तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के बाद राज्य के सत्ताधारी दल एआईएडीएमके ने नया मुखिया चुन लिया है. गुरुवार को हुई पार्टी की आम परिषद की बैठक में जयललिता की सबसे करीबी शशिकला नटराजन (चिन्नमा) को अंतरिम महासचिव का चुन लिया गया है. बैठक में उनका चुनाव भले ही आम सहमति से हुआ हो लेकिन, इससे पहले पार्टी से निष्कासित राज्यसभा सदस्य शशिकला पुष्पा ने भी ऐलान कर दिया था कि वे महासचिव पद के चुनाव में उतरेंगी. इसके लिए उनके पति लिंगेश्वरन ने बुधवार को पार्टी कार्यालय में जाकर पर्चा दाखिल करने की भी कोशिश की. लेकिन कुछ कार्यकर्ताओं ने उनसे और उनके वकील के साथ मारपीट कर दी. इस बीच, तमिल अभिनेता आनंदराज ने इस स्थिति पर अफसोस जताते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने कहा कि पार्टी और सरकार में लोग जयललिता के नाम का दुरुपयोग करने लगे हैं.

आनंद का इशारा संभवत: प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव पी राम मोहन राव की तरफ था, जो मंगलवार को मीडिया के सामने आए थे. उन्होंने अपने दफ्तर और घर पर मारे गए आयकर विभाग के छापों को ‘संविधान की भावना का खुला उल्लंघन’ करार दिया. साथ ही दुख जताते हुए सवाल किया, ‘जयललिता जीवित होतीं, तो क्या यह छापेमारी हो पाती?’ फिर केंद्र और राज्य की सरकार पर ढेरों आरोप लगाए. उन्होंने पूछा, ‘राज्य सरकार कहां है? मैं राज्य का मुख्य सचिव था और अब भी हूं, क्या केंद्र सरकार की एजेंसियों ने मेरे ठिकानों पर छापा डालने से पहले राज्य सरकार की इजाजत ली थी?’ राव और उनके बेटे विवेक के करीब 15 ठिकानों पर 21 दिसंबर को आयकर विभाग ने छापा मारा था. इस कार्रवाई में करीब पांच किलो सोना और नए नोटों में लगभग 30 लाख रुपए की नकदी जब्त की गई थी. राव इसी कार्रवाई से खफा हैं.

छापे की कार्रवाई के अगले ही दिन 22 दिसंबर को राज्य सरकार ने राव को हटाकर गिरिजा वैद्यनाथन को नया मुख्य सचिव बना दिया. वे इससे पहले अतिरिक्त मुख्य सचिव थीं. उनके पास सतर्कता विभाग का अतिरिक्त प्रभार भी है. लेकिन इन घटनाओं के बीच कई अहम सवाल भी पैदा होते हैं. ये करीब-करीब वही हैं, जो अपना बचाव करते हुए राव ने पूछे हैं. इनका उठना लाजमी भी है. खासतौर पर तब, जबकि किसी राज्य के मुख्य सचिव के दफ्तर पर ताकत के जोर पर (राव ने दावा किया है कि आयकर विभाग की टीम के साथ आए सीआरपीएफ के जवानों ने कार्रवाई के वक्त उन्हें घर में नजरबंद कर रखा था) छापे डाले हों और वहां की सरकार मूक दर्शक बनी रही हो. यही नहीं, बिना किसी एतराज के अगले दिन चुपचाप अधिकारी को ही बदल दिया हो. ऐसे में, यह सवाल भी उतना ही मौजूं है कि क्या तमिलनाडु सरकार इस वक्त केंद्र के दबाव में है?

अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी अपने-अपने राज्यों में प्रधानमंत्री पर दखल का आरोप लगा चुके हैं

तमिलनाडु का यह मामला 2015 के ऐसे ही एक घटनाक्रम से भी जुड़ता है. सालभर पहले दिसंबर में ही सीबीआई ने दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर छापेमारी की थी. उस वक्त, बावजूद इसके कि कार्रवाई भ्रष्टाचार के आरोपों की पृष्ठभूमि में हुई थी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हंगामा खड़ा कर दिया था. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मनोरोगी’ (साइकोपैथ) और ‘कायर’ तक कह डाला था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार विपक्षी दलों (गैर-एनडीए) की सरकारों पर हमले कर रही है. इसी तरह, बल्कि इससे भी आगे जाते हुए, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अभी कुछ दिन पहले केंद्र पर तख्तापलट तक के आरोप लगा दिए थे. दो-तीन दिसंबर को वे 30 घंटे तक कोलकाता स्थित राज्य सचिवालय में डटी रहीं, जब सेना ने नियमित जांच के लिए प्रदेश के सभी टोल नाकों को अपने कब्जे में ले लिया था.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओपीएस की खामोशी उनकी कमजोरी जाहिर करती है

लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) खामोश हैं और उनकी खामोशी से राजनीति के जानकार कई मतलब निकाल रहे हैं. इसका पहला अर्थ तो यही निकाला जा रहा है कि ओपीएस की स्थिति सरकार और पार्टी संगठन में काफी कमजोर है, जिसका उन्हें खुद अहसास भी है. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, ओपीएस ने अब तक मजबूत नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने का भी कोई संकेत नहीं दिया है. इसके उलट उन्होंने अपनी स्थित और ज्यादा कमजोर ही की है. शशिकला नटराजन को पार्टी महासचिव बनाने का प्रस्ताव उन्होंने खुद ही दिया था. ऐसे में कोई ठिकाना नहीं कि वे उनके लिए मुख्यमंत्री का पद भी छोड़ दें. यह संभावना इसलिए भी है क्योंकि पिछले हफ्ते उनके मंत्रिमंडल के तीन सदस्य मांग कर चुके हैं कि शशिकला सरकार की कमान भी संभालें. लेकिन इन मंत्रियों पर कार्रवाई की बात तो दूर ओपीएस ने उन्हें किसी किस्म की हिदायत तक नहीं दी.

इस संबंध में मद्रास विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आर मणिवन्नन हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल से बात करते हुए कहते हैं, ‘ओपीएस मजबूत होते तो उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की मांग करने वाले नेता अब तक उनके मंत्रिमंडल में न रह पाते. कोई मुख्यमंत्री ऐसे किसी नेता को अपनी टीम में नहीं रखता, जो उन्हें हटाने की मांग करे.’ इसी तरह, राजनीतिक विश्लेषक आझी सेंथिलनाथन कहते हैं, ‘वे (ओपीएस) ताकत दिखाने का फैसला करते भी हैं, तो उनका कोई समर्थन नहीं करेगा. जाति समुदाय का समर्थन भी उनके पास नहीं है. जिस जाति वर्ग (थेवर) से वे ताल्लुक रखते हैं, उसी से शशिकला भी आती हैं. ऐसे में उनके लिए ज्यादा विकल्प नहीं हैं. उन्हें मौका तभी मिल सकता है, जब शशिकला को शीर्ष अदालत दोषी ठहरा दे.’ बता दें कि जयललिता के खिालफ चले भ्रष्टाचार के मामले में शशिकला भी आरोपी हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जून में फैसला सुरक्षित रख लिया था.

तो क्या इन परिस्थितियों के चलते ओपीएस नरेंद्र मोदी के प्रभाव में आ रहे हैं?

ओपीएस का अब तक राजनीतिक सफर इस बात का गवाह है कि वे हमेशा किसी न किसी बड़े राजनीतिक कद की छत्रछाया में रहे. कार्यकर्ता के तौर पर जब राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई तो एआईएडीएमके की स्थापना करने वाले एमजीआर (एमजी रामचंद्रन) उनके हीरो हुआ करते थे. फिर पार्टी में धीरे-धीरे कद बढ़ा तो जयललिता की छत्रछाया में आ गए. वे 2001 और 2014 में मुख्यमंत्री भी बने, लेकिन उनकी सरकार की ‘सरकार’ भी जयललिता ही रहीं. यानी तात्कालिक व्यवस्था के तहत जयललिता ने उन्हें यह पद सौंपा था और जैसे ही भ्रष्टाचार के आरोपों से वे मुक्त हुईं, दोनों ही बार उन्होंने अपनी कुर्सी ओपीएस से वापस ले ली. अब जबकि जयललिता इस दुनिया में नहीं हैं, तो क्या ओपीएस फिर अपने लिए किसी बड़े राजनीतिक वटवृक्ष की छाया ढूंढ रहे हैं? राजनीति के जानकारों की मानें तो इस प्रश्न का जवाब इस वक्त तो ‘हां’ में हो सकता है.

