जिस तरह से उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी को नियंत्रित करने वाले मुलायम सिंह यादव के परिवार में उठापटक चल रही है, उसने दो दशक पहले एनटी रामाराव परिवार में चली उथल-पुथल की यादें ताजा कर दी हैं. दोनों परिवारों के आंतरिक झगड़ों में कई समानताएं हैं.

सपा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता और पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के खिलाफ झंडा उठा लिया है. वहीं रामाराव परिवार में यह काम उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने किया था. संयोग देखिए कि एनटी रामाराव जिस तेलुगू देशम पार्टी के सर्वेसर्वा थे, उसका चुनाव चिन्ह भी साइकिल ही है और समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी साइकिल ही है.

समाजवादी पार्टी का विवाद तो सामने है ही, जानते हैं कि एनटी रामाराव परिवार में क्या हुआ था और क्यों समाजवादी पार्टी के झगड़े से किसी को उसकी याद आ सकती है.

एनटी रामाराव का फिल्मी कैरियर समाप्त हो गया था और वे पूरी तरह से राजनीति में आने के बाद 1983 में पहली बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वे तीन बार मुख्यमंत्री रहे. 1985 में उनकी पहली पत्नी का कैंसर से देहावसान होने के बाद से वे भगवा कपड़े पहनने लगे थे. उनके सात बेटों और तीन बेटियों में से एक बेटा और दो दामाद तेलुगू देशम पार्टी की राजनीति में सक्रिय थे.

रामाराव परिवार में उथल-पुथल की शुरुआत लक्ष्मी पार्वती के आने से हुई. रामाराव की जीवनी लिखने के सिलसिले में लक्ष्मी पार्वती उनसे मिलीं और फिर दोनों में प्रेम हुआ. 1993 में दोनों ने शादी कर ली. जब 38 वर्षीय लक्ष्मी पार्वती से एनटी रामाराव ने शादी की थी तो उनकी उम्र 70 साल से अधिक हो गई थी. इस वजह से यह शादी उनके बेटों और दामादों को पंसद नहीं थी.

जब लगा कि रामाराव पूरी तरह से लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़े हैं तो उनके बेटों और दामादों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी. इस बगावत की अगुवाई चंद्रबाबू नायडू कर रहे थे जो उस वक्त रामाराव सरकार में मंत्री थे

1994 के विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के दौरान लक्ष्मी पार्वती हमेशा रामाराव के साथ रहा करती थीं. जब चुनावों में 294 में से 214 सीटें तेलगू देशम पार्टी को मिलीं तो इस जीत का श्रेय लक्ष्मी पार्वती को भी मिला. इसके बाद उन्हें लगने लगा कि अब राजनीति में उनकी भी कोई भूमिका हो सकती है. उधर लकवा मारने के बाद लक्ष्मी पार्वती पर रामाराव की निर्भरता बढ़ती जा रही थी.

जब रामाराव ने अपनी पारंपरिक सीट तेकाली खाली की तो परिवार का विवाद सामने आ गया. लक्ष्मी पार्वती इस सीट से चुनाव लड़ना चाहती थीं. वहीं रामाराव के बेटे हरिकृष्ण ने भी इस सीट पर दावा ठोंक दिया. हरिकृष्ण को लगा कि अगर लक्ष्मी पार्वती उनके पिता की पारंपरिक सीट से चुनाव लड़ीं और जीत गईं तो वे रामाराव की उत्तराधिकारी हो जाएंगी.

लेकिन एनटीआर हरिकृष्ण के बजाय लक्ष्मी पार्वती को ही चुनाव लड़ाना चाहते थे. उन्होंने तब दिये अपने एक बयान में कहा था कि हरिकृष्ण तो पार्टी के सदस्य भी नहीं हैं. अंत में इस टकराव को दूर करते हुए रामाराव ने किसी तीसरे को उस सीट पर चुनाव लड़ाया.

लक्ष्मी पार्वती जब तक राजनीति से दूर और रामाराव परिवार तक सीमित रहीं तब तक पार्टी के विधायकों और सांसदों में उनका सम्मान बना रहा. लेकिन जब वे पार्टी की राजनीति और सरकार के कामकाज में दखल देने लगीं तो उन्हें ‘अम्मा’ कहने वाले विधायक और सांसद उनके खिलाफ खड़े हो गए.

जब लगा कि रामाराव पूरी तरह से लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़े हैं तो उनके बेटों और दामादों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी. इस बगावत की अगुवाई चंद्रबाबू नायडू कर रहे थे जो उस वक्त रामाराव सरकार में मंत्री थे. जब एक-एक कर चंद्रबाबू नायडू टीडीपी विधायकों को तोड़ रहे थे तो बातचीत में वे हमेशा एनटी रामाराव के दोनों बेटों हरिकृष्ण और बालकृष्ण को शामिल रखते थे. इससे विधायकों में यह विश्वास जगा कि परिवार अब रामाराव के खिलाफ हो गया है और परिवार में जो नेता है, अंततः उसी के हाथ में पार्टी भी रहेगी.

