जब 26 मई, 2014 को केंद्र की सत्ता में नरेंद्र मोदी आए तो उनके मंत्रिमंडल के बारे में उन्हीं की पार्टी में कभी अहम ओहदों पर रहे एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि इस सरकार में प्रतिभा का संकट है. हालांकि, उन्होंने यह बात अनौपचारिक बातचीत में कही थी लेकिन जब सत्ता में आने के छह महीने के अंदर नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल विस्तार किया और कुछ ऐसे चेहरों को सरकार में लेकर आए जिनकी कार्यकुशलता की चर्चा होती थी तो ऐसा लगा कि वाकई मोदी सरकार प्रतिभा संकट का सामना कर रही थी. उस मंत्रिमंडल विस्तार में गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को बतौर रक्षा मंत्री और सुरेश प्रभु को बतौर रेल मंत्री शामिल किया गया था. पर्रिकर से पहले रक्षा मंत्रालय का कामकाज वित्त मंत्रालय के साथ-साथ अरुण जेटली देख रहे थे.

मोदी सरकार के इन तीनों मंत्रियों अरुण जेटली, मनोहर पर्रिकर और सुरेश प्रभु को बेहद कार्यकुशल माना जाता रहा है. लेकिन 2016 में कई ऐसे मौके आए जब इस सरकार के सबसे कार्यकुशल माने जाने वाले ये तीनों मंत्री नाकाम और लाचार नजर आये.

अरुण जेटली

अरुण जेटली और उनके वित्त मंत्रालय की पोल खुली पुराने 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट बंद करने के मामले में. इस निर्णय की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की लेकिन इस घोषणा के बाद जैसे-जैसे समय गुजरा, यह साफ होता चला गया कि न तो वित्त मंत्रालय ने इस निर्णय के परिणामों का ठीक से अध्ययन किया था और न ही इस निर्णय के बाद स्थिति संभालने को लेकर ही उसकी कोई खास तैयारी थी. नोटबंदी के मसले पर इस सरकार को जितनी आलोचना झेलनी पड़ी है, उतना इस सरकार ने किसी और मसले पर नहीं झेली. मोदी सरकार के इस निर्णय का अंतिम नतीजा क्या होगा, इस बारे में तो अभी पक्के तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तय है कि सरकार के नोटबंदी के निर्णय से आम लोगों को इतनी अधिक परेशानी हुई है जितनी हाल के सालों में किसी और निर्णय से नहीं हुई.

वित्त मंत्री जेटली की नाकामी वस्तु एवं सेवा कर को लागू कराने के मामले में भी दिखती है. पहले केंद्र सरकार यह कह रही थी कि किसी भी कीमत पर 1 अप्रैल, 2017 से जीएसटी लागू कर दिया जाएगा. लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा होता नहीं दिख रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर रहे रघुराम राजन को दूसरा कार्यकाल दिए जाने के मामले को भी जेटली ने बतौर वित्त मंत्री ठीक से नहीं संभाला. उन्हीं की पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी राजन पर लगातार हमला करते रहे लेकिन जेटली ने गवर्नर का बचाव नहीं किया और अंततः राजन को बड़ी अजीब सी परिस्थितियों के बीच रिजर्व बैंक से विदा लेनी पड़ी. नोटबंदी के निर्णय और उसके बाद उपजी परिस्थितियों में रिजर्व बैंक की भूमिका को देखते हुए लोगों ने राजन को खूब याद किया. इसके अलावा अरुण जेटली के नेतृत्व में न तो देश की अर्थव्यवस्था की हालत सुधरती दिख रही है और न ही हमारी विकास दर में ही सुधार होता दिख रहा है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रैंकिंग में भी भारत की स्थिति में पहले से कोई सुधार आता नहीं दिख रहा है.

मनोहर पर्रिकर

पर्रिकर रक्षा मंत्री बनने से पहले गोवा के मुख्यमंत्री थे. आम तौर पर केंद्र में मंत्री बनने के लिए मुख्यमंत्री कम ही अपना पद छोड़ते हैं. चलन में तो यह रहा है कि केंद्र में मंत्री पद छोड़कर राज्य में मुख्यमंत्री बनने के लिए नेता लालायित रहते हैं. ऐसे में जब पर्रिकर को मोदी केंद्रीय रक्षा मंत्री बनाकर लाए तो लोगों को यह उम्मीद थी कि उनके आने से न सिर्फ रक्षा मंत्रालय का कामकाज ठीक होगा बल्कि पूरी सरकार की कार्यक्षमता पर भी इसकी सकारात्मक असर पड़ेगा.

