निर्भया की मौत को चार साल पूरे हो चुके हैं. 15 दिसंबर 2012 को दिल्ली के मुनीरका में सामूहिक बलात्कार के बाद गंभीर रूप से घायल हुई निर्भया ने दो हफ्ते तक बहादुरी से जूझने के बाद 29 दिसंबर को दम तोड़ दिया था. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया. संयोग देखिए कि इसी 15 दिसंबर को दिल्ली से फिर एक बलात्कार की खबर आई जिसने एक बार यह साबित किया कि पुलिस पूरी क्षमता के साथ गश्त (पेट्रोलिंग) नहीं कर रही है.

दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसके पास ड्राइवरों और अन्य स्टाफ की काफी कमी है. इससे गश्ती दल अपनी क्षमता के दो-तिहाई के बराबर भी गश्त नहीं कर पाता. यही नहीं, महिला जवानों की भी कमी है. यानी गश्त के लिए जाने वाले हर वाहन (खास तौर पर आपात प्रतिक्रिया वाहन) में महिला सिपाहियों की तैनाती भी नहीं हो पाती जबकि बलात्कार जैसे मामलों की सूचना मिलने के बाद मौके पर जाते समय पुलिस दल के साथ महिला सिपाही होनी ही चाहिए.

ऐसा नहीं है कि समस्या के बारे में शीर्ष स्तर पर किसी को पता न हो. दिल्ली पुलिस का नियंत्रण केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास है. उससे कई बार अनुरोध किया जा चुका है कि स्टाफ की कमी को जितनी जल्दी हो सके, पूरा किया जाए. लेकिन स्थिति जस की तस है. यही नहीं, दिल्ली उच्च न्यायालय भी पिछले हफ्ते मंत्रालय की खिंचाई कर चुका है कि वह दिल्ली पुलिस के लिए फंड जारी करने में कंजूसी बरत रहा है. इससे पूरे शहर में पुलिस जरूरी संख्या में जवानों की तैनाती नहीं कर पा रही है. लेकिन इस फटकार का मंत्रालय पर कुछ ज्यादा असर हुआ हो, ऐसा लगता नहीं है.

पेट्रोल वैन हैं, लेकिन ड्राइवर नहीं

अभी पिछले हफ्ते की ही घटना है. अपनी निजी कार को टैक्सी के तौर पर चलाने वाले एक ड्राइवर ने 19 साल की एक लड़की को पहले अपनी गाड़ी में लिफ्ट दी. फिर वह उसे दक्षिणी दिल्ली के मोती बाग इलाके में एक सुनसान जगह पर ले गया और उसके साथ बलात्कार किया. पीड़ित किसी तरह जान बचाकर वहां से भागी. थोड़ी देर बाद ईआरवी (इमरजेंसी रिस्पॉन्स व्हीकल या आपातकालीन प्रतिक्रिया वाहन) में मौजूद पुलिस दल ने उसे देख लिया. महिला के बयान के आधार पर छह घंटे बाद बलात्कार के आरोपित को भी पकड़ लिया गया.

इस घटना से एक बार फिर यह बात सामने आई कि जिस जगह पीड़ित के साथ यह घटना हुई उस इलाके या उसके आस-पास पुलिस का कोई गश्ती वाहन गश्त नहीं कर रहा था. द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक पीड़ित को ही एक घंटे तक पुलिस का कोई वाहन नजर नहीं आया. इस बारे में पुलिस की संचालन शाखा से जुड़े एक अधिकारी बताते हैं, ‘2012 में 16 दिसंबर को हुई सामूहिक बलात्कार (निर्भया कांड) की घटना के बाद पेट्रोलिंग के लिए 370 वाहन मंजूर किए गए थे. लेकिन इन्हें चलाने के लिए ड्राइवर ही नहीं हैं.’

