शंभू राणा युवा साहित्यकार हैं और अल्मोड़ा में रहते हैं.


ये दो छोटी-छोटी घटनाएं तब की हैं, जब मैं पांचवीं कक्षा में था. तकरीबन 34-35 साल पहले की बात है. हम दोनों बाप-बेटे किराए के जिस कमरे में रह रहे थे उसी के पास मेरा स्कूल भी था. लगभग पड़ोस में ही. कमरे से स्कूल का रास्ता यही कोई दो-तीन मिनट का था. अक्सर ही इंटरवल के दौरान मैं चाय पीने आ जाया करता था. यहां तक कि स्कूल की घंटी की आवाज कमरे से सुनाई देती थी.

हमारी मकान-मालकिन काफी उम्रदराज थीं. अकेली रहती थीं, उनके शौहर गुजर चुके थे, बेटियां ससुराल में और बेटा बीवी-बच्चों समेत दिल्ली में रहता था. वे खुद की देखभाल अच्छे से कर लिया करती थीं. बाकी वक्त-जरूरत के लिए तीन-चार किरायेदार थे ही. मकान मालकिन को कंजूस कहूं या किफायत बरतने वाली कि उनकी नजर बिजली-पानी जैसी हर चीज पर लगी रहती थी. मेरे नहाने पर वह टोकतीं कि रोज मत नहाया कर, ठंड लगेगी, बीमार पड़ेगा. दरअसल उन्हें मेरी कम एक-डेढ़ बाल्टी पानी बह जाने की चिंता ज्यादा थी और उन दिनों अल्मोड़ा शहर में पानी की बड़ी ही किल्लत हुआ करती थी. जलसंस्थान के कर्मचारी तक पानी का रोना रोया करते थे. ऐसे ही मकान-मालकिन का फरमान था कि शाम की अजान से पहले बिजली नहीं जलानी और 60 वाट से ज्यादा का बल्ब नहीं जलाना है.

धोने-रगड़ने से बल्ब तो चमक गया मगर उसका वाट-हाट सब गायब हो गया. मकान मालकिन ने कहा – देखो तो जरा. कितना चालाक है, इसने सब मिटा दिया. अब कैसे पता चलेगा कि कितने वाट का था?

फिर एक इन बिजली का बिल आया तो उन्होंने इसी बहाने फिर वही रोना रोया, ‘पता नहीं यहां कौन-कौन सौ वाट का बल्ब जलाता है. मुझे तो बारीक अक्षर दिखते भी नहीं.’ उस वक्त हमारे ही कमरे के बाहर धूप में बैठी थी. मैंने सोचा अच्छा मौका है अपनी बेगुनाही साबित करने का. मैंने कहा – दादीजी आपको बल्ब दिखाता हूं. हमने तो 60 ही वाट का लगा रखा है. मैंने बल्ब निकाला तो देखा कि उसमें चूल्हे का धुंआ जम गया है. इसकी वजह से वाट वगैरह ठीक से पढ़ने में नहीं आ रहे थे. वहीं पास में पानी की बाल्टी और साबुन रखे थे. मैंने सोचा बल्ब को साफ़ कर लूं ताकि दादी अपनी आंखों से देख लें.

मैंने बल्ब को खूब रगड़कर धो दिया. धोने-रगड़ने से बल्ब तो चमक गया मगर उसका वाट-हाट सब गायब हो गया. मकान मालकिन ने कहा – देखो तो जरा. कितना चालाक है, इसने सब मिटा दिया. अब कैसे पता चलेगा कि कितने वाट का था? मेरे लिए अजीब मुसीबत हो गई. मैं सफाई देता रहा, यकीन दिलाता रहा पर सुने कौन? खुद ही सबूत धो डाला था. अनजाने में अपने ही पक्ष के सबूत को ठिकाने लगा बैठा.

