक’ के अध्यक्षमंडल के एक सदस्य हैं. बीते दिसंबर में प्रसारित एक रेडियो-इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ‘जर्मनी में भी नकदी-मुक्त लेनदेन बढ़ रहा है, लेकिन हर प्रकार के 80 प्रतिशत भुगतान नक़द ही होते हैं. वर्षों से थोड़ी घट-बढ़ के साथ नक़दी का यह बहुत ऊंचा अनुपात अब भी बना हुआ है. यह ज़रूर है कि लोग प्रायः 50 यूरो तक का ही भुगतान नकद करते हैं. इससे अधिक की राशि बिना नकदी के चुकाते हैं.’

नक़दी के प्रति जर्मन जनता के लगाव का बचाव करते हुए जर्मन केंद्रीय बैंक के इस बड़े अधिकारी का कहना था, ‘यह उपभोक्ताओं को, विशेषकर कम आय वाले लोगों को, अपना ख़र्च नियंत्रित रखने में प्रत्यक्ष सहायक बनता है. लोग जानते हैं कि उनके पास कितना पैसा है और कितना नहीं...’ डॉलर के बाद यूरो ही सबसे टिकाऊ मूल्य वाली दूसरी बड़ी विदेशी मुद्रा भी है.

नकदी की सीमा से बेचैनी

कार्ल-लूडविश थीले के अनुसार जर्मनी का केंद्रीय बैंक - इटली या बेल्जियम जैसे देशों के विपरीत - नक़द भुगतान की कोई ऊपरी सीमा तय करने का व्यावहारिक लाभ नहीं देखता. इस बारे में ’ऐसे कोई विश्वसनीय अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं’ जिनसे साफ़ पता चलता हो कि नक़द भुगतान की सीमा-रेखा खींच देने से अपराधवृत्ति में ‘वाकई कमी आती है.’ उनका कहना है कि ऐसी सीमाओं से ‘जनसाधारण में बेचैनी पैदा होती है. लोग कहते हैं कि जो पैसा मेरा है, मेरे पास है, उसे इच्छानुसार रखने या ख़र्च करने का अधिकार भी तो मेरा ही बनता है. मैं उसे घर में रखूं या बैंक के लॉकर में.’

इस प्रसंग में थीले एक बहुत ही सटीक तर्क देते हैं, ‘आप का जो पैसा आप के पास नक़दी के रूप में नहीं है, वह आपके बैंक के नाम भुगतान की मांग के समान है. अतीत में बैंक भुगतान (अक्षमता) की समस्याओं का सामना कर चुके हैं. यह भी नहीं भूल जाना चाहिये कि नकद पैसा मुद्रा-बैंक द्वारा जारी पैसा है. उसे सीधे मुद्रा-बैंक में जा कर बदला जा सकता है. उसका तब भी उपयोग हो सकता है, जब तकनीक (कंप्यूटर इत्यादि) फ़ेल हो जाये, बिजली गुल हो जाए या (मोबाइल फ़ोन) नेटवर्क काम नहीं कर रहा हो.’

‘नकद पैसा नागरिकों की कमाई का पैसा है’

इस इंटरव्यू में कार्ल-लूडविश थीले दो-टूक शब्दों में यह भी कहते हैं, ‘हमें या सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिये कि नकद पैसा देश के नागरिक की कमाई का पैसा है, न कि नोट जारी करने वाले बैंक का या देश की सरकार का. जर्मनी का बुंडेसबांक बिना किसी पक्षपात के नक़दी-मुक्त भुगतान की मांगों को भी पूरा करेगा. हर नागरिक के लिए यह संभव होना चाहिये कि वह अपने पैसे का अपनी इच्छानुसार उपयोग कर सके - नक़द या ग़ैर-नकद. जर्मनी का केंद्रीय बैंक आगे भी दोनों विकल्प सुलभ करता रहेगा.’ यूरोप के किसी भी केंद्रीय बैंक का कोई भी उच्च पदाधिकारी साकार या निराकार पैसे के बारे में इतने स्पष्ट शब्दों में बोलता और साकार (नकद) पैसे का खुलकर बचाव करता इससे पहले सुना नहीं गया है.

