किताब का अंश – ‘मैंने यहां जो कुछ देखा, उसने दुनिया को देखने का मेरा नज़रिया बदल दिया. उसने मेरी राजनीति को और धारदार बनाया. मसलन, अगर आप ताजमहल देखें तो आपको उसके आगे अपने छोटे होने का अहसास होगा. इसकी खूबसूरती और भव्यता के आगे हम झुकेंगे और मुग्ध हो जाएंगे. लेकिन जेएनयू में रह कर ताजमहल देखने जाएं तो आपको महसूस होगा कि यह हम आप जैसे लोगों के खून-पसीने का शोषण करके बनाई गई इमारत है. मैंने जाना कि यहां राजनीति करने के लिए आपको अच्छी अंग्रेज़ी आनी ज़रूरी नहीं है. चमकदार सफेद कपड़े ज़रूरी नहीं हैं. काफी सारा पैसा ज़रूरी नहीं है. यहां तक कि कई बार बहुत बड़ा संगठन होना भी जरूरी नहीं है... पूरी दुनिया में फुटपाथ पर चलने वाले लोग राजनीति के हाशिए पर हैं. जेएनयू में वही लोग राजनीति का नेतृत्व करते हैं.’


किताब : बिहार से तिहाड़

लेखक : कन्हैया कुमार

प्रकाशन : जगरनॉट बुक्स

कीमत : 250 रुपये


सामाजिक व्यवस्था, सरकार और प्रशासन के दमन चक्र से त्रस्त होने वाले तो देश में असंख्य लोग हैं, लेकिन इसका शिकार होकर हर कोई नायक नहीं बन जाता. कन्हैया कुमार एक ऐसे छात्र नेता हैं जो मुद्दों की राजनीति करते-करते बड़ी राजनीति का शिकार बने, लेकिन पूरा शिकार होने से रह गए इसलिए छात्रनेता से जन नायक सरीखे बन गए. ‘बिहार से तिहाड़‘ कन्हैया कुमार के बिहार के एक गरीब परिवार से निकलकर, देश में एक अलग पहचान रखने वाले संस्थान जेएनयू में पहुंचकर, देश की सबसे बड़ी जेल जाने की दास्तान है. यह जानना अपने आप में ही काफी दिलचस्प है कि कैसे एक शोधार्थी बिना कोई अपराध किए, राजनीति का शिकार बनकर कुख्यात अपराधियों की सराय यानी तिहाड़ पहुंच जाता है.

किताब में देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों में से एक, जेएनयू की खूबसूरत झलक देखने को मिलती है. जेएनयू के लोकतांत्रिक तानेबाने को कन्हैया ने अच्छे से दर्ज किया है

पूरी किताब को पांच भागों में पूरा किया गया है. बचपन, पटना, दिल्ली, जेएनयू और तिहाड़. कन्हैया बिहार के बेगूसराय ज़िले के एक सबसे संपन्न गांव के बेहद गरीब परिवार से है. कैसे सामान्य जाति का होने के बावजूद भी, गरीबी जीवन में बड़ी-बड़ी चुनौतियां खड़ी करती है, इसकी सहज झलक इस किताब में देखने को मिलती है - ‘जब पहली बार मैं दिल्ली आया तो बारिश में लोगों को खुशी से नहाते देखकर हैरान रह गया था. बारिश हमारे लिए खुश होने वाली बात नहीं थी, क्योंकि इसके शुरू होते ही दुर्दशा शुरू हो जाती थी... घर पर खाने की दिक्कत हो जाती. जलावन गीला हो जाता और हमें रात में भी सत्तू खाकर गुज़ारा करना पड़ता. पूरे कमरे में पानी टपकता रहता. इतने बर्तन नहीं थे कि टपकती हुई सारी जगहों पर उन्हें रखा जा सके. इसलिए बारिश मुझे कभी अच्छी नहीं लगती थी. यह तो बहुत बाद में दिल्ली आकर जाना कि बारिश आने पर खुश हुआ जा सकता है, जब घर में पानी न टपक रहा हो.‘

सरकारी स्कूलों की दुर्दशा, पब्लिक स्कूलों का आर्थिक स्थिति के आधार पर बच्चे को तोड़ने वाला भेदभाव, मुस्लिम संप्रदाय के लोगों से बच्चे का पहला-पहला परिचय, जाति व्यवस्था से टकराते बच्चे और विभिन्न विचारधाराओं से एक युवा बनते किशोर का परिचय; इन सब मुद्दों का कन्हैया ने सहज विवरण दिया है. कैसे परिवार, गांव, शहर से लेकर पूरे देश की विभिन्न संस्थाओं में विरोधाभासी चरित्र एक साथ पलता है, इसका एक अच्छा उदाहरण कन्हैया ने दिया है - ‘गांव और मेरे परिवार पर कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव होने के बावजूद पितृसत्ता, जातिवाद, धार्मिकता, इन तमाम चीजों का असर था. बचपन में मैंने अपने परिवार में प्रगतिशीलता, आधुनिकता और पुरातनपंथी सोच जैसी आपस में विरोधी चीज़ों को एक साथ मौजूद देखा था.‘