2016 का साल ऐसा रहा जिसने पर्रिकर की पोल खोल दी. जब तक वे गोवा में थे, तब तक उनकी जो छवि थी, वह छवि 2016 में बुरी तरह टूटी. कहां पर्रिकर को शांत और कार्यकुशल नेता माना जाता था, और कहां उन्होंने इस साल कई ऐसे बयान दिए जिससे न सिर्फ केंद्र सरकार की किरकिरी हुई बल्कि उनकी अपनी छवि भी खराब हुई. उनका ऐसा सबसे ताजा बयान भारत द्वारा परमाणु हथियारों के पहले नहीं प्रयोग करने की नीति की समीक्षा से संबंधित था. यह बयान उस वक्त आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के साथ शांतिपूर्ण प्रयोग के लिए परमाणु समझौता करने जापान गए थे.

भारत पहला ऐसा देश है जिसे जापान परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत किए बगैर परमाणु तकनीक और यूरेनियम देने को राजी हुआ है. ऐसे समय में आए पर्रिकर के बयान से ऐसा लगा था कि कहीं इस समझौते के लिए कोई मुश्किल नहीं पैदा हो जाए. कुल मिलाकर देखा जाए तो पूरे 2016 में पर्रिकर रक्षा क्षेत्र में किए गए अपने कार्यों के बजाए अपने गलत बयानों की वजह से कहीं अधिक चर्चा में रहे.

सुरेश प्रभु

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सुरेश प्रभु शिव सेना के कोटे से मंत्री थे. 2014 में जब नरेंद्र मोदी उन्हें केंद्र में मंत्री बनाना चाह रहे थे तो शिव सेना ने इसका विरोध किया था. पार्टी के एक नेता बताते हैं कि मोदी सुरेश प्रभु को मंत्री बनाने का मन बना चुके थे. ऐसे में शिव सेना के विरोध के बावजूद अमित शाह ने उन्हें भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता दिलाकर उनके मंत्री बनने का रास्ता तैयार किया. बाद में उन्हें भाजपा राज्यसभा लेकर आ गई. वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में ऊर्जा क्षेत्र में किए गए सुरेश प्रभु के कार्यों को देखकर मोदी और शाह की जोड़ी उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़े अरमानों से और काफी मशक्कत करके लाए थे.

लेकिन सुरेश प्रभु की नाकामी का सिलसिला 2016 में भी नहीं थमा. मंत्री बनने से पहले उन्होंने रेलवे में भारी निवेश को लेकर जो सपने प्रधानमंत्री को दिखाए थे, उन पर अब तक कुछ होता नहीं दिख रहा. रेल बजट खत्म करने को लेकर उन्होंने जिस तरह से वित्त मंत्रालय के समक्ष आत्समर्पण किया, उसे लेकर भी उनकी आलोचना खुद रेलवे के पुराने अधिकारियों और रेलवे कर्मचारी संगठनों के नेताओं ने की. हाल ही में कानपुर के पास एक बड़ी रेल दुर्घटना हुई. इसमें तकरीबन 150 लोगों की जान गई. हाल के सालों की यह सबसे बड़ी रेल दुर्घटना है. कहां तो पहले इससे भी छोटी दुर्घटनाओं पर रेल मंत्री का इस्तीफा हो जाता था लेकिन प्रभु ने इस बार इस्तीफा देने का प्रस्ताव तक नहीं दिया.

प्रभु द्वारा राजधानी और शताब्दी ट्रेनों में शुरू की गई डायनैमिक किराये की योजना भी नाकाम हो गई. इससे रेलवे को फायदा कम और नुकसान अधिक हुआ क्योंकि इससे ट्रेनों में सीटें खाली रह जाने लगीं. अब थक-हारकर इसे वापस लेने की योजना पर काम शुरू हुआ है. सुरेश प्रभु के कार्यकाल में रेलवे का किराया भी कई बार बढ़ा लेकिन उसकी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं. मतलब साफ है कि कार्यकुशल और सक्षम मंत्री की पहचान रखने वाले सुरेश प्रभु 2016 में हर तरह से नाकाम दिखे.