इस साल के शुरुआती महीनों की एक घटना को जरा फिर से याद कीजिए. यह घटना उत्तराखंड की है जहां भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने संवैधानिक और वित्तीय संकट बताते हुए राष्ट्रपति शासन लगा दिया था. वहां हरीश रावत सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था. लेकिन मई में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की तमाम दलीलें खारिज करते हुए रावत सरकार को फिर बहाल कर दिया. जाहिर तौर पर इसके बाद हरीश रावत के लिए हर तरफ सहानुभूति की लहर पैदा हुई.

यह माना गया कि कांग्रेस के उनके कुछ साथियों ने उन्हें धोखा दिया और भाजपा ने मौका पाकर उनका ‘राजनीतिक शिकार’ करने की कोशिश की. उस वक्त यह भी माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर मिलने के बाद रावत विधानसभा भंग कर सकते हैं और राज्य में दोबारा चुनाव करा सकते हैं. इसमें कोई दोराय नहीं कि वे ऐसा करते, तो उन्हें फायदा ही हाेता. वे राज्य के सबसे बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो जाते क्योंकि उस वक्त उनकी साख और लोकप्रियता दोनों ही चरम पर पहुंच चुकी थी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं.

मुख्यमंत्री रावत ने मध्यावधि चुनाव के विचार के बजाय कांग्रेस विधायकों की इस राय को ज्यादा तवज्जो दी कि वे लोग अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करना चाहते हैं. और अब? जैसा कि अक्सर होता है, रावत अपने फैसले पर शायद पछता रहे होंगे. राज्य विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने में दो महीने बचे हैं. चुनाव सिर पर हैं और लोगों के सिर से रावत की लोकप्रियता का भूत काफी हद तक उतर चुका है. मीडिया में आ रही खबरें बताती हैं कि मुख्यमंत्री की चमक फीकी पड़ चुकी है. तानाशाही प्रवृत्ति वाली कार्यशैली की वजह से उन पर लगातार हमले हो रहे हैं. साथ ही, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप भी लग रहे हैं.

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी राज्य में कई धड़ों में बंट चुकी है. सरकारी कर्मचारी, जो सरकारों की रीढ़ होते हैं, खुले तौर पर मुख्यमंत्री की आलोचना कर रहे हैं क्योंकि रावत सरकार उनकी चिंताओं का निदान नहीं कर रही है. यानी कह सकते हैं कि जनमत, जो छह महीने पहले रावत के पक्ष में था, अब उनके खिलाफ दिख रहा है.

भाजपा वापसी करते हुए नजर आ रही है

दूसरी तरफ भाजपा, जो कुछ महीने पहले रावत की ताजपोशी के बाद अचानक हाशिए पर दिख रही थी, अब वापसी करते हुए नजर आ रही है. जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के उस पार भारतीय सेना द्वारा आतंकी शिविरों पर की गई सैन्य कार्रवाई (सर्जिकल स्ट्राइक) और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित नोटबंदी के फैसले का भाजपा ने भरपूर फायदा उठाया है.

दोनों ही फैसलों को ‘साहसिक’ बताते हुए पार्टी जनता के बीच यह संदेश देने में कामयाब हो रही है कि केंद्र में बैठी उसकी सरकार आतंकवाद, काले धन और भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है. पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) में की गई सर्जिकल स्ट्राइक का तो उत्तराखंड में कुछ ज्यादा ही असर हुआ है क्योंकि राज्य में पूर्व सैनिकों की आबादी अच्छी खासी आबादी है. इसी सब के मद्देनजर एक राजनीतिक विश्लेषक कहते भी हैं, ‘भाजपा छह महीने पहले तक कांग्रेस से काफी पीछे थी. लेकिन अब जो स्थिति दिख रही है, अगर वह बनी रही तो उसे आगामी चुनाव के बाद सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता.’

राज्य में इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चर्चा का का मुख्य विषय बने हुए हैं. यही हाल पड़ोसी उत्तर प्रदेश का भी है, जहां 2017 के शुरुआती महीनों में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में जाहिर तौर पर चुनावी राज्यों में मोदी ही भाजपा का मुख्य चेहरा होंगे. उन्होंने अपनी छवि ऐसे मजबूत और सख्त फैसले लेने वाले नेता की बना ली है कि उनके खिलाफ अब लोग कोई भी बात सुनना नहीं चाहते. और यह बात लोगों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान एकदम साफ हो जाती है. ऐसे में, मोदी की लोकप्रियता के बलबूते पर ही भाजपा उत्तराखंड में अब फिर से सरकार बनाने का मंसूबा बांध रही है. प्रधानमंत्री की लोकप्रियता ऐसी है कि उसने राज्य में भाजपा की संगठनात्मक खामियाें को पर्दे के पीछे धकेल दिया है. खामियां कई तरह की हैं. जैसे, अब तक पार्टी में कोई सर्वसम्मत नेता नहीं दिख रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के बीच रस्साकसी चल रही है. कांग्रेस से आए नौ नेताओं को पद और टिकट देने पर भी मतभेद हैं. लेकिन ये सब मुद्दे अभी पीछे हैं.

गढ़वाल बनाम कुमाऊं

इस समय उत्तराखंड में दोनों पार्टियों की स्थितियां अब पूरी तरह बदल चुकी हैं. इस वक्त कांग्रेस दबाव में ज्यादा नजर आ रही है. एक और कारक इस दबाव को लगातार बढ़ा रहा है. वह है, गढ़वाल बनाम कुमाऊं का समीकरण, जिसकी बहस लगातार तेज होती जा रही है. गढ़वाल क्षेत्र से आने वाले कांग्रेस नेताओं को लगता है कि उन्हें सरकार और संगठन में उचित अहमियत और तवज्जो नहीं दी जा रही है. इसका कारण ये है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत सहित कई बड़े मंत्री कुमाऊं क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं. इनमें इंदिरा हृदयेश और यशपाल आर्य जैसे कद्दावर मंत्री शामिल हैं. इस साल के शुरू में जब कांग्रेस के बागी नेताओं ने भाजपा का दामन थामा था, तब उन्होंने भी आरोप लगाया था कि रावत गढ़वाल क्षेत्र की उपेक्षा कर रहे हैं. जबकि इस क्षेत्र की आबादी और विधानसभा सीटें, दोनों ही कुमाऊं अंचल की तुलना में ज्यादा हैं. यहां तक कि भाजपा को भी गढ़वाल क्षेत्र में कांग्रेस की कमजोरी का अहसास हो चुका है. इसीलिए वह इस क्षेत्र में अपने लिए समर्थन बढ़ने की उम्मीद लगाने लगी है.

दूसरी तरफ, भाजपा को मैदानी क्षेत्रों में अपना जनाधार बरकरार रहने का भरोसा है. यहां उसके समर्थकों की तादाद पहले से ही अच्छी-खासी है. यानी अगले चुनाव हरीश रावत के लिए ‘अग्नि परीक्षा’ जैसे साबित होने वाले हैं. एक चतुर राजनेता की तरह वे कोश्यारी, खंडूरी और निशंक जैसे भाजपा नेताओं से सफलतापूर्वक मुकाबला करने की बात एक बार सोच भी सकते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी से लोहा लेना उनके लिए मुश्किल हो रहा है. ऐसे में उन्हें जल्द ही कोई रणनीति बनानी होगी, तुरंत कुछ ऐसे फैसले करने होंगे जो उनकी खराब होती छवि को दुरुस्त करें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो तय मानिए की अगले चुनाव में मोदी के बाजी मारने की संभावना एकतरफा हो जाएगी.