नवंबर 2015 की बात है. सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ. वीडियो मुंबई के एक सिनेमा हॉल का था और इसमें एक भीड़ एक परिवार के साथ जोर-जोर से बहस करती दिख रही थी. इसकी वजह यह थी कि एक बच्चे सहित पांच सदस्यों का यह परिवार हॉल में फिल्म शुरू होने से पहले बजाए गए राष्ट्रगान के दौरान बैठा रहा था. यह इस तरह का कोई अकेला मामला नहीं. पिछले साल ही अक्टूबर में लेखक और कार्यकर्ता सलिल चतुर्वेदी को भी गोवा के एक मल्टीप्लेक्स में बदतमीजी का शिकार होना पड़ा. चतुर्वेदी रीढ़ की हड्डी की एक तकलीफ के चलते व्हीलचेयर पर थे लेकिन, एक दंपति को यह नागवार गुजरा कि वे राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए. उसने चतुर्वेदी के साथ बदतमीजी की.

हाल तक महाराष्ट्र और गोवा ही भारत के वे राज्य थे जहां सिनेमाहॉलों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य था. बीते नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि पूरे देश में यह होना चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा कि इस दौरान हॉल में मौजूद सभी लोग राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े हों. जस्टिस दीपक मिश्रा और अमिताव राय की पीठ का कहना था, ‘समय आ गया है कि इस देश के नागरिक यह समझ लें कि वे एक राष्ट्र में रहते हैं और राष्ट्रगान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने को कर्तव्यबद्ध हैं, जो कि संवैधानिक देश प्रेम और अंतर्निहित राष्ट्रीय गुण का प्रतीक है.’ इसी मामले पर बीते मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने इस आदेश पर स्थिति साफ की है. उसने कहा है कि अगर राष्ट्रगान फिल्म का ही हिस्सा है तो दर्शकों को खड़े होने की जरूरत नहीं है.

अगर कोई भारतीय राष्ट्रगान के दौरान खड़ा नहीं होता तो क्या यह दंडनीय अपराध है? कानून इसका जवाब न में देता है. लेकिन राष्ट्रगान से जुड़ी एक नियमावली भी है जिसमें केंद्रीय गृहमंत्रालय समय-समय पर फेरबदल करता रहता है. इसके नियमों का अनजाने में कई मौकों पर बार-बार उल्लंघन होता रहा है और अक्सर सरकार भी इस प्रक्रिया में भागीदार रही है.

भारत के राष्ट्रगान का चयन

आजादी के बाद तुरंत ही तिरंगा भारत का राष्ट्रीय ध्वज बन गया था. लेकिन राष्ट्रगान पर फैसला होने में तीन साल लग गए. ज्यादातर लोग यह मान रहे थे कि इसके लिए वंदे मातरम को चुना जाएगा. इसकी वजह भी थी. आधी सदी से भी ज्यादा समय से यह भारत की आजादी के आंदोलन का गीत बना हुआ था.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मेलनों में मुहम्मद अली जिन्ना और उनके समर्थकों सहित कई मुसलमान भी इसे गाते थे. बाद में कहा गया कि इस गीत के कई छंद इस्लामी आस्थाओं से मेल नहीं खाते. कट्टरपंथी मुसलमानों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. इससे आपसी मतभेद हो गए. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दूसरा विकल्प खोजने को मजबूर होना पड़ा.

26 जनवरी 1950 को जब भारत गणतंत्र बना तो संसद में हुए एक समारोह में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी, ‘जन गण मन का पहला छंद भारतीय गणतंत्र का राष्ट्रगान होगा और वंदे मातरम का पहला छंद राष्ट्रगीत. इसका दर्जा राष्ट्रगान के बराबर होगा.’

इस तरह भारतीय गणतंत्र को दो गीत मिले.

शुरुआती दिन

जल्द ही यह फैसला हुआ कि अंतरराष्ट्रीय चलन के मुताबिक इन दोनों गीतों की एक धुन बनाई जाए. यह काम ऑल इंडिया रेडियो को सौंपा गया. दोनों गीतों के दो संस्करण तैयार किए गए- पहला सामूहिक स्वरगान था और दूसरा मिलिट्री बैंडों के लिए धुन. दोनों की अवधि 60 सेकेंड से कम थी. एक संसदीय समिति ने इन्हें मंजूरी दी और ग्रामोफोन कंपनी ऑफ इंडिया को इन दोनों गीतों के रिकॉर्डों की एक हजार कॉपियां बनाने को कहा गया.

हर रिकॉर्ड के एक तरफ गीत का स्वरबद्ध संस्करण था और दूसरी तरफ सिर्फ संगीतबद्ध. ये रिकॉर्ड देशभर में फैले करीब 800 रेडियो स्टेशनों में भिजवाए गए. यह भी फैसला हुआ कि हर स्टेशन से सुबह-सुबह सिगनेचर ट्यून के फौरन बाद वंदे मातरम का स्वरबद्ध संस्करण बजाया जाएगा.

यह परंपरा आज भी जारी है. दोनों गीतों में एक पुरुष स्वर है और एक महिला स्वर. यह आवाज पंडित दिनकर कैकिनी और सुमति मुतातकर की है. एक साक्षात्कार में पंडित दिनकर कैकिनी का कहना था, ‘ऑल इंडिया रेडियो में ड्यूटी के दौरान हम हर शुक्रवार को दोपहर में संसद जाया करते थे. हमारा काम था सांसदों को राष्ट्र गान और राष्ट्रगीत की ट्रेनिंग देना. 60 सेकेंड से कम वक्त में और बिना किसी वाद्ययंत्र के.’

पंडित कैकिनी के मुताबिक ज्यादातर लोगों को ट्रेनिंग की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि वंदे मातरम रेडियो पर रोज बजता था. उस वक्त को याद करते हुए उनका कहना था, ‘1955 से वंदे मातरम तो रेडियो पर रोज बजता था, लेकिन राष्ट्रगान किसी विशेष मौके पर ही बजाया जाता था.’

इन विशेष अवसरों में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस भी शामिल हैं जब तिरंगा फहराकर उसे भारतीय सशस्त्र सेनाओं के सुपुर्द किया जाता है. इन दो अवसरों पर वाद्ययंत्रों के बिना नागरिक राष्ट्रगान गाया जाता है. इस दौरान सभी को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होता है.

किसी स्कूल या कार्यालय में कामकाज शुरू होने से पहले छात्र या कर्मचारी सामूहिक रूप से राष्ट्रगान गा सकते हैं. या फिर स्कूल-कार्यालय बंद करने के ठीक पहले यह रस्म निभायी जा सकती है. लेकिन इसे अकेले या फिर किसी कार्यावधि के बीच में नहीं गाया जा सकता.

भारतीय नागरिक सालों से यह आचार संहिता मानते आ रहे हैं. लेकिन लोगों में देशभक्ति की भावना और प्रबल करने के लिए समय-समय पर इस आचार संहिता के नियम-निर्देशों में छेड़खानी होती रही है.

सिनेमाहॉलों में राष्ट्रगान बजाने की प्रथा कैसे शुरू हुई

1962 के युद्ध में चीन से पराजय के बाद हमारे यहां कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों को महसूस हुआ कि आम नागरिकों में देशभक्ति की भावना का संचार करने की जरूरत है. इसके लिए कई प्रस्ताव तैयार हुए, और आखिरकार 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तय हुआ कि अब सभी सिनेमाघरों में शो खत्म होने के बाद राष्ट्रगान बजाया जाएगा.

शुरुआत में कलकत्ता की एक ग्रामोफोन फैक्टरी ने राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग के ग्रामोफोन तैयार किए थे और पूरे देश में सिनेमाहॉल मालिकों-संचालकों में बांटे थे. बाद में एक 60 सेकंड की एक ब्लैक एंड वाइट फिल्म भी तैयार हुई. इसमें पूरे समय एक स्तंभ पर तिरंगा लहराता दिखता था और पृष्ठभूमि में राष्ट्रगान बजता था. कुछ सालों बाद यह फिल्म रंगीन हुई और इस तरह झंडा वास्तव में तिरंगा हो गया.

जिस दौर में यह चलन शुरू हुआ तब माहौल की वजह से लोगों में राष्ट्रगान के लिए एक स्वाभाविक सम्मान भर चुका था. वे राष्ट्रगान शुरू होते ही पूरी निष्ठा से अपनी सीटों से खड़े होते थे. लेकिन बाद में जब धीरे-धीरे युद्ध का माहौल सामान्य हुआ तो स्थिति में भी बदलाव आने लगा. अब दर्शक फिल्म खत्म होने के तुरंत बाद हॉल से निकल जाते थे या राष्ट्रगान बजते समय बाहर निकलते रहते थे. आखिरकार 1980-90 के दशक में राष्ट्रगान वाली इस फिल्म को सिनेमाहॉल में दिखाना-सुनाना बंद कर दिया गया.

बाद के सालों में जब बड़े-बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्स खुलना शुरू हुए तब नौकरशाहों को एक बार फिर ख्याल हुआ कि यहां राष्ट्रगान बजना चाहिए. 2003 में महाराष्ट्र सरकार ने इस विचार को आगे बढ़ाया. राज्य के उप-मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने सुझाव दिया कि राष्ट्रगान फिल्म शुरू होने के ठीक पहले बजाया जाना चाहिए. इस नियम का फायदा यह था कि अब कोई भी दर्शक राष्ट्रगान के दौरान अनुपस्थित नहीं रह सकता. यह नियम लागू होने के बाद मल्टीप्लेक्सों में कुछ अजीबो-गरीब दृश्य भी देखने को मिलने लगे. जैसे कि लोग एक हाथ में सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल पकड़े हैं और दूसरे हाथ में चिप्स का पैकेट, लेकिन राष्ट्रगान बजते समय खड़े होकर उसे सम्मान देने की कोशिश कर रहे हैं.

फिर इस शताब्दी के पहले दशक की शुरुआत हुई और इसके साथ ही प्रबंधन और मीडिया गुरुओं से जुड़े युवाओं की एक ऊर्जावान टीम सामने आई. इन्होंने राष्ट्रगान सुनाने-दिखाने वाली एक नई फिल्म बनाई. यहां कोरस में राष्ट्रगान गाया गया था. इस नई फिल्म में असली तिरंगे की जगह तीन रंगों की डिजिटल इमेज का प्रयोग किया गया. डिजिटल तिरंगे का प्रयोग आचार संहिता के मुताबिक नहीं था क्योंकि इसमें तीनों रंग तिरंगे के असली रंगों से थोड़े अलग दिखते थे. वहीं दूसरी तरफ झंडा किसी स्तंभ पर फहराता हुआ नहीं बल्कि ऐसा लगता था जैसे किसी मैदान पर बिछा हो. हालांकि जल्दी ही राष्ट्रगान का यह नया संस्करण कई स्कूलों ने अपना लिया.

फिर रहमान ने राष्ट्रगान गाया

बीते दशक के मध्य की बात होगी जब पंडित जसराज ने घोषणा की थी कि वे इस एक मिनट की फिल्म की जगह राष्ट्रगान का दो मिनट का वीडियो बनाएंगे. इस वीडियो में कई बड़े गायकों जैसे पंडित भीमसेन जोशी, लता मंगेशकर और एआर रहमान के साथ-साथ शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत के तमाम दिग्गजों ने राष्ट्रगान को सुर दिए थे. हालांकि इस बार भी राष्ट्रगान से जुड़ी आचार संहिता का उल्लंघन हुआ. कुछ संस्थाओं और नागरिकों के विरोध के चलते राष्ट्रगान के इस संस्करण को पहले वाले की जगह नहीं लाया गया.

2007 में जब भारतीय स्वतंत्रता का 60वां वर्ष चल रहा था, पुष्कर श्रोत्री ने मराठी कलाकारों के साथ राष्ट्रगान का एक संस्करण तैयार करने का फैसला किया. पुष्कर मराठी थियेटर और टीवी कलाकार हैं. उन्हें इस काम में कुछ राजनीतिक मदद भी मिली और उन्होंने राष्ट्रगान के अलग-अलग हिस्से गाते हुए 40 कलाकारों के साथ एक मिनट लंबा वीडियो तैयार कर लिया. यही वीडियो 15 अगस्त, 2007 से सिनेमाहॉलों में दिखाया जाना था.

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अब यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि श्रोत्री को इस काम के लिए कहां से प्रेरणा मिली? इसके जवाब के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना पड़ेगा. बात अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय की है. तब संस्कृति मंत्रालय ने भारतबाला प्रोडक्शंस से संपर्क किया था. इस कंपनी ने 1999 में देश का सलाम फिल्म बनाई थी और एआर रहमान के वंदे मातरम वाले एलबम का निर्माण भी इसी ने किया था. तत्कालीन सरकार के सलाहकार सुधींद्र कुलकर्णी ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाया था. इसके लिए उन्होंने रहमान को चुना था और फिर राष्ट्रगान के इस विशेष संस्करण के लिए 50 से ज्यादा संगीतकार और जुट गए.

भारतबाला प्रोडक्शन और रहमान के इस जन गण मन एलबम की प्रोड्यूसर सोनी म्यूजिक कंपनी थी. उसी ने एलबम की मार्केंटिंग भी की. इस एलबम में एक वीडियो और एक ऑडियो सीडी थी और साथ में प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के संदेश वाली एक बुकलेट भी थी. तकरीबन एक घंटे के इस ऑडियो संस्करण में 35 कलाकारों ने राष्ट्रगान गाया या बजाया था. और हर एक ने इसे 90 से ज्यादा सेकंडों में पूरा किया था. यानी राष्ट्रगान की आचार संहिता के मुताबिक तय समय से ज्यादा समय लिया था. इस तरह आचार संहिता का फिर उल्लंघन हुआ.

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वीडियो सीडी के दो हिस्से थे. एक संगीतबद्ध और दूसरा स्वरबद्ध. प्रत्येक की समयावधि 150 सेकंड थी. वीडियो में कुछ सैनिक लद्दाख में तिरंगा फहराते हुए दिखते हैं. लेकिन इसके साथ राष्ट्रगान का कोरस या सैन्य बैंड पर राष्ट्रगान नहीं बजता. इसके बदले पंडित हरिप्रसाद चौरसिया अपनी बांसुरी पर जन गण मन की स्वरलहरी निकालते हुए दिखते हैं. उनके बाद उस्ताद अमजद अली खान और उनके दोनों बेटे, फिर पंडित शिवकुमार शर्मा और उनका बेटा धुन को आगे बढ़ाते हैं. इस तरह सरोद, संतूर के बाद राष्ट्रगान सितार, वॉयलिन से होते हुए सुल्तान खान की सारंगी तक बजता है. इस वीडियो में रहमान के आने तक अपनी-अपनी विधा का तकरीबन हर उस्ताद दिख जाता है. सबसे आखिर में लहराते समंदर की पृष्ठभूमि में एक भव्य और रोमांचक दृश्य आता है जहां एआर रहमान कीबोर्ड बजाते हुए दिखते हैं.

स्वरबद्ध रचना वाले हिस्से में सभी बड़े दिग्गज गायक आंख मूंदे राष्ट्रगान गुनगुनाते देखे-सुने जा सकते हैं. सबसे पहले लता मंगेशकर दिखती हैं जिनके गले में तिरंगे झंडे का लॉकेट बंधा हुआ है. फिर राष्ट्रगान को कविता कृष्णमूर्ति से लेकर जगजीत सिंह, पंडित भीमसेन जोशी और पंडित जसराज तक आगे बढ़ाते हैं. आखिर तक लता मंगेशकर फिर दिखती हैं और उनके साथ यहां आशा भोसले भी हैं. यहां भी अंत में रहमान दिखते हैं और राष्ट्रगान की आखिरी लाइन जय हे, जय हे, जय हे गाते हैं और उनके बाद ये सभी गायक सामूहिक रूप से जय हे गाते हुए राष्ट्रगान खत्म करते हैं.

यह वीडियो तब नियमित तौर पर टीवी पर आता था. इस दौरान भी राष्ट्रगान की आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर कुछ नागरिकों और संस्थाओं ने इसपर आपत्ति जताई थी. इस पर अखबारों में आलेख लिखे गए थे. साथ ही भारतबाला प्रोडक्शंस और रहमान को ईमेल भी किए गए लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा. वहीं 2000 में आई फिल्म कभी खुशी कभी गम में वंदे मातरम और जन-गण-मन दोनों बजाए गए थे.

कुछ साल पहले एक फिल्म वी द पीपल रिलीज हुई थी. इसमें दिखाया गया था कि एक सड़क किनारे एक रेडियो पर राष्ट्रगान बजना शुरू होता है और एक मोची और उसके तीन साथी तुरंत इसके सम्मान में खड़े हो जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ सड़क पर आवाजाही बदस्तूर जारी रहती है. उसी समय फिल्म में अमिताभ बच्चन की आवाज गूंजती है, ‘सावधान की मुद्रा में खड़े हों, अपने राष्ट्रगान को सम्मान दें और अपने देश को सम्मान दें.’ लेकिन कई बार की तरह इस बार भी आचार संहिता का यहां उल्लंघन किया गया. फिल्म निर्माताओं ने इस बात का कतई ख्याल नहीं रखा कि असाधारण परिस्थितियों से इतर रेडियो पर कभी-भी राष्ट्रगान नहीं बजाया जाता.