उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की आबादी, 2016 के अनुमान के मुताबिक, 33 लाख के आसपास है और 2011 की जनगणना के अनुसार यह 28,17,105 थी. वहीं, जयपुर की आबादी अभी 35 लाख के करीब है, जो 2011 की जनगणना में 30,46,163 बताई गई थी. जबकि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की जनसंख्या 2011 की जनगणना में 17,98,218 थी और फिलहाल 23 लाख के आसपास होने का अनुमान है. इंदौर शहर की आबादी 19,64,086 (2011 की जनगणना में) थी, जो अब 25 लाख के लगभग पहुंच चुकी होगी, ऐसा अंदाजा है.

इन चारों शहरों की आबादी का जिक्र करने की यहां खास वजह है. यह वजह भोपाल-इंदौर मेट्रो रेल के बाताल्लुक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से पूछे गए सवाल के जवाब में छिपी है. अभी 29 नवंबर को जब शिवराज ने मुख्यमंत्री के तौर पर प्रदेश में 11 साल पूरे किए, तब करीब-करीब सभी प्रमुख अखबारों में उनके साक्षात्कार प्रकाशित हुए थे. इन्हीं में से एक में उनसे पूछ लिया गया कि भोपाल और इंदौर में मेट्रो रेल का सपना कब पूरा होगा? इस पर मुख्यमंत्री का कहना था, ‘मेट्रो के लिए तो 50 लाख की आबादी जरूरी है इसलिए हम लाइट मेट्रो के विकल्प पर काम कर रहे हैं.’

अब इसी जवाब के बरअक्स ध्यान दिलाना लाजमी है कि लखनऊ में फरवरी 2013 में मेट्रो रेल परियोजना शुरू करने के बारे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बजट भाषण में घोषणा की थी. और अभी बीते एक दिसंबर को ही ट्रांसपोर्ट नगर से चारबाग के बीच 8.5 किलोमीटर के रूट पर इसका परीक्षण भी शुरू हो चुका है. अगले साल 26 मार्च से आम लोग भी इसमें सफर करने लगेंगे. हालांकि इस परियोजना पर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट ( डीपीआर ) वगैरह तैयार करने का काम सितंबर 2008 से ही शुरू हो चुका था. इसी तरह, जयपुर में मेट्रो रेल की परियोजना पर कागजी कार्रवाई दिसंबर 2009 से शुरू हुई. तब मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (मेट्रो निर्माण के लिए कॉरपोरेशन गठित करने की कानूनी प्रक्रिया) तैयार किया गया. जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन का गठन भी 2009-10 में ही हुआ और तीन जून 2015 से ट्रेन असल पटरियों पर दौड़ने लगी. फिलहाल मेट्रो ट्रेन यहां मानसरोवर से चांदपोल के बीच 9.63 किलोमीटर की दूरी तय कर रही है.

लेकिन मध्य प्रदेश में हालात ‘नौ साल चले अढ़ाई कोस’

मध्य प्रदेश के हाल ‘नौ साल चढ़े अढ़ाई कोस’ वाले हैं. यहां सबसे पहले 2007 में तत्कालीन नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर ने भोपाल-इंदौर में मेट्रो चलाने की घोषणा की थी. इसके लिए आनन-फानन में पहले दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराई गई. लेकिन यह डीपीआर रद्द कर दी गई. अफसरों ने तर्क दिया कि इसमें मेट्रो चलाने के लिए बताया गया खर्च बहुत ज्यादा है. इसके बाद 2012 में फिर नई डीपीआर बनवाने के लिए वैश्विक निविदाएं (ग्लोबल टेंडर) बुलाई गईं. इसके जरिए जर्मनी की कंपनी एलआरटीसी और प्रदेश की एजेंसी रोहित एसोसिएट्स को डीपीआर बनाने का जिम्मा दिया गया. फरवरी 2014 में दूसरी डीपीआर को मंजूरी दे दी गई. इसके हिसाब से जैसा कि नगरीय प्रशासन आयुक्त विवेक अग्रवाल ने एक अखबार को बताया है, ‘भोपाल में 95.03 किलोमीटर ट्रैक पर मेट्रो चलाने की योजना है. इस पर करीब 22,504.25 करोड़ रुपए की लागत आएगी. जबकि इंदौर में 104 किलोमीटर का ट्रैक होगा, जिस पर मेट्रो रेल चलाने में 26,762.21 करोड़ रुपए का खर्च आएगा.’