इन नए वाहनों के शामिल होने के साथ पुलिस बल के पास वाहनों की कुल संख्या बढ़कर 1,000 के आसपास पहुंच चुकी है. इनमें वे वाहन शामिल नहीं हैं, जो रखरखाव या सुधार कार्यों के लिए खड़े हैं या फिर लगभग 820 वे वाहन जो कबाड़ होने की स्थिति में आ चुके हैं. यानी सिर्फ सड़क पर दौड़ने के लिए फिट 1,000 वाहनों को गश्त के लिहाज से 24 घंटे चलाने के लिए पुलिस को लगभग 3,400 ड्राइवरों की जरूरत है. लेकिन उसके पास यह अमला सिर्फ 2,200 की संख्या में ही है. संचालन इकाई के एक अधिकारी बताते हैं, ‘पिछले साल हमने पुलिस मुख्यालय से 500 जवान उधार लिए थे. ताकि ड्राइवर के तौर पर उनकी सेवाएं ले सकें.’ वे आगे बताते हैं, ‘हमने गृह मंत्रालय को भी लिखा है. जवानों की भर्ती के लिए निर्धारित मापदंडों में परिवर्तन का भी प्रस्ताव दिया है. इसके तहत भर्ती के लिए ड्राइविंग लाइसेंस होना अनिवार्य किया जा सकता है. इससे काफी हद तक समस्या का समाधान हो सकता है.’

गिनती की महिला सिपाही

कमी सिर्फ ड्राइवरों की ही नहीं, महिला सिपाहियों की भी है. पुलिस के आपातकालीन 100 नंबर पर जैसे ही किसी घटना-दुर्घटना की सूचना आती है, सबसे पहले गश्ती वाहन ही मौके पर पहुंचता है. ऐसे में हर वाहन में कम से कम एक महिला सिपाही का होना आवश्यक है. खासतौर पर अगर घटना दुष्कर्म या महिलाओं के शारीरिक शोषण से संबंधित हो, तब तो यह और जरूरी हो जाता है क्योंकि महिला सिपाही से अपनी तकलीफ बताने में महिलाओं को स्वाभाविक रूप से आसानी हो जाती है. इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि 2014 तक पुलिस के गश्ती नेटवर्क के साथ सिर्फ 43 महिला अफसरों की ही तैनाती हुई थी. कुछ और महिला सिपाही/अफसरों की तैनाती के बाद फिलहाल यह आंकड़ा 240 के करीब है.

नाम न छापने की शर्त पर एक अन्य पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘सड़क दुर्घटना के ही मामलों की बात करें तो महिला पीड़ितों के लिए महिला पुलिस ही ज्यादा मददगार होती है. और आजकल तो पुलिस नियंत्रण कक्ष (पुलिस कंट्रोल रूम-पीसीआर) के पास ही सड़क दुर्घटनाओं से संबंधित ज्यादा सूचनाएं आ रही हैं, बजाय कैट्स (सेंट्रलाइज्ड एक्सीडेंट एंड ट्रॉमा सर्विस) के.’ जानकारी के मुताबिक, पिछले दो साल में तो कई महिलाओं ने अपने बच्चों तक को पुलिस के गश्ती वाहन में जन्म दिया है. इसके बावजूद महिला सिपाहियों की कमी अब तक पूरी नहीं की जा सकी है. आज की तारीख में 850 गश्ती वाहनों में 60 में ही एक बार और एक शिफ्ट में एक ही महिला की तैनाती हो पाती है.

पुलिस कर्मचारियों की भर्ती को भी मंजूरी नहीं

यहां तक पुलिस कंट्रोल रूम भी स्टाफ की कमी से जूझ रहा है. एक अधिकारी बताते हैं, ‘हमने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पीसीआर के लिए 5,000 कर्मचारियों की भर्ती करने का प्रस्ताव भेजा है. लेकि अब तक इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई है. पीसीआर वाहन को अमूमन तीन लोगों की जरूरत होती है. एक - ड्राइवर, दूसरा - सशस्त्र सिपाही और तीसरा - प्रभारी अधिकारी. इस हिसाब से 850 वाहनों को चार शिफ्ट में (आरक्षित शिफ्ट मिलाकर) चलाने के लिए करीब 10,200 लोगों की जरूरत है जबकि पीसीआर इकाई में जवानों की कुल संख्या ही इस वक्त करीब 7,800 है. इनमें से भी लगभग 400 लोग 24 घंटों सातों दिन चलने वाले कंट्रोल रूम में तैनात होते हैं.

अधिकारियों के मुताबिक स्टाफ की कमी से पुलिस की हर इकाई को दिक्कत उठानी पड़ रही है. एक अधिकारी बताते हैं, 'हमें अक्सर गश्ती वाहनों पर दो लोगों की तैनाती से ही काम चलाना पड़ता है. काम चलता रहे इसलिए हमें दूसरी इकाइयों से भी समय-समय पर स्टाफ को यहां से वहां करना पड़ता है.’