इस स्थिति में ओपीएस के सामने दो विकल्प हैं. एक - पार्टी की अंतरिम महासचिव शशिकला नटराजन. दूसरे- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. शशिकला का समर्थन तो ओपीएस पहले ही कर चुके हैं. रही बात मोदी की तो दिल्ली और चेन्नई के राजनीतिक गलियारों की हवा का रुख बताता है कि ओपीएस को प्रभाव में लेने के लिए प्रधानमंत्री भी एकदम तैयार हैं. अभी 19 दिसंबर को ही ओपीएस ने दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी. इस बैठक से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ‘ओपीएस के साथ पार्टी नेता तथा लोकसभा के उपाध्यक्ष एम थंबीदुरई, तत्कालीन मुख्य सचिव (अब पूर्व) राम मोहन राव और आईएएस शीला बालाकृष्णन भी थीं. इस औपचारिक मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री ने खुद पहल करते हुए ओपीएस के साथ एकांत में बात की. इस चर्चा के बारे में बाद में बताया गया कि ओपीएस के सामने प्रधानमंत्री ने राज्य में ‘सुशासन की आवश्यकता’ पर जोर दिया है.

लेकिन ‘सुशासन की आवश्यकता’ बताए जाने के दो दिन बाद ही प्रदेश के मुख्य सचिव राव के ठिकानों पर आयकर विभाग की टीमें धावा बोल देती हैं. ताबड़तोड़ छापेमारी के बाद अगले दिन बड़ी शांति से राव की इस पद से छुट्टी हो जाती है. जानकारों की मानें तो यह सब इस बात का संकेत है कि मोदी सरकार तमिलनाडु की राजनीति पर कितनी गंभीरता से और किस हद तक नजदीकी निगाह रखे हुए है. कहा तो यह भी जा रहा है कि प्रधानमंत्री यह कतई नहीं चाहते कि राज्य की कमान ‘गलत हाथों’ में चली जाए. इसीलिए खुद उन्होंने अपनी तरफ से ओपीएस को हर तरह की मदद और समर्थन का प्रस्ताव दिया है. भाजपा सूत्रों के मुताबिक, ‘शशिकला और उनके परिवार को केंद्र सरकार संदेह की निगाह से देखती है. ये वे लोग हैं, जिन्हें जयललिता ने पार्टी से बाहर निकाल दिया था. लेकिन अब इन दिनों वे पार्टी कार्यकर्ताओं को आदेश-निर्देश दे रहे हैं.’

एआईएडीएमके से संबद्ध एक बड़े नेता के मुताबिक, ‘इन्हीं सब कारणों से प्रधानमंत्री चाहते हैं कि ओपीएस जैसे लोगों को समर्थन दिया जाए. उन्हें मजबूत किया जाए. तमिलनाडु में अलग-अलग जगहों पर पिछले दिनों हुई छापामार कार्रवाइयों का पैटर्न भी कुछ खास लोगों को यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार राज्य पर नजदीकी निगाह रखे हुए है. वह किसी एक परिवार को अलोकतांत्रिक तरीके से वहां सत्ता-शक्ति हथियाने में सफल नहीं होने देगी.’ इस बात को एक और तथ्य से बल मिलता है कि पिछले दिनों शशिकला ने भी भाजपा नेतृत्व से मुलाकात करने की कोशिश की थी. उनके पति एम नटराजन ने प्रधानमंत्री मोदी सहित केंद्र के चार शीर्ष मंत्रियों से मिलने का वक्त भी मांगा था लेकिन किसी ने भी उन्हें समय नहीं दिया. इसके उलट ओपीएस को यह संदेश जरूर दिया गया कि दिल्ली आते-जाते रहा करें ताकि केंद्र से राज्य के संबंध मजबूत हों.

यानी इस तमाम घटनाक्रम का निष्कर्ष निकालें तो यह करीब-करीब स्पष्ट होता जा रहा है कि शशिकला नटराजन के लिए राह आसान नहीं है. अंतरिम महासचिव के बाद उनका जल्दी ही महासचिव बनना बिल्कुल तय है. लेकिन पार्टी में अपनी पकड़ बनाने के बावजूद राज्य सरकार पर नरेंद्र मोदी का असर काटना उनके लिए आसान नहीं होगा.