वेतन भुगतान कानून में संशोधन के लिए मोदी सरकार ने अध्यादेश का रास्ता चुना है. इसके अमल में आने के बाद कई नियोक्ताओं के लिए अपने स्टाफ को वेतन का भुगतान चेक या इलेक्ट्रॉनिक तरीके से करना जरूरी हो जाएगा. अध्यादेश में कहा गया है कि यह नई प्रक्रिया डिजिटल और कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था के उद्देश्य को पूरा करती है.

अध्यादेश क्या है?

इस अध्यादेश के जरिये वेतन भुगतान कानून की धारा छह में संशोधन किया गया है. 1936 में अस्तित्व में आए इस कानून में वेतन का भुगतान सिक्के और नोटों या दोनों में करने का प्रावधान किया गया था. 1975 में इसमें चेक, बैंक ड्राफ्ट या बैंक खाते के जरिये भुगतान करने का प्रावधान जोड़ा गया. अब नए अध्यादेश के बाद केंद्र और राज्य सरकारें एक अधिसूचना जारी कर कुछ तय प्रतिष्ठानों का चयन कर सकेंगी जिन्हें अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान चेक या उनके बैंक खाते के जरिये ही करना होगा. इनमें सरकारी और निजी, दोनों प्रतिष्ठान शामिल हैं.

श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने वेतन भुगतान (संशोधन) विधेयक, 2016 लोकसभा में 15 दिसंबर को पेश किया था. लेकिन नोटबंदी के कारण हंगामे के कारण इसे पारित नहीं कराया जा सका. इसके बाद कानून में संशोधन के लिये अध्यादेश की राह चलने का फैसला किया गया. पिछले बुधवार को कैबिनेट ने इस अध्यादेश को मंजूरी दी थी. शुक्रवार को राष्ट्रपति ने भी इस पर हस्ताक्षर कर दिए.

सरकार ने मूल कानून में संशोधन क्यों किया है?

सरकार का मानना है कि समय के साथ तकनीक में बदलाव आया है. उसके मुताबिक अब भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे डिजिटल होने की तरफ बढ़ रही है और बैंक खाता रखने वाले कामगारों को उसी के जरिये वेतन दिया जाना चाहिए. इससे भी अहम यह है कि यह बदलाव फिलहाल जारी केंद्र सरकार की कैशलेस इकनॉमी की मुहिम पर जोर देने के लिए किया गया है. केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के मुताबिक डिजिटल पेंमेंट होने के बाद न्यूनतम मजदूरी भुगतान से जुड़ी शिकायतों में कमी आएगी. उसका यह भी मानना है कि इसके बाद कंपनियां भविष्य निधि या बीमा से संबंधित योजनाओं में कर्मचारियों को शामिल होने से रोकने के लिए कामगारों की संख्या कम करके नहीं बता पाएंगी.

क्या यह आरोप सही है कि सरकार कर्मचारियों को केवल चेक या बैंक खातों के जरिए वेतन का भुगतान अनिवार्य बनाने के लिए अध्यादेश लाई है?

केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने मीडिया में आ रही खबरों को नकारते हुए साफ किया है कि प्रस्तावित संशोधन में चैक या खाते के जरिए वेतन दिए जाने के अलावा सिक्कों या करेंसी नोटों में भी भुगतान का प्रावधान होगा. यानी कामगारों को नकदी के जरिए भुगतान किए जाने की सुविधा अभी भी उपलब्ध है. केंद्र या राज्य सरकारें अलग-अलग प्रतिष्ठानों को चुनेंगी और उनके नियोक्ता अपने कर्मचारियों को वेतन केवल चेक के जरिये या उनके बैंक खाते में ही देंगे.

अध्यादेश क्या होता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार देता है. हालांकि यह तभी जारी किया जा सकता है, जब संसद का सत्र न चल रहा हो. कैबिनेट की अनुशंसा के बाद राष्ट्रपति कोई अध्यादेश तभी जारी कर सकते हैं जब उन्हें लगे कि मौजूदा परिस्थितियां ऐसी हैं कि इसे तत्काल लाना जरुरी है. अध्यादेश संसद द्वारा बनाए गए कानून के ही समान होते हैं.

अध्यादेश की अवधि छह माह तक की होती है. इस दौरान इसे संसद से पारित करवाना जरूरी होता है. अध्यादेश जारी करने के बाद पड़ने वाले सत्र के शुरू होने के छह हफ्ते के भीतर अध्यादेश को सदन में पेश करना होता है. दोनों सदनों से पारित होने के बाद यह कानून बन जाता है. नहीं तो खुद ही खत्म हो जाता है. हालांकि खत्म होने के बाद भी इसके तहत किए गए काम वैध होते हैं.