लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर मंगलवार को बहस में हिस्सा लेते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दल कांग्रेस पर जमकर हमला बोला. उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर नोटबंदी और बजट तक तमाम मुद्दों पर बात की. नोटबंदी को लेकर नरेंद्र मोदी का कहना था कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय उनके वित्त मंत्री वाई वी चव्हाण भी बड़े नोटों को बंद करने का सुझाव लेकर उनके पास गए थे, लेकिन तब चुनाव के डर से उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘लेकिन हमें चुनाव का डर नहीं है, देश की चिंता है इसलिए नोटबंदी लेकर आए हैं.‘

नोटबंदी को तीन महीने पूरे होने वाले हैं. इस बीच शायद ही कोई दिन बीता हो जब मीडिया में मोदी सरकार का यह फैसला बहस का हिस्सा न रहा हो. विपक्ष ने लगातार इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा है. वह नोटबंदी को आम जनता के लिए आर्थिक आपातकाल सरीखा बताता रहा है. लोगों को नोटबंदी से हुई भारी परेशानी की खबरें भी खूब आती रही हैं. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके तमाम मंत्री इस फैसले का बचाव करते रहे हैं. चुनावी रैलियों में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे को अपने पक्ष में भुनाने की खूब कोशिश कर रहे हैं. इसी के तहत एक बार फिर उन्होंने संसद में इतिहास का हवाला देते हुए नोटबंदी को ऐसा साहसपूर्ण फैसला करार दिया जिसे लेने का साहस कोई कांग्रेसी प्रधानमंत्री नहीं जुटा पाया था.

कुछ समय पहले भाजपा संसदीय दल की एक बैठक में भी नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के फैसले का जोरदार तरीके से बचाव किया था. तब भी उनका कहना था कि यह फैसला 1971 में ही ले लिया जाना चाहिए था लेकिन चुनाव के डर से नहीं लिया जा सका. प्रधानमंत्री ने पूर्व नौकरशाह माधव गोडबोले की किताब, ‘अनफिनिश्ड इनिंग्स; रिकलेक्शंस एंड रिफ्लेक्शंस ऑफ अ सिविल सर्वेंट’ का हवाला दिया था. उन्होंने कहा था कि काले धन को खत्म करने के लिए जस्टिस वांछू समिति ने जो अनुशंसाएं की थीं उनमें एक नोटबंदी की भी थी और तत्कालीन वित्त मंत्री वाईवी चव्हाण ने इंदिरा गांधी से इस पर बात भी की थी. नरेंद्र मोदी का कहना था, ‘इस पर इंदिरा जी ने सवालिया लहजे में पूछा- क्या आगे कांग्रेस को कोई चुनाव नहीं लड़ना है? इससे, चव्हाण को संदेश मिल गया और अनुशंसा ठंडे बस्ते में डाल दी गई.’

यह किस्सा सुनाने के पीछे प्रधानमंत्री मोदी का मकसद साफ था. वे बताना चाहते थे कि इंदिरा गांधी भले ही जोखिम भरा फैसला लेने से पीछे हट गई हों, लेकिन उनकी सरकार काले धन के खिलाफ लड़ाई के लिए गंभीर है. इसके लिए वह अलोकप्रिय और कठोर फैसले लेने से नहीं हिचकिचाएगी.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या वाकई प्रधानमंत्री ने जो आरोप लगाए हैं वे क्या सच हैं? क्या सच में इंदिरा गांधी ने 45 साल पहले इस तरह फैसला लेने से इंकार कर दिया था? और अगर किया भी था तो किन परिस्थितियों में उन्होंने ऐसा किया?

इन सवालों के जवाब के लिए सबसे पहले तो माधव गोडबोले की किताब पर गौर करना जरूरी है जिसके संदर्भ लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने इस तरह का आरोप लगाया है. इसके साथ ही उस दौर के घटनाक्रम पर नजर डालनी होगी.

किताब में आखिर लिखा क्या है?

गोडबोले की किताब में एक अध्याय है, जिसका शीर्षक है, ‘माइ इयर्स विद वाईबी चव्हाण.’ इसी अध्याय में गोडबोले ने वांछू समिति की अंतरिम रिपोर्ट का जिक्र किया है जिसमें बड़े नोटों को बंद करने की सिफारिश की गई थी. चव्हाण इस सिफारिश पर राय लेने के लिए इंदिरा गांधी के पास भी गए थे, जहां उन्हें झिड़की मिली थी. इससे गोडबोले ने यह निष्कर्ष निकाल लिया है कि उस वक्त इंदिरा गांधी के ध्यान में पूरी तरह चुनावी राजनीति ही थी जिसके चलते उन्होंने नोटबंदी का सुझाव खारिज कर दिया था.

