ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन कुछ समय पहले भारत में थे. एक समाचार पत्र के कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए उन्होंने अपने कई राजनीतिक अनुभव लोगों से साझा किए. इस दौरान उन्होंने विश्व के कुछ प्रमुख नेताओं से मिली सीखों के बारे में भी बताया. उन्‍होंने कहा, ‘मैंने इन नेताओं से कुछ सीखा है जिसके बाद मैं कहता हूं कि आप कभी भी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ गोल्‍फ मत खेलिए, आप उनसे जीत नहीं सकते. आप इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्‍कोनी के साथ कभी पार्टी करने मत करिये और कभी भी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 60 हजार लोगों के सामने मत जाएये क्‍योंकि आप उनके लोगों से जुड़ने के कौशल का मुकाबला नहीं कर सकते हैं.’

कैमरन ने इस कार्यक्रम में भले ही विश्व के तीन नेताओं से मिली सीख को साझा किया हो. लेकिन, इसी साल वे भी दुनिया भर के नेताओं के सामने एक मिसाल पेश कर चुके हैं. इसी साल जून में ब्रिटेन में एक जनमत-संग्रह हुआ था. इसका सवाल था कि क्या ब्रिटेन को यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग हो जाना चाहिए? जनमत-संग्रह में डेविड कैमरन ने ब्रिटेन की जनता से ईयू में बने रहने के लिए वोट देने की अपील की थी और इसके लिए उन्होंने प्रचार भी किया था. लेकिन, इसके बावजूद जनता ने ब्रिटेन के ईयू से अलग होने के पक्ष में निर्णय सुना दिया. 23 जून की रात को आए जनमत-संग्रह के परिणाम के कुछ ही घंटे बाद डेविड कैमरन ने प्रधानमंत्री पद से अपना इस्तीफ़ा दे दिया.

इस पूरे घटनाक्रम में अजीब यह है कि कैमरन ने यह इस्तीफ़ा तब दिया जब उनकी अपनी कंजर्वेटिव पार्टी ही नहीं बल्कि विपक्षी लेबर पार्टी के भी कुछ नेता उनसे ऐसा न करने को कह रहे थे. इन सभी का कहना था कि जनमत-संग्रह उनके नेतृत्व को लेकर नहीं किया गया था और इससे उनकी नेतृत्व क्षमता सवालों के घेरे में नहीं आती है. कुछ नेताओं का यह भी कहना था कि कैमरन अगर इस्तीफ़ा देते हैं तो यह उस जनमत का अनादर होगा जिसने उन्हें मात्र एक साल पहले ही पांच साल के लिए पूर्ण बहुमत से सत्ता सौंपी थी.

लाखों लोगों का कहना है कि अगर उन्हें पता होता कि डेविड कैमरन अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे तो वे जनमत-संग्रह के दौरान ब्रिटेन के ईयू में बने रहने के विकल्प को ही चुनते

जनमत-संग्रह से कुछ समय पहले उनकी पार्टी के 80 सांसदों और उनकी कैबिनेट के कई मंत्री ने उन्हें एक पत्र भी लिखा था. इसमें इन्होने कहा था, ‘हम सब ब्रिटेन के ईयू से अलग होने के पक्ष में वोट करेंगे, लेकिन इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि हमें आपके नेतृत्व से किसी तरह की कोई परेशानी है.’ इन लोगों ने इस पत्र में कैमरन से निवेदन किया था कि जनमत-संग्रह का परिणाम चाहे जो भी आए, वे प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा न दें.

लेकिन डेविड कैमरन ने इन सभी अपीलों को खारिज करते हुए इस्तीफ़ा दे दिया. कैमरन का कहना था कि जनमत-संग्रह में जनता ने जो रास्ता चुना है, वे उससे अलग रास्ते पर चलने की वकालत करते रहे हैं. ऐसे में जनता जिस रास्ते पर चलना चाहती है उसके लिए उसे दूसरे कप्तान की जरूरत पड़ेगी और इसीलिए नैतिकता के आधार पर उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि ‘जनता के फैसले का सम्मान होना चाहिए. लेकिन मैं अभी भी यही कहूंगा कि ब्रिटेन के लिए ईयू में रहना ही सबसे बेहतर विकल्प था.’

डेविड कैमरन जैसे प्रधानमत्री द्वारा लिए गए इस फैसले के बाद ब्रिटेन के लाखों लोगों का कहना था कि अगर उन्हें यह पता होता कि कैमरन अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे तो वे जनमत-संग्रह के दौरान ब्रिटेन के ईयू में बने रहने के विकल्प को ही चुनते.