एक सर्वे के अनुसार, विश्व में इस समय जो 15 देश नक़दी-मुक्त डिजिटल समाज के लिए सबसे अधिक तैयार प्रतीत होते हैं, उनमें से नौ अकेले यूरोप में हैं. लेकिन यूरोपीय संघ ने 2016 की शुरुआत में अपने सदस्य देशों को भुगतान संबंधी सेवाओं के नियमन के लिए एक नया निर्देश भेजा. यह सितंबर 2016 से प्रभावी भी हो गया है. इस निर्देश में कहा गया है कि यूरोपीय संघ के देशों में रहने वाले हर व्यक्ति को अपने भुगतानों के लिए ऐसा बैंक-खाता रखने का अधिकार है, जो मूलभूत सुविधाएं प्रदान करता हो.

नकदी-मुक्ति धीमी पड़ेगी

इस निर्देश के बाद स्वीडन के राष्ट्रीय मुद्रा-बैंक ‘रिक्सबांक’ ने देश के व्यावसायिक बैंकों को आदेश दिया कि उन्हें अपने ग्राहकों को नकद पैसे सहित सभी मूलभूत बैंकिंग सेवाएं भी देनी होंगी. व्यावसायिक बैंक इस आदेश से काफी तिलमिलाए हुए हैं और शिकायत कर रहे हैं कि यह आदेश नकदी-मुक्त समाज की दिशा में प्रगति से पीछे हटने के समान है. ‘रिक्सबांक’ का कहना है कि वह इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के विरुद्ध नहीं है, बल्कि व्यावसायिक बैंकों ने ही नकदी संबंधी अपनी सेवाओं को समेटने में ज़ल्दबाज़ी कर दी. कहने की आवश्यकता नहीं कि जनता के व्यापक हित में यूरोपीय संघ के नए निर्देश के बाद, कम से कम यूरोपीय संघ के देशों में, नक़दी-मुक्त अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति अब कुछ धीमी पड़ जायेगी.

इसमें कोई संदेह नहीं कि नक़दी-मुक्त अर्थव्यवस्था के अनेक आर्थिक लाभ हैं. पर, यह भी निश्चित है कि उससे ऐसे कई आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक नुकसान भी होंगे, जिन्हें टालना भी उतना ही ज़रूरी है. स्वीडिश पुलिस बल के महानिदेशक और इंटरपोल के अध्यक्ष रह चुके ब्यौर्न एरिक्ससोन अनायास ही नहीं कहते कि नक़दी-मुक्त इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग ट्रेंडी (फैशन) भले ही बन गया हो, लेकिन एक पूरा समाज नक़दी-मुक्त बन जाने में कई प्रकार के ख़तरे छिपे हुए हैं.

नकदी-मुक्ति के इलेक्ट्रॉनिक खतरे

सबसे पहले बात करते हैं इलेक्ट्रॉनिक ख़तरों की. पिछले साल दो दिसंबर को मॉस्को से समाचार आया कि अज्ञात हैकरों (कंप्यूटर सेंधमारों) ने कई जाली कोडों की मदद से रूस के केंद्रीय बैंक में सेंध लगाकर दो अरब रूबल (तीन करोड़ दस लाख डॉलर से अधिक) के बराबर धनराशि लूट ली. बैंक के एक अधिकारी ने यह जानकारी देते हुए दावा किया कि हैकर वास्तव में पांच अरब रूबल उड़ाना चाहते थे, पर सफल नहीं हुए. हैकरों ने बैंक के कई ग्राहकों के खातों में उनकी जाली पहचान की सहायता से सेंध लगाई. उड़ाई हुई धनराशि उन्होंने अपने बैंकों के जिन खातों में डाल दी थी, उनकी टोह लेते हुए कोई दो करोड़ 60 लाख डॉलर के बराबर पैसा वापस लाया जा चुका है. यह भी कहा गया कि हैकरों ने संभवतः कई बार घात लगा कर यह धनराशि उड़ाई और इसके लिए विदेशों में स्थित कंप्यूटर इस्तेमाल किये, पर हैकरों की पहचान नहीं हो सकी.