यानी भोपाल और इंदौर की मेट्रो परियोजनाओं की कुल लागत करीब 49,266.46 करोड़ रुपए है. यही रकम जुटाना राज्य सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है क्योंकि सरकारी खजाना तो तंगहाल है. यही वजह थी कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सितंबर 2015 में जब जापान गए तो उन्होंने जाइका (जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन) को दोनों मेट्रो परियोजनाओं के लिए कर्ज देने पर राजी कर लिया. तय हुआ कि 60 फीसदी रकम बतौर कर्ज जाइका से मिलेगी. बाकी 20 फीसद राज्य और इतना ही हिस्सा केंद्र देगा. लेकिन विवेक अग्रवाल (मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन - एमपीएमआरसी के प्रबंध निदेशक) और उनकी टीम ने सरकार की नजर में नंबर बढ़ाने के लिए इस प्रस्ताव में भी छेड़छाड़ कर डाली. उन्होंने दोनों परियोजनाओं के पहले चरण के लिए जो पीपीआर (प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट) तैयार की, उसमें राज्य का 20 फीसदी हिस्सा भी जाइका से मिल रहे कर्ज में जोड़ दिया. लेकिन उनकी होशियारी ने जायका बिगाड़ दिया.

एक मार्च 2016 में तैयार की गई पीपीआर के मुताबिक, भोपाल मेट्रो के पहले चरण पर 6,992.92 करोड़ रुपए खर्च होने हैं. इसमें जाइका से 5,570.34 करोड़ रुपए कर्ज के रूप में और बाकी 1,392.58 करोड़ रुपए भारत सरकार से मदद मिलने का उल्लेख है. इसी तरह इंदौर मेट्रो के पहले चरण में 7,522.63 करोड़ रुपए की लागत आने का जिक्र है. इसमें 6018.104 करोड़ रुपए जाइका से कर्ज और 1,504.526 करोड़ रुपए केंद्र से मदद लिए जाने का उल्लेख है. यह पीपीआर जाइका के पास पहुंचते ही उसने कर्ज देने में उदासीनता दिखानी शुरू कर दी. यहां तक कि दोनों परियोजनाओं के लिए उसकी प्रतिक्रिया ही ठंडी पड़ गई. जबकि उसकी टीम पिछले साल ही भोपाल और इंदौर का दौरा करने के बाद इन परियोजनाओं को पहले मंजूरी दे चुकी थी. जाइका बिगड़ा तो सरकार ने एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और यूरोपियन बैंक का दरवाजा खटखटाया. लेकिन एडीबी ने शर्त रख दी कि पहले जाइका से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लाइए. उसमें साफ जिक्र होना चाहिए कि दोनों परियोजनाओं को कर्ज देने का प्रस्ताव वहां रद्द हो चुका है.

पैसा आया नहीं और 27 करोड़ रुपए खर्च भी हो गए

जाइका से एनओसी अब तक मिली नहीं, तो जाहिर है, रकम का इंतजाम भी नहीं हो पाया है. इस बीच, एक दिलचस्प तथ्य नौ दिसंबर को खत्म हुए शीतकालीन सत्र के दौरान विधानसभा प्रश्नोत्तरी से निकलकर सामने आया. इसी साल जून में मंत्री पद गंवा चुके भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर के सवाल पर सरकार ने बताया है, ‘भोपाल-इंदौर की मेट्रो परियोजनाओं के फीजीबिलिटी सर्वे, कंसल्टेंसी, आदि से लेकर वेतन-भत्तों तक 27 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं.’ यानी काम कुछ हुआ नहीं, पैसा कहीं से आया नहीं और है भी नहीं, इसके बावजूद खर्च बदस्तूर जारी है. और अगर कर्ज का बंदोबस्त अगले साल तक हो भी जाता है, तब भी एमपीएमआरसी की रफ्तार देखकर दावे के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आने वाले छह-साल में भी दोनों शहरों में मेट्रो पटरी पर आ सकेगी. वैसे, एमपीएमआरसी की दोनों पीपीआर में लिखा है कि परियोजनाओं पर काम 2015-16 से शुरू हो जाएगा और 2019-20 में पूरा होगा.

लेकिन तारीखों का क्या है. वे तो होती ही ‘तारीख पर तारीख’ देने के लिए हैं. गौर को दिए गए लिखित जवाब में खुद सरकार ने विधानसभा में कहा है कि दोनों परियोजनाओं के लिए कर्ज देने वाली एजेंसी तय होने के बाद इनके पूरे होने में कम से कम छह साल लगेंगे. और 2015-16 तो लगभग निकल ही चुका है. शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री भी अब लाइट मेट्रो की बातें करने लगे हैं. क्योंकि राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी शिवराज सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि जनता को भरमाए रखने के लिए लगातार कुछ लुभावना करते-कहते रहना चाहिए, जो वे किया भी करते हैं.