कैमरन के इस फैसले ने जहां ब्रिटेन के लोगों को हिला दिया. वहीं यह भारत सहित दुनिया भर के तमाम नेताओं के सामने एक आईना भी पेश करता है. दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कैमरन ने इसलिए इस्तीफ़ा दिया क्योंकि देश को चलाने वाले और उसकी प्रजा की सोच मेल नहीं खा रही थी. इन लोगों के मुताबिक कैमरन नैतिकता की जिस राह पर चले हैं उसका उदाहरण पिछले कई दशकों से कम ही देखने को मिला है. इनके मुताबिक यह राह अपने आप में कितनी अलग है इसका पता इस बात से चलता है कि ब्रिटेन की संसद में नेता विपक्ष जेरेमी कोरबेन ने भी कैमरन के साथ मिलकर ब्रिटेन के ईयू में बने रहने के लिए प्रचार किया था. लेकिन उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने से मना कर दिया. यहां तक कि कोरबेन के इस्तीफे को लेकर उनकी लेबर पार्टी के सांसदों तक ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, फिर भी वे इस्तीफा देने के लिए तैयार नहीं हुए.

जानकार कहते हैं कि जहां कैमरन ने जनता और अपनी सोच के मेल न खाने पर इस्तीफ़ा दे दिया वहीँ भारत जैसे देशों में जनता की सोच का नेता लोग जिस तरह से मखौल उड़ाते हैं वह देखने लायक है. उदाहरण के तौर पर भारत में हाल में सबसे ज्यादा उम्मीदें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लगाई गई थीं. लेकिन, चुनाव बाद पता लगा कि जनता ने कई मुद्दों पर जिस सोच के साथ इन्हें चुना था इन्होंने उसका उलटा किया.

2014 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह हारकर मात्र 44 सीटों पर ही सिमट गई, लेकिन फिर भी सोनिया या राहुल गांधी में से किसी ने अपने पद से इस्तीफ़े की पेशकश तक नहीं की

उदाहरण के तौर पर 2014 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने यूपीए सरकार की यूआइडीएआइ यानी आधार योजना पर हजारों सवाल खड़े किए थे. कई नेताओं ने यह तक कह दिया था कि यह कांग्रेस सरकार का एक घोटाला है और भाजपा की सरकार बनते ही इसे बंदकर इससे जुड़े लोगों पर मुकदमा चलाया जाएगा. खुद नरेंद्र मोदी ने बंगलुरू की एक चुनावी सभा में इस योजना पर निशाना साधते हुए इसे राजनीतिक नौटंकी करार दिया था. लेकिन उन्होंने सत्ता में आते ही इस योजना को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि कई सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया.

इसी तरह जीएसटी बिल को जनता विरोधी बताते हुए भाजपा 10 साल से इसका विरोध कर रही थी. लेकिन सत्ता में आते ही इसे पारित कराने के लिए उसने अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. संसद में 2015 में पारित हुआ भूमि अधिग्रहण बिल भी इसी श्रेणी में आता है. इसके अलावा 100 दिन में काला धन वापस लाने और भाजपा की सरकार बनने के बाद एक भी बांग्लादेशी को भारत में दिखने न देने जैसी बातें खुद नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में जोर-शोर से की थीं. जाहिर है कि जनता ने इन मुद्दों पर जिस सोच के साथ उन्हें इतना बड़ा समर्थन दिया था उससे जुड़ी कई चीजें अब पहले की उलटी हो चुकी हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक कभी बदलाव के प्रतीक माने जाने वाले अरविंद केजरीवाल भी सत्ता में आने के बाद अन्य दलों के रंग में ही रंगे नजर आए. शुरुआत में ही योगेंद्र-प्रशांत प्रकरण की वजह से, उनसे लगाई गईं राजनीतिक विकल्प जैसी उम्मीदें धूमिल हो गईं. साथ ही इससे काफी हद तक यह भी साफ़ हो गया कि आम आदमी पार्टी का भी अंदरूनी ढांचा अन्य पार्टियों जैसा ही है. लोकपाल बिल, दिल्ली में शराब की दुकानों को दिए गए लाइसेंस और 21 संसदीय सचिवों की नियुक्ति सहित कई ऐसे मामले हैं जो केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं.

राजनीतिक जानकार कहते हैं भारत की राजनीति में ब्रिटेन से बिलकुल उल्टी तस्वीर ही देखने को मिलती है. भारत में चुनाव आदि में जनता द्वारा नेताओं की नेतृत्व क्षमता को पूरी तरह से नकारने के बाद भी वे अपने पद से इस्तीफ़ा नहीं देते हैं. उदाहरण के तौर पर 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह हारकर मात्र 44 सीटों पर ही सिमट गई, लेकिन फिर भी सोनिया या राहुल गांधी में से किसी ने भी अपने पद से इस्तीफ़े की पेशकश तक नहीं की. इस श्रेणी में तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी भी आते हैं, जो 2009 में चुनाव हारने के बाद भी 2014 के चुनाव में पार्टी का चेहरा बनने के लिए उत्साहित दिखे थे. इसके चलते नरेंद्र मोदी को पार्टी का प्रमुख चेहरा बनने के लिए काफी ज्यादा मशक्कत करनी पड़ी थी. इस तरह के राजनेताओं में अमित शाह का नाम भी लिया जा सकता है. दिल्ली और बिहार का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद भी नरेंद्र मोदी की कृपा से उन्हें फिर से भाजपा अध्यक्ष चुन लिया गया.