यह कोई पहला मामला नहीं. फरवरी 2016 में कंप्यूटर सेंधमारों ने बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक ‘बांग्लादेश बैंक’ के कंप्यूटरों को धोखा देकर 95 करोड़ 10 लाख डॉलर उड़ाए थे. इनमें से दो करोड़ डॉलर श्रीलंका भेजे गए थे, आठ करोड़ 10 लाख डॉलर फिलीपींस और 30 किश्तों में 85 करोड़ डॉलर अमेरिका में फ़ेडरल रिज़र्व बैंक ऑफ़ न्यूयॉर्क के पास पहुंचे थे. न्यूयॉर्क वाले बैंक को जब इतनी सारी किश्तों ओर रकम पर शक हुआ और उसने ‘बांग्लादेश बैंक’ से संपर्क किया तो ‘बांग्लादेश बैंक’ को पता चला कि हुआ क्या है. इसी तरह के मामले 2015 में इक्वाडोर, फिलीपींस और वियतनाम के बैंकों के साथ भी हो चुके हैं.

यहां प्रश्न यह उठता है कि जब देशों के केंद्रीय या राष्ट्रीय मुद्रा बैंक तक अपने कंप्यूटरों को साइबर अपराधियों के हमलों से बचा नहीं पाते, तो हम-आप अपने कंप्यूटरों या मोबाइल फ़ोनों को हैकरों के हमलों से भला कब तक और कितना बचा सकते हैं?

‘कास्पर्स्की लैब’ का सर्वे

‘कास्पर्स्की लैब’ कंप्यूटर और सूचना तकनीक में सुरक्षा-समाधानों की सबसे प्रसिद्ध और विश्वसनीय कंपनी मानी जाती है. वह हर वर्ष एक सर्वे भी प्रकाशित करती है कि कमियों और सुधारों की क्या स्थिति है. 2015 में उसने सूचना तकनीक के मामले में जोखिम से जुड़ा एक सर्वे किया था. इस वैश्विक सर्वे में जिन कंपनियों, बैंकों इत्यादि को शामिल किया गया, उनमें से 47 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि सुरक्षा पर ख़र्च बढ़ाने के बावजूद उनका वित्तीय लेनदेन उतना सुरक्षित है, जितना होना चाहिए. इनमें से 32 प्रतिशत फ़र्में कुछ पहले या सर्वे के दौरान अपने कंप्यूटरों पर किसी न किसी साइबर हमले का निशाना बन चुकी थीं. यानी हर तीन में से एक कंपनी डेटा-चोरी झेल चुकी थी. 47 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि बैंकों को चाहिये कि वे ऑनलाइन बैंकिंग की सुरक्षा को और बेहतर बनायें. दूसरे शब्दों में, ऑनलाइन, यानी इंटरनेट बैंकिंग को सुरक्षित मानना एक ख़ामख़याली है.

कास्पर्स्की लैब ने यह भी पाया कि मोबाइल बैंकिंग बढ़ने के साथ-साथ बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों को बढ़ती हुई ऑनलाइन धोखाधड़ी का भी सामना करना पड़ रहा है. 48 प्रतिशत वित्तीय संस्थानों ने कहा कि वे मूल समस्या को हल करने के बदले क्षतिग्रस्त लोगों को क्षतिपूर्ति देकर मामला सुलझाते हैं. यह उपाय बचावकारी उपायों पर ख़र्च करने से सस्ता पड़ता है और नाम भी बदनाम नहीं होता. इस सर्वे के आधार पर कास्पर्स्की लैब ने एक बार फिर यही निष्कर्ष निकाला है कि साइबर धोखाधड़ी हर प्रकार के काम में पैसों के सुरक्षित लेनदेन की अब भी सबसे बड़ी बाधा है.

साइबर धोखाधड़ी का अंतरराष्ट्रीय जाल

वर्षों की लंबी खोजबीन के बाद बीते साल नवंबर में ही 41 देशों के आइटी विशेषज्ञों ने साइबर धोखाधड़ी के एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय जाल का भंडाफोड़ किया, जो 2009 से सक्रिय था. उसके सदस्यों ने कम से कम 1336 मामलों में ऑनलाइन बैंकिंग करने वालों के 60 लाख यूरो चुराए. अकेले जर्मनी में 50,000 से अधिक लोग ठगे गए. यह गिरोह ईमेल अटैचमैंट के जरिये ऑनलाइन बैंकिंग करने वालों के कंप्यूटर अपने नियंत्रण में ले लेता था और उन्हें कंप्यूटरों के अपने नेटवर्क का हिस्सा बना कर उनके बैंक-खातों से पैसे निकाल लिया करता था.