समाजवादी पार्टी के झगड़े में कुछ लोग अमर सिंह को लक्ष्मी पार्वती बता रहे हैं तो कुछ लोगों को मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता यादव लक्ष्मी पार्वती लगती हैं

इस तरह से पार्टी विधायक एक-एककर चंद्रबाबू नायडू के पाले में शामिल होते चले गए. जिस पार्टी के आजन्म अध्यक्ष रामाराव थे और जिसे अपने बूते उन्होंने खड़ा किया, न सिर्फ उसी पार्टी की सरकार के प्रमुख के तौर पर चंद्रबाबू नायडू ने उन्हें बेदखल किया बल्कि उससे उन्हें निकाल भी दिया. उस दौरान 214 में से बमुश्किल दो दर्जन विधायक ही रामाराव के साथ खड़े दिखाई देते थे.

इसके बाद रामाराव ने अपने परिवार से सार्वजनिक रूप से संबंध तोड़ लिया था. वे चंद्रबाबू नायडू को ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला धोखेबाज’ और औरंगजेब कहते थे. वे चंद्रबाबू नायडू को सबक सिखाने के लिए लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रहे थे. लेकिन इससे पहले ही उनका निधन हो गया.

समाजवादी पार्टी के झगड़े में कुछ लोग अमर सिंह को लक्ष्मी पार्वती बता रहे हैं तो कुछ लोगों को मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता यादव लक्ष्मी पार्वती लगती हैं. सपा के ही एक विधायक यह आरोप लगाते हैं कि साधना गुप्ता सत्ता हथियाने के लिए मुलायम सिंह यादव से अखिलेश के खिलाफ साजिश करा रही हैं ताकि सत्ता उनके विश्वस्त शिवपाल यादव के हाथों में आ सके.

साधना गुप्ता और मुलायम सिंह के बेटे प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव भी राजनीति में उतर गई हैं और पार्टी ने उन्हें लखनऊ कैंट सीट से उम्मीदवार भी घोषित किया है. कहा तो यह भी जा रहा है कि साधना गुप्ता और उनकी बहू की बढ़ती राजनीतिक दिलचस्पी की वजह से मुलायम परिवार दो खेमे में बंट गया है. अखिलेश यादव के अलावा मुलायम के दूसरे भाई रामगोपाल यादव और परिवार के अधिकांश सदस्य साधना गुप्ता के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ हैं.

परिवार में जो लोग साधना गुप्ता का विरोध कर रहे हैं, वही लोग अमर सिंह का भी विरोध कर रहे हैं. क्योंकि एक राय यह भी है कि मुलायम सिंह यादव और साधना गुप्ता की मुलाकात अमर सिंह ने ही कराई थी. उत्तर प्रदेश में कहा तो यह भी जा रहा है कि मुलायम की पहली पत्नी और अखिलेश की मां के निधन के बाद साधना गुप्ता को मुलायम परिवार में शामिल कराने में अमर सिंह की अहम भूमिका थी. अखिलेश जिन वजहों से अमर सिंह से नाराज रहते हैं, उनमें एक वजह यह भी बताई जाती है.

दोनों मामलों में एक समानता और है. एनटीआर खुद को सत्ता से बेदखल करने वाले चंद्रबाबू नायडू को पीठ में छुरा घोंपने वाला औरंगजेब कहते थे. वहीं अखिलेश यादव को भी इसी तरह के विशेषणों से नवाजा जा रहा है

जिस तरह से लक्ष्मी पार्वती का सार्वजनिक बचाव रामाराव करते थे, उसी तरह से अमर सिंह और जाहिर है साधना गुप्ता का बचाव मुलायम सिंह यादव कर रहे हैं. रामाराव भी लक्ष्मी पार्वती से शादी के बाद फिर से राजनीति में मजबूत होने का श्रेय लक्ष्मी पार्वती को देते थे. वहीं मुलायम सिंह यादव भी पार्टी को आगे बढ़ाने का और खुद को जेल जाने से बचाने का श्रेय सार्वजनिक तौर पर अमर सिंह को देते हैं. उन्होंने अखिलेश यादव की मौजूदगी में यह साफ कर दिया कि चाहे जो हो जाए वे अमर सिंह को नहीं छोड़ सकते.

दोनों मामलों में एक समानता और है. एनटीआर खुद को सत्ता से बेदखल करने वाले चंद्रबाबू नायडू को पीठ में छुरा घोंपने वाला औरंगजेब कहते थे. वहीं अखिलेश यादव को भी इसी तरह के विशेषणों से नवाजा जा रहा है.

दोनों मामलों में सबसे बड़ा फर्क यह है कि चंद्रबाबू नायडू ने एनटीआर को बेदखल करने का काम पार्टी के चुनाव जीतने के ठीक बाद शुरू कर दिया था. इसलिए वे तख्तापलट करके भी मुख्यमंत्री बने रहे. वहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव पहले से ही मुख्यमंत्री हैं और चुनाव थोड़े ही दिनों में होने वाले हैं.

लेकिन इस एक बात से ज्यादातर लोग इत्तेफाक रखते हैं कि आने वाले समय में अगर अखिलेश यादव ने अपने राजनीतिक पत्ते सावधानी से चले तो उनकी स्थिति चंद्रबाबू नायडू से बेहतर और मुलायम सिंह यादव की एनटी रामाराव जैसी हो सकती है.