2012 के पंजाब विधानसभा चुनावों में यह माना जा रहा था कि शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की स्थिति बुरी है और कांग्रेस आसानी से सरकार बनाने के लिए जरूरी विधायकों की संख्या हासिल कर लेगी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि कई सीटों पर कांग्रेस के बागी लड़े और इसका फायदा अकाली दल-भाजपा गठबंधन को मिला. इस बार भी कैप्टन अमरिंदर सिंह की ही अगुवाई वाली कांग्रेस को इस गठबंधन से ज्यादा अच्छी स्थिति में बताया जा रहा है. लेकिन कुछ समय पहले से ऐसे संकेत भी मिलने लगे हैं कि पार्टी के लिए एक बार फिर से 2012 वाली स्थिति पैदा हो सकती है.

ऐसा पहला संकेत तब मिला जब दिसंबर के पहले हफ्ते में हुई केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में उम्मीदवारों की पहली सूची पर सहमति नहीं बन पाई. इस समिति की अध्यक्षता खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कर रही थीं. इससे ऐसा लगा कि कांग्रेस में टिकट बंटवारे को लेकर सब कुछ ठीक नहीं है. इसके बाद चुनाव समिति की और बैठकें हुईं.

इस बीच जब भी कांग्रेस में टिकटों को लेकर मतभेद की खबरें आईं, कांग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर इन्हें खारिज किया. लेकिन कई कांग्रेसी नेताओं ने अनौपचरिक बातचीत में यह स्वीकार किया कि कुछ सीटों को लेकर मतभेद हैं. इसका संकेत कांग्रेस की ओर से जारी की जा रही उम्मीदवारों की सूची से भी मिलता है जिन्हें केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकों के बाद बड़ी सावधानी से धीरे-धीरे जारी किया जा रहा है.

पार्टी द्वारा सार्वजनिक की गई पहली सूची में 61 उम्मीदवारों के नाम थे तो दूसरी में 16 प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की गई थी. पहली सूची में जिन 61 लोगों के नामों की घोषणा की गई थी, उनमें से 46 ही ऐसे हैं जिन्होंने 2012 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था. इसके अलावा एक पूर्व सांसद को टिकट दिया गया है. साथ ही उन दो नेताओं को भी कांग्रेस की पहली सूची में जगह मिली है जो 2012 का चुनाव पार्टी से बगाबत करके लड़े थे.

कांग्रेस की असली सरदर्दी अभी बाकी है. अभी तक पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए नेताओं की उम्मीदवारी की घोषणा नहीं की है

इसके अलावा पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल और उनके कुछ सहयोगियों को भी कांग्रेस ने टिकट देने की घोषणा की. मनप्रीत ने अपनी पंजाब पीपुल्स पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया है. जिन चार विधायकों के टिकट काटे गए, उनकी सीटों पर उनके नाते-रिश्तेदारों को ही टिकट दिया गया है. इन सावधानियों के बारे में कहा जा रहा है कि ऐसा न करने पर पार्टी को भी एक बार फिर से 2012 जैसी स्थिति बन जाने का अंदेशा था.

पंजाब की राजनीति को जानने-समझने वाले लोग बताते हैं कि 2012 की स्थिति फिर से नहीं बने, यह सुनिश्चित करने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दो फार्मूलों पर काम किया है - उन्होंने तय किया कि एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट दिया जाएगा और आरक्षित सीटों के अलावा उम्मीदवारों के बीच सीटों की अदला-बदली नहीं होगी.

लेकिन इतनी सावधानी के बावजूद कांग्रेस के टिकट बंटवारे को लेकर कुछ मतभेद सार्वजनिक हुए. इसमें सबसे प्रमुखता से जो मामला सामने आया, वह है खेमकरन विधानसभा सीट का. यहां से कांग्रेस के पुराने नेता गुरचेत सिंह भुल्लर टिकट मांग रहे थे. लेकिन कांग्रेस ने उनकी जगह उनके बेटे सुखपाल सिंह भुल्लर को टिकट दे दिया. इसका विरोध करते हुए गुरचेत सिंह भुल्लर ने यह तक कह दिया कि सुखपाल पर कई तरह के आरोप हैं, इसलिए उसे टिकट नहीं दिया जाना चाहिए था. सुखपाल के टिकट का विरोध न सिर्फ उनके पिता ने ही नहीं बल्कि उनके सगे भाई अनूप सिंह भुल्लर ने भी किया. इन दोनों ने सोनिया और राहुल गांधी को सुखपाल की उम्मीदवारी वापस लेने के लिए पत्र भी लिखे हैं.

कांग्रेस की असली सरदर्दी अभी बाकी है. अभी तक पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए नेताओं की उम्मीदवारी की घोषणा नहीं की है. इनमें भाजपा से आए नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू भी शामिल हैं. साथ ही परगट सिंह की उम्मीदवारी पर भी अभी कांग्रेस ने कोई निर्णय नहीं लिया है. अकाली दल से आने वाले दूसरे नेताओं की उम्मीदवारी की घोषणा भी नहीं की गई है.

2012 में सत्ता की सबसे सशक्त दावेदार लग रही कांग्रेस की हार के पीछे असली वजह यही थी कि उसके 22 बागी चुनावी मैदान में उतर गए थे

माना जा रहा है कि बची हुए सीटों में तकरीबन 12 से 15 ऐसी हैं जिन पर दूसरे दलों से आए नेता टिकट मांग रहे हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह की असली परीक्षा इन्हीं पर होनी है. क्योंकि इन पर पहले से कांग्रेसी नेता काम कर रहे थे और उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें ही इन सीटों पर टिकट देगी. वहीं दूसरी तरफ अन्य दलों से आए नेताओं की नजर भी इन सीटों पर है. केवल 117 विधानसभा क्षेत्रों वाली पंजाब विधानसभा में कुछ सीटों पर असंतोष की स्थिति ही पार्टी के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है.

ऐसे में कांग्रेस और कैप्टन अमरिंदर सिंह की असली परीक्षा अभी बाकी है. अगर वे अपनी पार्टी के पुराने लोगों को टिकट देते हैं तो दूसरे दलों से आए नेता नाराज होंगे और बागी होकर चुनाव लड़ सकते हैं. क्योंकि इनके बारे में माना जाता है कि ये कांग्रेस में शामिल ही इस वादे के साथ हुए थे कि पार्टी इन्हें टिकट देगी.

2012 में सत्ता की सबसे सशक्त दावेदार लग रही कांग्रेस की हार के पीछे असली वजह यही थी कि उसके 22 बागी चुनावी मैदान में उतर गए थे. इनमें से 18 ऐसे थे जिन्हें अपने-अपने क्षेत्रे में बेहद मजबूत माना जाता था. इन 18 में से कुछ चुनाव जीते भी लेकिन अधिकांश ने इतने वोट काटे कि कांग्रेस को इन सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा. इसके चलते ही प्रकाश सिंह बादल के सत्ता में बने रहने का रास्ता साफ हो गया और कांग्रेस का वनवास जारी रहा.

अब कांग्रेस का पंजाब में दस साल का वनवास खत्म होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बची हुई विधानसभा सीटों पर कांग्रेस कितनी सूझबूझ के साथ उम्मीदवारों की घोषणा करती है. पार्टी और कैप्टन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अगर असंतोष की स्थिति पैदा होती है तो इससे कैसे निपटा जाए और पार्टी नेताओं को बागी होने से कैसे रोका जाए!