किताब में देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों में से एक, जेएनयू की खूबसूरत झलक देखने को मिलती है. जेएनयू के लोकतांत्रिक तानेबाने को कन्हैया ने अच्छे से दर्ज किया है - ‘जेएनयू कैंपस में रहना एक सांस्कृतिक झटका देता है. लोग यहां बहुत आजा़दी से रहते थे... चाहे क्लासरूम हो, प्रदर्शन हो या फिर ढाबे हों, कहीं भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व पुरुषों से कम नहीं था... यहां के शिक्षक भी अलग तरह के थे. वे भी शिक्षकों की तरह व्यवहार करने के बजाए, छात्रों से दोस्ताना और बराबरी का व्यवहार करना पसंद करते थे. जल्दी ही मैं यह जान गया कि जेएनयू में मैं किसी भी प्रोफेसर की बात पर सवाल उठा सकता हूं, उनसे असहमत हो सकता हूं. यहां हमारी बहसें बराबरी के आधार पर होती हैं.‘

कन्हैया कोई लेखक नहीं हैं और न ही उन्होंने इस किताब में लेखक बनने की कोशिश की है. अब तक उन्होंने जो देखा-समझा-भुगता उसे बिल्कुल सीधी-सरल भाषा में इस किताब में कह दिया है

इस किताब की एक अच्छी बात यह है कि कन्हैया ने जेएनयू से जुड़े संदर्भों में तटस्थता बरतने की कोशिश की है. वहां की कमियों को ढकने की कोशिश नहीं की - ‘बाहरी समाज में जातिवाद दिखता है, जेएनयू के अंदर का जातिवाद नहीं दिखता. लेकिन वह होता है. ज़रूरी नहीं कि ज़ोर से नारे लगाने वाला आदमी सचमुच उन बातों पर अमल भी करता हो, जिन्हें वह चिल्ला-चिल्लाकर बोल रहा हो. ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद कहने वाला हो सकता है कि घोर ब्राह्मणवादी हो. जब मैंने चुनाव लड़े, मैंने जेएनयू के बदसूरत पहलू को भी देखा. उम्मीदवार चुनने में जाति का ख़ास खयाल रखा जाता है... जेएनयू में लोगों की ब्रांडिंग बड़ी जल्दी होती है. आपको हमेशा आपके संगठन से जोड़ कर देखा जाएगा और आपके संगठन ने किसी मुद्दे पर जो भी सही या ग़लत रुख अपनाया हो, आपसे उम्मीद की जाएगी कि आप उसका समर्थन करें.‘

जेल में बिताया गया एक-एक दिन पहाड़ सा कटता है. ऐसे में खुद को तनाव और अवसाद से बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है. कन्हैया ने तिहाड़ जेल में रहने के अपने कुछ ऐसे ही अनुभव किताब में साझा किए हैं - ‘मैंने अपने कमरे से एक रिश्ता कायम करने की कोशिश की. मैं खूब समय लगाकर, बड़े ध्यान से कमरे में झाड़ू लगाता. ज़रा सी भी धूल या गंदगी दिखती तो उसे साफ़ कर देता. खाने की प्लेट को खूब रगड़ कर अच्छे से साफ करता. सेल में लगे सरियों को गिनता... खाना, अब मैं स्वाद लेकर, धीरे-धीरे खाता. एक गरीब छात्र की और एक छात्र कार्यकर्ता की जिंदगी जीते हुए मैंने कभी स्वाद लेकर खाना नहीं खाया था. मेरा ध्यान खाने पर कम और भूख मिटाने पर ज़्यादा होता है. अब मैं इस पर ध्यान दे रहा था कि मैं क्या खा रहा हूं - भले ही वह बहुत अच्छा नहीं था.‘

कन्हैया कोई लेखक नहीं हैं और न ही उन्होंने इस किताब में लेखक बनने की कोशिश की है. अब तक उन्होंने जो देखा-समझा-भुगता उसे बिल्कुल सीधी-सरल भाषा में इस किताब में कह दिया है. पूरी किताब में एक युवा के मानवीय मूल्यों के लिए खड़े होने की बात है. साथ ही, इस्लामिक कट्टरपंथ के बरक्स उभर रहे हिंदू कट्टरपंथ को लेकर कन्हैया की घोर नाराज़गी इस किताब में दर्ज है. वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करने वाले संगठनों, सरकार और लोगों को खुले तौर पर चुनौती देते हैं. हां, किताब में कहीं-कहीं पर अपने भाषणों को लेकर कुछ आत्म-प्रशंसा सी महसूस होती है, जो न होती तो और भी अच्छा लगता. मीडिया की आधी-अधूरी जानकारी और खबरों का अनावश्यक प्रदर्शन कैसे किसी भी आम इंसान को बैठे-बिठाए नायक और खलनायक बना सकता है, यह किताब इसका अच्छा उदाहरण है

यह किताब किसे पढ़नी चाहिए –

1. कैसे राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार होकर एक सामान्य सा छात्र नेता देश का सबसे मशहूर छात्र नेता बन गया, यह जानने की इच्छा रखने वालों को.

2. जो जेएनयू की जमीनी हकीकत जानना चाहते हैं, उनको.

3.पुलिस, अदालत, मीडिया, सरकार और जेल प्रशासन के परस्पर संबंधों को जानने की इच्छा रखने वालों को.