भारत की क्रेडिट रेटिंग सुधारने के लिए अमेरिका स्थित चर्चित संस्था मूडीज के साथ मोदी सरकार की कोशिश विफल रही है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक मूडीज ने भारत पर चढ़े कर्ज के बोझ और उसकी खस्ताहाल बैंकिंग व्यवस्था के आधार पर अपनी रेटिंग में कोई भी बदलाव करने से इंकार कर दिया है.

भारत की क्रेडिट रेटिंग में बढ़ोतरी न केवल विदेशी निवेश आकर्षित करने और आर्थिक विकास में तेजी लाने, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक प्रबंधन को सफल साबित करने के लिए जरूरी मानी जा रही है. सितंबर में मूडीज ने भारत की क्रेडिट रेटिंग ‘बीएए-3’ कर दी थी. बीएए-3 सबसे निचले पायदान से एक कम दर्जे की रेटिंग है. हालांकि, एजेंसी ने आर्थिक सुधारों के लागू होने के साथ इसमें सुधार का भरोसा जरूर दिलाया था.

वित्त मंत्रालय ने अक्टूबर में मूडीज को पत्र लिखकर उसकी रेटिंग पद्धति पर सवाल उठाया था. उसने आरोप लगाया था कि रेटिंग करते समय हाल के वर्षों में भारत के कर्ज में आई तेज गिरावट, उसके आर्थिक विकास के स्तर और वित्तीय मजबूती जैसे पक्षों को नजरअंदाज किया गया. हालांकि, इन आरोपों को खारिज करते हुए मूडीज ने कहा कि भारत में कर्ज की स्थिति उतनी खुशनुमा नहीं है जितनी सरकार दावा कर रही है. इसके अलावा बैंकों पर बुरे कर्ज की हालत भी चिंताजनक है.

रॉयटर्स के मुताबिक बीते दो वर्षों के दौरान भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यस्था है लेकिन, इसके बावजूद इसके राजस्व आधार में विस्तार नहीं आया है. भारत का राजस्व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 21 फीसदी है जो मूडीज से ‘बीएए’ रेटिंग पाने वाले देशों के 27.1 फीसदी राजस्व के आंकड़े से काफी कम है. हालांकि जीडीपी की तुलना में कर्ज का अनुपात 2004-05 के 79.5 फीसदी की तुलना में घटकर 66.7 फीसदी हो गया है, लेकिन अभी भी कुल राजस्व का 20 फीसदी हिस्सा इस कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपने भारी-भरकम कर्ज की लागत और बैंकों पर 136 अरब डॉलर के बुरे कर्ज को लेकर मूडीज की चिंताओं को दूर करने में असफल रहा है.

2014 में सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निवेश को बढ़ाने, मुद्रास्फीति घटाने और वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए कई कोशिशें की हैं. लेकिन मूडीज सहित दुनिया की तीनों बड़ी रेटिंग एजेंसियों ने भारत को लेकर अपनी रेटिंग में सुधार नहीं किया है. उनका कहना है कि अभी और कसर बाकी है.