आज का दौर तकनीक का है. लगभग हर नई लीक तकनीक से शुरू हो रही है इसलिए इस क्षेत्र में होने वाले छोटे से छोटे बदलावों पर भी जानकारों की बारीक नजर रहती है. 2016 में तकनीक से जुड़ी बहुत सी खबरें लगातार सुर्खियां बनाती रहीं. इनमें से तीन सबसे बड़ी खबरों पर नजर डालते हैं:

फेसबुक की 'फ्री बेसिक्स' योजना

साल 2016 के शुरुआती महीनों में फेसबुक की यह योजना तीखी बहस के घेरे में रही. भारत में इसे लागू कराने के लिए फेसबुक के मालिक मार्क जकरबर्ग ने एड़ी-चोटी तक का जोर लगा दिया था लेकिन वे इसमें सफल नहीं हो सके. भारतीय दूरसंचार नियामक संस्थान (ट्राई) ने 'फ्री बेसिक्स' यानि मुफ्त इंटरनेट देने की सुविधा को इंटरनेट के लोकतांत्रिक ढांचे का उल्लंघन बताते हुए इसे अनुमति नहीं दी.

अपनी इस योजना को लेकर फेसबुक ने भारत में धुआंधार प्रचार किया था. उसका कहना था कि एक अरब से ज्यादा की जनसंख्या वाले भारत में आबादी का 70 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा इंटरनेट से वंचित है और इस योजना के जरिए वह ग्रामीण इलाकों के लोगों को मुफ्त में इंटरनेट उपलब्ध कराना चाहती है. उधर, इस योजना के आलोचकों का तर्क था कि फ्री बेसिक्स, नेट न्यूट्रैलिटी के उस सिद्धांत का उल्लंघन है जो इंटरनेट की बुनियाद है. उनका कहना था कि 'फ्री बेसिक्स' खुला मंच नहीं है और यह पूरी तरह फेसबुक के नियंत्रण में होगा. आलोचकों के मुताबिक फ्री बेसिक्स का मकसद लोगों को मुफ्त में इंटरनेट नहीं बल्कि फेसबुक और इसके सहयोगियों तक पहुंच देना है जबकि बाकी सभी वेबसाइटों तक पहुंचने के लिए यूजरों को पैसा चुकाना होगा. यानी फेसबुक और इसके सहयोगी अनुचित तरीके से लाभ की स्थिति में होंगे. कुछ जानकारों का यह भी कहना था कि फेसबुक अपनी कमाई बढ़ाने के लिए ऐसा कर रहा है क्योंकि यूजरों की संख्या के आधार पर दूसरे नंबर पर आने वाले भारत से उसकी कमाई ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है.

फ्री बेसिक्स के लिए फेसबुक द्वारा किये गए प्रयास भी काफी विवादों में रहे थे. ट्राई इस मुद्दे पर लोगों से सुझाव मांगे तो फ्री बेसिक्स के खिलाफ माहौल बनता देख फेसबुक ने अपने यूजरों से कहा कि वे फ्री बेसिक्स का समर्थन करें. उसने यूजरों से यह भी अनुरोध किया कि वे 'डिजिटल इक्वैलिटी' का समर्थन करते हुए ट्राई को ईमेल करें. यानी फ्री बेसिक्स को 'डिजिटल इक्वैलिटी' के साथ मिलाने की कोशिश की गई. इसके लिए उसे ट्राई से चेतावनी भी मिली.

ट्राई द्वारा फ्री बेसिक्स को नकारने के बाद इस पर प्रतिक्रिया देते हुए फेसबुक बोर्ड के एक सदस्य मार्क एंड्रीसन की विवादित टिप्पणी भी काफी चर्चा में रही थी. एंड्रीसन ने ट्विटर पर ट्राई के फैसले को उपनिवेशवाद विरोधी बताते हुए कहा था कि अच्छा होता यदि भारत ब्रिटिश शासन के अधीन ही रहता. हालांकि, उनकी इस टिप्पणी पर बवाल होने और जकरबर्ग द्वारा नाराजगी जताए जाने के बाद उन्होंने इसके लिए सामूहिक रूप से माफ़ी मांग ली थी.

'पॉकेमॉन गो' और इससे जुड़ी विचित्र घटनाएं

इस साल पूरी दुनिया में छाई रही तकनीक से जुड़ी सबसे बड़ी दूसरी खबर पॉकेमॉन गो की थी. कल्पना और हकीकत का मिश्रण कहे जाने वाले इस गेम ने एक तरफ दुनिया भर में धमाल मचाया तो दूसरी ओर यह अदालती नोटिसों, सरकारी चेतावनियों और धार्मिक फतवों का भी सबब बना.

यह गेम मोबाइल के जीपीएस सिस्टम और गूगल मैप का इस्तेमाल करता है. गेम खेलते वक्त यूजर को मोबाइल स्क्रीन पर गूगल मैप की तरह ही एक मैप दिखता है. इस मैप में अलग-अलग जगहों पर छोटे-छोटे दानव दिखाई देते हैं. गेम खेलने वाले को मैप देखते हुए वास्तविक दुनिया में चलकर उस दानव तक पहुंचना और फिर उसे पकड़ना होता है.

गेम की सबसे बड़ी खासियतों में से एक यह भी है कि जब गेम का मैप देखते हुए आप पोकेमान के करीब पहुंचते हैं और इसमें दिए गए 'आउगमेंटेड रियलिटी' के बटन को ऑन करते हैं तो मोबाइल का कैमरा ऑन हो जाता है. इसमें स्क्रीन वैसे ही नजर आती है जैसी आम मोबाइल कैमरों में नजर आती है. बस, वास्तविक दुनिया की चीजों के बीच में आपको पॉकेमॉन भी नजर आता है. यही इस गेम में काल्पनिक दुनिया और वास्तविक दुनिया का मिश्रण है.

'आउगमेंटेड रियलिटी' का बटन ऑन होने पर स्क्रीन पर दिखता पॉकेमॉन
'आउगमेंटेड रियलिटी' का बटन ऑन होने पर स्क्रीन पर दिखता पॉकेमॉन

सुनने में अजीब लगता है कि मोबाइल पर खेले जाने वाला कोई गेम कई देशों की सुरक्षा से लेकर किसी धर्म के लिए खतरा बन सकता है लेकिन, पॉकेमॉन गो के साथ ऐसा ही है. जहां अमेरिका सहित कई देशों में इसे लेकर सरकारी चेतावनियां जारी हुईं तो भारत सहित कई देशों में फतवे. यह खेल लगभग हर दिन ही किसी न किसी घटना को लेकर सुर्खियां बना रहा. रूस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ईरान कहना था कि यह गेम अन्य मोबाइल ऐप से कहीं आगे जाकर गलत तरह से किसी भी जगह की बहुत ज्यादा जानकारी इकट्ठा कर लेता है जो किसी भी देश की गोपनीयता के लिए खतरा है.

इसके अलावा मिस्र, तुर्की और भारत जैसे देशों में भी यह खेल विवाद का सबब बना. कहा गया कि इसे खेलने वाले मोबाइल में मस्जिदों के अंदर दिख रहे पोकेमॉन यानि दानवों और उनके अंडों को पकड़ने आते हैं, जबकि मंदिर और मस्जिद एक पवित्र जगह है जहां ऐसा नहीं होना चाहिए. गुजरात हाईकोर्ट में दायर एक याचिका में भी इस गेम पर प्रतिबंध लगाने की अपील करते हुए ऐसा ही तर्क दिया गया था. इसके बाद अदालत ने इस गेम के निर्माताओं और सरकार को नोटिस जारी किया था.

सैमसंग के नोट 7 मोबाइल का फटना

मोबाइल फटने और धुआं निकलने की घटनाओं के बाद साल 2016 में दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल निर्माता कंपनी सैमसंग को अपने स्मार्टफोन नोट 7 का उत्पादन बंद करना पड़ा. बीते 19 अगस्त को बाजार में उतारे गए इस स्मार्टफोन के चार्जिंग के दौरान या उसके बाद फटने की ख़बरें हफ्ते भर बाद ही आने लगी थीं. हालात इतने ज्यादा गंभीर हो गए कि कई देशों ने हवाई यात्रा के दौरान इस फोन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी.

बैटरी फटने की घटनाओं को देखते हुए सैमसंग ने दुनियाभर से करीब 25 लाख नोट 7 स्मार्टफोन वापस ले लिए. लेकिन, इसके बाद भी ग्राहकों को जो मोबाइल वापस दिए गए उनमें गर्म होने की समस्या जस की तस रही. इसके बाद कंपनी अस्थाई तौर पर नोट 7 का उत्पादन रोक दिया. एक अनुमान के मुताबिक इस पूरे प्रकरण से सैमसंग को करीब तीन अरब डॉलर यानी लगभग 20 हजार करोड़ रु का नुकसान हुआ.

मोबाइल की बैटरी फटने की घटनाएं पहले भी सुर्खियों में रही हैं लेकिन, नोट 7 पर उठे विवाद ने आशंकाओं को एक अलग स्तर पर पहुंचा दिया. इसकी एक वजह यह भी थी कि नोट 7 सैमसंग का फ्लैगशिप फोन था जिसकी कीमत 60 हजार रुपये से भी ऊपर थी और जो वर्ग इस फोन का इस्तेमाल करता है वह और उसकी पसंद-नापसंद मोबाइल कंपनियों के लिए काफी मायने रखते हैं. यही कारण था कि सैमसंग को लगे इस झटके का सीधा फायदा ऐपल के आईफोन 7 और गूगल पिक्सल जैसे महंगे स्मार्टफोन्स को हुआ.