नजीब जंग बार-बार बिस्मिल की ये पंक्तियां दोहराते थे - वक़्त आने दे बता देंगे तुझे, ए आसमां, हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है. उनका इस्तीफा भी बताता बहुत कम और छिपाता बहुत ज्यादा है.

केंद्र की मोदी सरकार, दिल्ली की केजरीवाल सरकार और जंग का राज निवास सभी दिखा रहे हैं कि जो हुआ वह अचानक हुआ. कि एक दिन अचानक नजीब जंग ने कुर्सी छोड़कर अध्ययन-अध्यापन करने का मन बना लिया. लेकिन जंग को जानने वाले कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों से एलजी साहब काफी परेशान थे.

केंद्र सरकार के एक विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि बीते मंगलवार को गृह सचिव राजीव महर्षि उपराज्यपाल नजीब जंग से मिले थे. सुनी-सुनाई है कि इस मुलाकात के दौरान गृह सचिव ने नजीब जंग को एक परामर्श दिया - अब उन्हें दिल्ली की बागडोर के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए. गृह मंत्रालय जब भी किसी उपराज्यपाल या राज्यपाल से इस्तीफा चाहता है तो उसकी जिम्मेदारी गृह सचिव को ही सौंपी जाती है. नजीब जंग से भी गृह सचिव की पिछली मुलाकात इसी सिलसिले में थी. गृह सचिव ने इशारों-इशारों में उपराज्यपाल को यह कह दिया कि अब केंद्र सरकार उनकी विदाई चाहती है. लेकिन सरकार ने यह नहीं सोचा था कि नजीब जंग का इस्तीफा अड़तालीस घंटे के अंदर ही आ जाएगा.

गृह मंत्रालय की तरफ से उन्हें सोचने के लिए कहा गया था, लेकिन नजीब जंग ने सिर्फ एक दिन सोचा और दूसरे दिन अपना फैसला एक चिट्ठी में बंदकर एक विशेष संदेशवाहक के जरिए मंत्रालय को भिजवा दिया. सुनी-सुनाई ही है कि नजीब जंग ने अपने इस्तीफे की बात सिर्फ अपने परिवार और कुछ विश्वस्त अफसर और मित्रों को ही बताई थी. इसलिए जब तक उन्होंने नहीं चाहा इस पर किसी भी तरह की चर्चा एकदम नहीं हुई. इससे पहले कि अटकलों का बाज़ार गर्म होता, खुद नजीब जंग ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने इस्तीफे को सार्वजनिक कर दिया. इस्तीफे का खत गृह सचिव को पहुंच पाता उससे पहले ही मीडिया के पास पहुंच गया.

नजीब जंग ने इतना बड़ा फैसला करने में भले ही अड़तालीस घंटे में लिया हो लेकिन उन्होंने इस पर सोचा कम से कम सौ बार होगा. सो इस बात की संभावना बहुत ही कम है कि वे अपना इस्तीफा अब वापस लेंगे. दिल्ली में हंगामा होगा, देश में राजनीति होगी, लेकिन नजीब जंग 25 दिसंबर से नए साल की छुट्टी मनाने गोवा के लिए निकल जाएंगे. नजीब जंग ने अपनी चिट्ठी में और बातचीत में मुख्यमंत्री से लेकर कुछ पत्रकारों को यही बताया कि उनके इस्तीफे की वजह निजी है. वे अब एक किताब लिखना चाहते हैं, फिर थियेटर की दुनिया में लौटना चाहते हैं. शेरो-शायरी करना चाहते हैं. यूनिवर्सिटी में बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं.

केंद्र सरकार को थियेटर के एक्टर नजीब जंग से दिक्कत नहीं होगी, लेकिन इस्तीफे के बाद वह एक बात से जरूर परेशान है अगर नजीब जंग ने किताब में विस्फोटक खुलासे किए तो बैठे-बिठाए अरविंद केजरीवाल को एक हथियार मिल जाएगा. सुनी-सुनाई यह भी है कि नजीब जंग की यह किताब केंद्र सरकार के इसी कार्यकाल में आ सकती है. मतलब नजीब जंग खुद मुसीबत न भी खड़ी करें, लेकिन उनकी किताब जरूर परेशानी का सबब बन सकती है.

अब सवाल यह उठता है कि केंद्र सरकार की तरफ से अकेले ही अरविंद केजरीवाल से मोर्चा लेने वाले नजीब जंग को गृह मंत्रालय ने टाटा कहने का मन क्यों बनाया?

इस बड़े सवाल का एक शब्द में छोटा सा जवाब है. भरोसा. सुनी-सुनाई है कि भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह का भरोसा नजीब जंग पर से उठता जा रहा था. अमित शाह के करीबी नेता के मुताबिक कई बार ऐसे मौके आए जब अमित शाह ने यह शिकायत की कि उन्हें लगता है नजीब जंग अब भी कांग्रेस के एक बड़े मुस्लिम नेता से मिले हुए हैं. कांग्रेस के इन बड़े नेता को सोनिया गांधी का सबसे करीबी माना जाता है और ये भी अमित शाह की तरह गुजरात से ही आते हैं.

बताया जाता है कि अमित शाह को कई बार उनकी ही पार्टी के नेताओं ने कहा कि जब तक दिल्ली में नजीब जंग का राज रहेगा कमल की जड़ें नहीं जम पाएंगीं. हद तो तब हो गई जब दिल्ली भाजपा के कुछ नेताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व को यह कहना शुरू कर दिया कि नज़ीब जंग और अरविंद केजरीवाल का झगड़ा ऊपर से सिर्फ मैच फिक्सिंग है, अंदर से तो ये दोनों मिले हुए हैं. सुनी-सुनाई है कि अमित शाह ने इन बातों की अपने स्तर पर जांच भी करवाई और बात गृह मंत्रालय तक पहुंचाई गई कि नजीब जंग पर अब भरोसा करना पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है. इसी के बाद से नजीब जंग की कुर्सी डगमगाने लगी थी.

अगर नजीब जंग चाहते तो उन्हें किसी छोटे राज्य का गवर्नर बनाया जा सकता था, केंद्र सरकार उन्हें हटाने की जगह उनके तबादले को ज्यादा आसान विकल्प समझती थी. लेकिन नजीब जंग ने जो किया और जितनी जल्दी किया उससे नेताओं और अफसरों की हवा उड़ गई. लगता है नेताओं के साथ उठते-बैठते-लड़ते-झगड़ते नजीब ने सच में जंग करना सीख लिया. अब उन्हें बिस्मिल की दो पंक्तियां और याद रखनी चाहिए - सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है. देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है?