केंद्र और राज्यों के बीच तकरार की एक नई वजह पैदा होती दिख रही है. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार चाहती है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को और अधिकार दिए जाएं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी चाहते हैं कि जिन आपराधिक मामलों की जांच एनआईए करती है, उनसे संबंधित आरोपियों की संपत्ति आदि जब्त करने के लिए राज्यों के पुलिस प्रमुखों से मंजूरी लेने की उसकी निर्भरता खत्म हो. लेकिन सरकार के इस दिशा में कदम बढ़ाते ही तमाम राज्य ऐतराज जता सकते हैं. वे अपने अधिकारों में दखलंदाजी का अारोप लगा सकते हैं.

सूत्रों के मुताबिक भाजपा चाहती है कि केंद्र सरकार न सिर्फ एनआईए एक्ट बल्कि यूएपीए ( गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून) में भी बड़े पैमाने पर संशोधन करे. वह चाहती है कि एनआईए को देश के बाहर अपराधों की जांच का भी अधिकार दिया जाए. साथ ही हथियारों की अवैध खरीद-फरोख्त, तस्करी, मानव तस्करी, महत्वपूर्ण वेबसाइटों की हैकिंग, विस्फोटक पदार्थों से जुड़े कानूनों के उल्लंघन आदि के मामलों की भी जांच का अधिकार उसे मिले.

2009 में तत्कालीन यूपीए सरकार की इसी तरह की कोशिश की की थी. लेकिन तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने इसका विरोध किया था. उन्होंने जनवरी 2009 में कहा था, ‘एनआईए की स्थापना के जरिए केंद्र सरकार राज्यों को दरकिनार कर स्वाभाविक रूप से आतंकवाद से लड़ाई का जिम्मा अपने ऊपर लेना चाहती है.’ इस वक्त तक एनआईए को अपना पहला निदेशक भी नहीं मिला था. इसके बाद भाजपा की ओर से पारित एक संकल्प में भी कहा गया था, ‘गृह मंत्री (पी चिदंबरम) द्वारा एनआईए का गठन देश के संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ है. ’ लेकिन शायद सत्ता में आने के बाद भाजपा का विचार बदल गया है.

मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमले के बाद 2009 में एनआईए का गठन किया गया था. जल्दबाजी में संसद से पारित कराए गए कानून के जरिए एनआईए को आठ कानूनों के दायरे में आने वाले अपराधों की जांच का अधिकार दिया गया था. इनमें यूएपीए भी शामिल है. यह भी व्यवस्था की गई थी कि इन अपराधों की जांच के लिए एनआईए को राज्य सरकारों से किसी तरह की इजाजत की जरूरत नहीं है. इसी पर तमाम राज्यों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी.