8 नवंबर 2016 को रात आठ बजे काले धन पर एक काला जादू हुआ. उस जादू का नाम था - नोटबंदी. नोटबंदी कहूं या नोटबदली इस संशय से अब तक नहीं निकल पाया हूं. ख़ैर आम बोलचाल में नोटबंदी कहा जा रहा है तो नोटबंदी ही मान लेता हूं.

तो इस काले जादू के बाद रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर द्वारा नोट धारक को दिया गया वादा टूट गया. वादा तोड़ने वाला ख़ुद सामने नहीं आया. रात के आठ बजे देश के प्रधानमंत्री ने इस वादाखिलाफी की घोषणा की. और इसी के साथ काले धन के खिलाफ जंग का ऐलान हो गया. आतंकवाद का इलाज भी इसी काले जादू में था. देशभक्ति जाग उठी और देश क़तार में लग गया. अब सरहदों पर लड़ने का पुण्य बैंकों की क़तार में ही मिलने लगे तो भला कोई क्यों न ले!

देशभक्ति जाग उठी और देश क़तार में लग गया. अब सरहदों पर लड़ने का पुण्य बैंकों की क़तार में ही मिलने लगे तो भला कोई क्यों न ले!

हफ़्ते गुज़रे, महीना गुज़रा, काला जादू चलता रहा. काला सफ़ेद होता रहा. लोग काले धन के खिलाफ इस यज्ञ में आहुति देते रहे. धीरे-धीरे काला धन पतली गली से निकल लिया. काला जादू फिर भी चलता रहा. जादूगर ने टोपी पलटी तो ‘कैशलेस’ का कबूतर उड़ता हुआ सामने आ गया. हम सभी अचंभित से तालियां बजाने लगे. वाह, क्या जादू है! हम कबूतर से खेलने लगे.

(आ) देश बदल रहा है. रोज़ कुछ नए नियम आ रहे हैं. नोटों की कमी भले हो लेकिन सरकार ने नियमों की कमी नहीं होने दी. नियम का टोटा तभी पड़ा जब बात राजनीतिक पार्टियों की आ गई. तब पुराने नियम का सहारा लेना पड़ा. काला जादू काम न आया. अब भला अपनों पर कहीं जादू-टोना किया जाता है? हम इधर अपने ही थोड़े-से पैसों के लिए क़तार में लगे थे. उधर बाग़ों में गुलाबी बहार थी.

फिर समझ आया, काला जादू तो नज़रों का हेरफेर है, हाथ की सफ़ाई है. लेकिन तब तक बटुए पर हाथ साफ़ हो गया था. जादूगर तो ठहरा जादूगर, उसका मजमा लगा हुआ है. दर्शक उम्मीद में हैं कि अभी ताजमहल ग़ायब हो जाएगा! काले जादू के सम्मोहन में हम काले धन को भूल गए.

ऐसा न हो कि मजमा लगाने वाले जादूगर का इंद्रजाल कामयाब हो जाए. हम दंतमंजन खरीद कर घर लौट आएं. काला धन पीछे छूट जाए और हम दांतों को मंजन घिस कर सफेद बनाने की कवायद में लग जाएं.

हम तो कालेधन के छोटे-से सुराख़ को बंद करने के लिए क़तार में लग गए. यहां कालेधन का विशाल परनाला यूं ही खुला पड़ा हुआ है.

कालेधन की जड़ है राजनैतिक पार्टियां, हज़ारों करोड़ों का चुनावी ख़र्च, बेनामी चंदे, बड़ी-बड़ी रैलियां, उड़ते हेलीकॉप्टर, जिनका कोई हिसाब-किताब नहीं. भ्रष्टाचार की गंगोत्री यहीं से निकलती है. हम तो काले धन के छोटे-से सुराख को बंद करने के लिए क़तार में लग गए. यहां काले धन का विशाल परनाला यूं ही खुला पड़ा हुआ है.

हमें काले जादू के प्रभाव को तोड़कर काले धन का सवाल पूछना होगा. मेहनत से कमाये हमारे पैसों पर तो सरकार सवाल उठा रही है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों को मिले सैकड़ों करोड़ों के चंदे पर वह क्यों ख़ामोश है? कालेधन का करीब छह फीसदी हिस्सा ही कैश के रूप में होता है. इस छह फीसदी के लिए सरकार ने 85 फ़ीसदी नोटों को एक झटके में ख़ारिज कर दिया लेकिन बाकी के 94 फ़ीसदी कालेधन पर वह चुप क्यों है? हमें पूछना होगा कि देश के बाहर से जो कालाधन पी-नोट और विदेशों से निवेश के जरिए देश में लाकर सफेद बनाया जा रहा है, उस पर यह खामोशी क्यों?

कितने सवाल हैं जो पूछने हैं. लेकिन यह तो नए मिजाज का निज़ाम है. यहां सवाल पूछने पर सवाल है. हर सवाल पूछने वाले की देशभक्ति संदिग्ध है. वह देश के खिलाफ है. पाकिस्तान का हक़दार है!