यानी किताब के हवाले से प्रधानमंत्री मोदी ने जो बात कही है कि वह यहां तक पूरी तरह सही नजर आती है. तो फिर गफलत कहां हुई? दरअसल, किताब में ही आश्चर्यजनक रूप से गोडबोले ने उस वक्त के हालात का कोई जिक्र नहीं किया है. जबकि देश पर तब युद्ध का खतरा मंडरा रहा था. पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था. लेकिन इस स्थिति का किताब में कोई जिक्र करने के बजाय गोडबोले ने इस फैसले का ठीकरा इंदिरा गांधी की समाजवादी नीतियों और बैंकों के राष्ट्रीयकरण की उनकी योजना पर फोड़ा है. गोडबोले का मानना है कि राष्ट्रीयकरण को सफल बनाने की धुन में इंदिरा गांधी ने उस वक्त की बाकी सभी जरूरतों को किनारे रख दिया था.

एकबारगी मान भी लेते हैं कि नोटबंदी 1971 के समय की जरूरत थी. तो पूर्व गृह सचिव की हैसियत से गोडबोले को यह बताना चाहिए था कि यह जरूरत किन परिस्थितियों में पैदा हुई थी. लेकिन उन्होंने पूरे पहलुओं की पड़ताल किए बिना सिर्फ एक अधूरा सा किस्सा बताकर पाठकों पर ही पूरा दारोमदार छोड़ दिया कि वे अपने हिसाब से अंदाजा लगाते रहें.

1970-72 के दौर में आर्थिक परिस्थितियां कैसी थीं?

दस्तावेज बताते हैं कि 1971 के युद्ध ने पाकिस्तान की साख पर बुरी तरह चोट की थी लेकिन इसके साथ ही भारत को भी आर्थिक रूप से कई साल पीछे धकेल दिया था. दिसंबर 1971 में 13 दिन तक चले इस युद्ध के बीज उसी साल मार्च में ही पड़ गए थे. उस दौर में करीब एक करोड़ शरणार्थी बांग्लादेश से भारत आ चुके थे. मानवता के आधार भारत सरकार उनकी सुरक्षा और उनकी मूलभूत जरूरतें पूरी करने के लिए बाध्य थी. इस सबका नतीजा यह हुआ कि युद्ध के बाद देश की जनता पर करों का बोझ बढ़ा और आर्थिक रूप से तंगी के हालात पैदा हो गए.

तमाम अनुमान बताते हैं कि मार्च 1972 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष के दौरान बांग्लादेश से आए शरणार्थियों की देखभाल में भारत सरकार को करीब 80 करोड़ डॉलर (आज की मुद्रा में लगभग 54.39 अरब रुपए) का बोझ उठाना पड़ा था. जाहिर तौर पर इससे देश के विकास कार्यों पर विपरीत असर पड़ रहा था. द हिंदू की एक रिपोर्ट बताती है, ‘चीन के साथ युद्ध के वक्त 1962-63 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर सिर्फ दो फीसदी थी. लेकिन 1965-66 के वक्त जब पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ तो यह घटकर -3.7 फीसद तक चली गई. इसके बाद फिर 1971-72 पाकिस्तान के साथ ही अगले युद्ध के समय आर्थिक विकास दर 0.09 प्रतिशत रह गई.’ यानी ये तीनों ही साल आर्थिक वृद्धि दर में आई भारी कमी वाले थे और इस दौर में देश की अर्थव्यवस्था को जो आघात लगा, उसे उबरने में कई साल लग गए.

मतलब यह कहना गलत नहीं होगा कि 1961-72 की स्थिति में कोई भी प्रधानमंत्री शायद ही अर्थव्यवस्था को हिला देने वाला नोटबंदी जैसा फैसला लेने की हिम्मत जुटा पाता. इसके अलावा यह भी एक तथ्य है कि 1969 में 14 और फिर 1970 में छह वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद इंदिरा गांधी पर दबाव भी था कि वे इसके नतीजे सामने लाकर दिखाएं.

1971 में बड़े नोट आखिर कितनी तादाद में थे?

भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि दशकीय औसत के आधार पर 1970 के दशक से 1990 के दशक तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और मुद्रा का अनुपात 10.5 फीसदी पर स्थिर था. इन तीन दशकों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में 100 के नोटों की संख्या करीब 50 प्रतिशत थी. मसलन 1971 में ही 100 के नोटों का प्रतिशत 49.6 था, जबकि 1,000 के नोट महज एक फीसदी थे. मगर 2010-11 तक 500 और 100 के नोटों का चलन बढ़ा और मुद्रा के प्रसार में 100 के नोटों की भागीदारी 14.8 प्रतिशत रह गई. इसी तरह 1970-71 के दशक में 10 के नोट की हिस्सेदारी 34.3 फीसदी तक हुआ करती थी लेकिन 2010-11 तक यह घटकर सिर्फ 2.2 फीसद रह गई.

जस्टिस वांछू कौन थे और उनकी अध्यक्षता वाली समिति का एजेंडा क्या था?

