कागजों पर भारत यूं तो राज्यों का संघ है, लेकिन व्यवहार में देश के संघीय शासन में कई विषमताएं देखने को मिलती हैं. उदाहरण के लिए जम्मू-कश्मीर और मणिपुर जैसे राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) के जरिए न्याय के अधिकार में खासी कटौती की गई है. यह कानून सशस्त्र बलों को अधिकार देता है कि वे किसी की, कहीं भी, कभी भी तलाशी ले सकते हैं, उसे गिरफ्तार कर सकते हैं और खतरा होने पर मार भी सकते हैं. इसी तरह संविधान का अनुच्छेद-371 साफतौर पर यह इजाजत देता है कि नगालैंड में नगा समुदाय के परंपरागत कानून और प्रक्रियाएं चलती रहेंगी, वैध होंगी. भले ही भारतीय संविधान का लक्ष्य समान नागरिक संहिता हो लेकिन यह छूट नगाओं को मिली है. इसी तरह, तमिलनाडु में ऊंची जातियों की आबादी काफी कम है और संभवत: इसलिए वह आरक्षण को लेकर उच्चतम न्यायालय की ओर से निर्धारित अधिकतम 50 फीसदी सीमा की अनदेखी करने में सफल रहा है.

राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर प्रदेश और हिंदी का पलड़ा बाकी के मुकाबले भारी है

राष्ट्रीय राजनीति की बात करें तो भारत के संघीय शासन में विषमता का सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश पेश करता है. लोकसभा में हर छह में से एक सदस्य इसी प्रदेश से आता है. यानी केंद्र में स्थिर सरकार के लिए इस राज्य से प्रभावी संख्या में सीटें हासिल करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद अहम है. अब तक देश के 14 में से सिर्फ दो प्रधानमंत्री ही ऐसे हुए हैं, जिनकी पार्टियों के पास उत्तर प्रदेश से एक भी लोकसभा सीट नहीं थी. यानी, देश की बहुभाषी संस्कृति के लिहाज से यह कहना भी गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर प्रदेश (और उत्तर भारत के अन्य राज्यों की भी) की हिंदी भाषा का खासा वर्चस्व है. यही भाषाई विषमता अब लगता है, ममता बनर्जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की राह में आड़े आने लगी है. जबकि वे इस समय राष्ट्रीय राजनीति में अपने और अपनी तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) के लिए जमीन मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रही हैं. हालांकि वे इस बाधा से पार पाने की भरसक कोशिश करते हुए भी दिख रही हैं.

अभी पिछले दिनों जब दिल्ली में ममता बनर्जी नोटबंदी के खिलाफ केंद्र सरकार के विरोध में विपक्षी दलों की अगुवाई करते सड़कों पर उतरीं तो हिंदी बोलने की उनकी तैयारी भी साफ नजर आ रही थी. यह तैयारी सोशल मीडिया पर भी दिखी, जब उन्होंने हिंदी में एक के बाद एक कई ट्वीट किए. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट की मानें तो ममता ने हिंदी सीखने के लिए बाकायदा एक प्रशिक्षक भी रख लिया है. साथ ही, बंगाली-हिंदी शब्दकोष भी खरीद लिया है. वे आजकल हिंदी कविताएं भी पढ़ रही हैं. इसके अलावा नोटबंदी के खिलाफ उन्होंने हिंदी पट्‌टी के दो अहम राज्यों- बिहार और उत्तर प्रदेश की राजधानियों में जनसभाएं भी की हैं.

हिंदी प्रधानमंत्री की भाषा है!

प्रधानमंत्रियों के लिए हिंदी भाषा हमेशा से अहम रही है. इस पद के अधिकांश दावेदारों को इस भाषा से दो-चार होना ही पड़ा है. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू यूं तो कश्मीरी पंडित थे, लेकिन उनका परिवार मुगल शासन के दौर में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में आकर बस गया. लिहाजा वे बेहद सधे हुए तरीके से अवधी शैली वाली हिंदी बोल लेते थे. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही गुजरातीभाषी हैं, लेकिन वे सार्वजनिक जीवन की शुरुआत से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे हैं. और संघ में हिंदी अधिकृत भाषा सरीखी हो चुकी है. लिहाजा वे भी अच्छी हिंदी बोल लेते हैं. हालांकि मूल हिंदीभाषियों को कहीं-कहीं उनके उच्चारण में कुछ खामियां भी दिख जाती होंगी, लेकिन इसके बावजूद वे प्रभावशाली वक्ता हैं.