नवंबर में ही एक दूसरे गिरोह ने जर्मन टेलीकॉम कंपनी के लाखों ग्राहकों के राउटरों को जासूसी करने वाले वायरस से संक्रमित कर दिया था. कहा जाता है कि ऐसे काम अप्रिय देशों में अव्यवस्था फैलाने के विचार से अब कुछेक देशों की सरकारी गुप्तचर सेवाएं भी करने लगी हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि पाकिस्तान यदि जाली नोटों से भारत को पाट सकता है, तो भारत में ऑनलाइन बैंकिंग को भी पंगु बना सकता है.

नकदी-मुक्त समाज में सरकारें सबसे बड़ा खतरा

वास्तव में सरकारें ही - विदेशी ही नहीं स्वदेशी सरकारें भी - नकदी-मुक्त अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन सकती हैं. कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन से पैसों के लेन-देन का हर क़दम अपने पीछे जो निशान छोड़ेगा, उससे हर व्यक्ति सरकारों के लिए पारदर्शी बन जायेगा. सरकारें चाहें, तो इस सारी प्रक्रिया पर नज़र और नियंत्रण रख सकती हैं. कोई भी लेन-देन उनसे छिपा नहीं रहेगा. वे जिस किसी को अपने लिए कांटा समझेंगी, उसके क्रेडिट या डेबिट कार्ड को अवरुद्ध (ब्लॉक) कर देंगी. अमेरिकी गुप्तचर सेवा ‘एफ़बीआई’ के लिए हर ऐसा व्यक्ति अभी से संदिग्ध बन गया है, जो ऑनलाइन जाता ही नहीं, केवल नकद लेनदेन करता है. यानी वह कुछ छिपा रहा है.

जब नकदी का चलन ही नहीं रह जायेगा, तब सरकारों को नोट छापने, सिक्के ढालने और उनके वितरण की आवश्यकता भी नहीं रह जायेगी. पैसे का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं रह जाने से अभौतिक पैसे की मात्रा घटाना-बढ़ाना भी बांयें हाथ का खेल बन जायेगा. सरकारें जब चाहें तब सारी मुद्रा को अवैध या अमान्य घोषित कर सकती हैं. 100 रुपये को 10 रुपये या 10 रुपये को 100 रुपया भी बना सकती हैं. बैंक को आदेश देकर किसी व्यक्ति की सारी डिजिटल जमापूंजी ज़ब्त कर सकती हैं. नक़दी का चलन न होने से बचाने-छिपाने के लिए किसी के पास कुछ बचेगा भी तो नहीं. दूसरे शब्दों में, लोकतांत्रिक सरकारें भी तानाशाही बन सकती हैं और देश का हर नागरिक उनकी दया का गुलाम.

नकदी नहीं, तो बैंक कर्मचारी भी नहीं

यह सारा अतिवाद यदि न भी हो, तब भी भारत जैसे देश में नकदी रहित व्यवस्था की अपनी दिक्कतें हैं. यहां बिजली का कोई भरोसा नहीं रहता. जब-जब बिजली चली जायेगी, बैंक से लेकर ग्राहक तक कोई कुछ नहीं कर सकता. यदि बिजली सदा रहे भी, तब भी नकदी-मुक्त समाज में बैंकों में सारे काम कंप्यूटरों पर स्वचालित ढंग से होंगे. कैशियर और बहुत सारे क्लर्क बेकार हो जायेंगे. केवल ऋण, बांड या शेयरों संबंधी परामर्श देने के लिए इक्के-दुक्के लोग रह जायेंगे. एक दिन ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि सारे बैंक तिरोहित हो जायें और पूरे देश में केवल कोई एक ही केंद्रीय बैंक कंप्यूटरों और रोबोट मशीनों के सहारे सारी वित्त प्रणाली चला रहा हो. जब पैसे का ही कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होगा, तब आज के लाखों बैंक कर्मचारियों के अस्तित्व का भी भला क्या औचित्य बचेगा?