उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ओबीसी जातियों को अपने पक्ष में करने के लिए अखिलेश सरकार ने आरक्षण का दांव चला है. गुरुवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया. इन जातियों और उपजातियों में कहार, कश्यप, केवट, निषाद, बिंद, बहर, प्रजापति, राजभर, बाथम, गौर, तुरा, माझी, मल्लाह, कुम्हार, धीमर, गोड़िया और मछुआ शामिल हैं. अधिकारियों के मुताबिक अब इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा.

यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसा प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा हो. हालांकि इनको कभी केंद्र की मंजूरी नहीं मिल पाई. इससे पहले मार्च 2013 के दौरान भी राज्य विधानसभा से ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया था. इसमें उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और प्रशिक्षण संस्थान के अध्ययन के आधार पर केंद्र सरकार से इन सभी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए कहा गया था. इससे पहले 2004 में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की कैबिनेट ने भी इन 17 जातियों को एससी कोटे में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था. हालांकि, केंद्र के फैसले का इंतजार किए बगैर 10 अक्टूबर 2005 को उन्होंने इन जातियों को अनुसूचित जाति का लाभ देने का आदेश दे दिया था, जिसे बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था.

उधर, बसपा प्रमुख मायावती ने अखिलेश सरकार के इस प्रस्ताव को पिछड़ी जातियों की आंख में धूल झोंकने वाला फैसला बताया है. उन्होंने कहा कि 1995 में उन्होंने भी ऐसी ही कोशिश की थी, लेकिन प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास अटक गया था और इन जातियों को ओबीसी कोटे का भी लाभ मिलना बंद हो गया था. मायावती ने कहा कि जब वे दोबारा सत्ता में लौटीं तो उन्होंने इन जातियों को वापस पिछड़ी जाति में शामिल कर दिया ताकि इन्हें कम से कम ओबीसी कोटे का लाभ मिलने लगे.