कर सुधारों को लेकर 1970-80 के दशक में कई किताबें लिखी गईं. बहुत से सरकारी दस्तावेज भी हैं. उन सब पर बारीकी से गौर करने के बाद कई दिलचस्प जानकारियां सामने आती हैं. इनके मुताबिक, 1967 में देश के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद जस्टिस केएन वांछू को मार्च 1970 में प्रत्यक्ष कर जांच समिति का अध्यक्ष बनाया गया. इस समिति ने दिसंबर 1970 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट पेश की और दिसंबर 1971 में अंतिम रिपोर्ट दी. समिति का मुख्य काम था, ऐसे सुझाव देना जिससे देश में कालेधन का प्रसार रोका जा सके. साथ ही, दबा-छिपा काला धन बाहर आ सके और कर संग्रह बढ़े, उसके लिए ठोस तरीके सुझाना.

जस्टिस वांछू ने काले धन के बारे में अपनी राय रखने में कहीं कोई काट-छांट भी नहीं की. उनकी समिति की ओर से दिए गए अनुमान के मुताबिक 1968-69 में देश में करीब 1,400 करोड़ रुपए का काला धन था. समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘देश की अर्थव्यवस्था में काला धन बढ़ते हुए कैंसर की तरह है. इस पर समय रहते अगर लगाम नहीं लगाई गई तो यह देश की अर्थव्यवस्था को बरबादी के रास्ते पर ले जाएगा.’ इस समिति ने बहुत ठोस सुझाव (काले धन की रोकथाम के लिए) दिए थे, जिन पर मौजूदा मोदी सरकार भी अमल कर सकती है :

1. राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को नियमित किया जाए : समिति ने पाया था कि काले धन के ज्यादातर बड़े मामले राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे से जुड़ते हैं लिहाजा, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर नजर रखी जानी चाहिए. उसका नियमितीकरण होना चाहिए. समिति इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखती थी कि राजनीतिक दलों को बड़े-बडे कारोबारी घरानों से वित्तीय मदद मिले. इसके बजाय उसकी सिफारिश थी कि सरकार राजनीतिक दलों को वित्तीय मदद मुहैया कराए. एक अन्य सिफारिश यह भी थी कि पार्टियों का सालाना ऑडिट होना चाहिए और उन्हें अपने खातों के बारे में हर साल जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए.

2. स्वैच्छिक आय घोषणा योजना : वांछू समिति ने स्वैच्छिक आय घोषणा योजना (वीडीएस) के प्रति अपनी विशेष असहमति जाहिर की थी. समिति के सदस्यों को लगता था कि इस तरह की योजना से काले धन को बाहर निकालने का असल मकसद ही विफल हो जाएगा. इसके बजाय काला धन छिपाकर रखने वालों को उसे सफेद करने का एक जरिया मिल जाएगा. समिति की इस आपत्ति के बावजूद इंदिरा गांधी सरकार ने 1974 में वीडीएस की घोषणा की थी. इससे करीब 746 करोड़ रुपए हासिल भी किए. हालांकि वह आपातकाल का दौर था, लिहाजा, उस वक्त सरकार के डर से भी लोगों ने काले धन को बाहर निकालने के लिए इस योजना का लाभ उठाया. लेकिन इसके बाद की सरकारें (जिनमें कांग्रेस की सरकारें भी शामिल हैं) इसका लाभ लेने में नाकाम रहीं.

3. कर की दरें कम करना : समिति ने उस वक्त आयकर की दर को 95 फीसदी से घटाकर 75 प्रतिशत करने का सुझाव दिया था. मध्य और निम्न वर्गीय करदाताओं के लिए समिति ने इन दरों को और नीचे लाने का भी मशविरा दिया था.

4. बचाव के रास्ते बंद करना : आजाद भारत में एक संवेदनशील राजनीतिक मसले को भी समिति ने छेड़ा. समिति को महसूस हुआ कि हिंदू अविभाजित परिवार करों के दायरे से बच निकलने का बड़ा जरिया बन रहे हैं. लिहाजा, इस तरह के बचाव के रास्तों को बंद करने के लिए समिति ने कई अहम सुझाव दिए थे.

5. कृषि आय पर कर : समिति के मुताबिक, केंद्र सरकार को कृषि से होने वाली आमदनी को भी अन्य आय की तरह मानना चाहिए. इस पर कर लगाया जाना चाहिए. भले ही इसके लिए संविधान में संशोधन ही क्यों न करना पड़े.

इस रिपोर्ट और इसके सुझावों पर हुई चर्चा को आज करीब पांच दशक बीत चुके हैं. इतने अंतराल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने फिर नोटबंदी के फैसले के जरिए इसे छेड़ दिया है. हालांकि आठ नवंबर को इस फैसले की घोषणा के बाद से भाजपा लगातार दबाव में है. सिर्फ विपक्ष ही नहीं बल्कि उसके अपने सदस्यों ने भी पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. लोगों को हो रही परेशानी की खबरों ने भी पार्टी पर दबाव बढ़ाया है.

बहरहाल, यह सच है कि जस्टिस वांछू ने यकीनन नोटबंदी की सिफारिश की थी. लेकिन 1970-71 के उस दौर में जब गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता चरम पर थी तो किसी भी प्रधानमंत्री के लिए भी इस तरह का कोई फैसला लेना बेहद मुश्किल था.

(यह आलेख मूल रूप से बूमलाइव.इन पर प्रकाशित हुआ है)