जहां तक दक्षिण भारत की बात है तो यहां के नेताओं के लिए हिंदी की बाधा कुछ और बड़ी हो जाती है. तमिलनाडु में तो 1960 के दशक में हिंदी थोपने की कोशिश के खिलाफ हिंसक आंदोलन तक हो चुके हैं. इसीलिए कोई अचरज की बात नहीं कि राज्य के नेताओं के लिए दिल्ली की गद्दी की तरफ कदम बढ़ाना हमेशा कांटेभरे रास्ते पर चलने जैसा रहा है. एक मिसाल, 1954 से 1963 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे ताकतवर कांग्रेसी नेता कुमारसामी कामराज की ही ली जा सकती है. चीन के साथ 1962 की लड़ाई में भारतीय सेना की पराजय के बाद कांग्रेस पार्टी में नेहरू का प्रभाव कम हो गया था. उसी वक्त कामराज की ताकत बढ़ी. इसी बीच 1964 में नेहरू के अचानक निधन के बाद तो वे 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गए. उस दौर में नेहरू के उत्तराधिकारी बनने के लिए मोरारजी देसाई और बाबू जगजीवन राम का नाम भी चल रहा था लेकिन कामराज ने लालबहादुर शास्त्री का समर्थन किया और वे ही प्रधानमंत्री बने.

फिर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद 1966 में नेहरू की बेटी इंदिरा को प्रधानमंत्री बनवाने में भी मुख्य भूमिका कामराज की ही थी. इसके पीछे उनका इरादा पर्दे के पीछे सत्ता संचालन करने का था. हालांकि असरदार हैसियत के बावजूद उन्होंने सीधे तौर पर खुद कभी प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी नहीं जताई. इसकी सबसे बड़ी वजह थी, भाषा. इसे उन्होंने खुद स्वीकार भी किया. एक बार मीडिया के कुछ लोगों ने उनसे इस बारे में सवाल किया तो उनका कहना था, 'मुझे न हिंदी आती है, न अंग्रेजी. मैं प्रधानमंत्री कैसे हो सकता हूं!' बाद में यही वजह 1984 में इंदिरा गांधी के निधन के बाद प्रधानमंत्री न बन पाने वाले प्रणब मुखर्जी (मौजूदा राष्ट्रपति) ने भी बताई. उन्होंने कहा था, 'अगर आपको हिंदी नहीं आती तो आप प्रधानमंत्री नहीं बन सकते. कुछ निश्चित कामों के लिए खास कौशल की जरूरत होती है.'

हालांकि कर्नाटक के एचडी देवेगौड़ा इस मामले में अपवाद रहे. वे देश के इकलौते नेता हैं, जो हिंदी न आने के बावजूद जून, 1996 में प्रधानमंत्री बने. वैसे देखा जाए तो देवेगौड़ा प्रधानमंत्री पद के लिए स्वाभाविक उम्मीदवार नहीं थे बल्कि तात्कालिक परिस्थितियों ने उन्हें इस पद बिठाया था. मई, 1996 में अटलबिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस समर्थित तीसरे मोर्चे ने पहले-पहल वीपी सिंह और ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की थी. लेकिन इन दोनों नेताओं ने उस वक्त त्रिशंकु संसद की स्थिति में मिलने जा रहा कांटोंभरा ताज पहनने से इनकार कर दिया. इसके बाद आश्चर्यजनक रूप से देवेगौड़ा का नाम सामने आया. लेकिन महज 11 महीने में ही जब उनकी इस पद से विदाई हुई तो शायद ही किसी को अचरज हुआ होगा.

दिल्ली की राजनीति में हिंदी कितनी अहम है, इसकी पुष्टि एक और मिसाल से होती है. देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करना था, वह भी हिंदी में. लेकिन हिंदी तो उन्हें आती नहीं थी! इसलिए उन्होंने पहले पूरा भाषण कन्नड़ में लिखवाया बाद में यांत्रिक तरीके से उसे हिंदी में पढ़ा.

ऐसे में, अगर ममता बनर्जी के हिंदी सीखने की खबरें आ रही हैं तो इस पर किसी को अचरज नहीं होना चाहिए.