इसी क्रम में दूसरा किस्सा जरा अलग है लेकिन स्टार कास्टिंग पुरानी वाली ही है यानी मकान मालकिन और मैं. मैं पांचवीं क्लास में पढ़ता था. उस दिन हमारा स्कूल में आखिरी दिन था. बोर्ड के इम्तिहानों की तारीख तय हो गई थी. कोर्स पूरा हो गया था. उस दिन हमारी क्लास की विदाई थी. हम खुश थे कि आज पढ़ाई नहीं हो रही है. हमें आपस में बातचीत और चुहल करने से कोई रोक नहीं रहा और टीचरजी लोगों के चेहरे और दिनों की तरह सख्त नहीं हैं.

मकान-मालकिन ने पूछा चिट्ठी कहां है? मैंने जवाब दिया डाल तो दी लैटर बॉक्स में! इस पर उन्होंने मुझे कान फूटने और अकल पर पत्थर पड़ने जैसी दर्जनभर दुआएं दी और कहा कि चिट्ठी डालनी नहीं, पढ़नी थी

कुछ देर बाद हम सभी बच्चों को कागज की प्लेटों में एकाध लड्डू और थोड़ी सी नमकीन मिली और टीचरजी लोगों ने चाय पी. फिर एक टीचर ने कहा – ‘हां तो रे बच्चों, घर में खूब मन लगाकर पढ़ना. बोर्ड का इम्तिहान कोई मजाक नहीं होता है. कॉपी एसडीआई लोग जांचते हैं. हमारे हाथ में कुछ नहीं होता. फेल हो जाओगे तो यहीं रह जाओगे. वगैरह-वगैरह. हां तो ठीक है जाओ, सब लोग अपनी प्लेट भी उठा लो.’ सब बच्चे बाहर को भागे पर मुझे रोक लिया कि पहले चाय के खाली गिलास दुकानदार को देकर बाकी पैसे वापस कर जाऊं. फिर अपना बस्ता ले जाऊं. चाय की दुकानें उसी तरफ थीं जिधर मैं रहता था.

खाली गिलास लिए जब मैं अपने डेरे के पास से गुजर रहा था तो रास्ते ऊपर खेत में मकान मालकिन खड़ी नजर आईं. उन्होंने रोककर एक अंतर्देशीय पत्र मुझे पकड़ाया और इससे पहले वे कुछ कहतीं मैं तेजी से आगे बढ़ गया. शायद वे समझीं कि मैं चाय की दूकान के सामने से यूटर्न होकर उन्हीं के पास आ रहा हूं. गेट के अंदर जाने का रास्ता वहीं से था. मैं बाकी पैसे लेकर फिर स्कूल की तरफ भागा. उन्होंने मुझे टोका – कहां जा रहा है? मैंने उन्हें बताया कि मेरा बस्ता स्कूल में है, अभी लेकर आता हूं. कुछ देर बाद जब बस्ता लेकर लौटा तो उन्होंने पूछा चिट्ठी कहां है? मैंने जवाब दिया डाल तो दी लैटर बॉक्स में! आपकी चिट्ठी लेकर मैं क्या करूंगा. इस पर उन्होंने मुझे कान फूटने और अकल पर पत्थर पड़ने जैसी दर्जन भर दुआएं दी और कहा कि चिट्ठी डालनी नहीं पढ़नी थी. अभी-अभी पोस्टमैन दे गया था, अब क्या होगा? भला क्या हो सकता था? चिट्ठी फिर से आने के लिए जा चुकी थी.

देखा जाए तो ये गलती इतनी बड़ी नहीं थी कि जिसे तीर का कमान से निकलना कहा जाए. चिट्ठी को अगले रोज फिर आ ही जाना था. मगर गलती तो गलती थी. बगैर, देखे-सुने काम कर बैठा था. ऊपर से मामूली से लगने वाली लतीफेनुमा उपरोक्त दोनों घटनाएं मुझे जीवन भर के लिए सतर्कता का पाठ पढ़ा गईं. आज भी गलतियां होती रहती हैं पर हर संभव कोशिश रहती हैं कि पहले बात को ठीक से समझ लूं. सामने वाले को धैर्यपूर्वक सुन लूं. अब समझता हूं उतावलापन ठीक नहीं होता. धीमी गति में देर सही पर अंधेर नहीं.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)