जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नए सिरे से अशांत हो उठा है. वहां के शिक्षकों ने पहली बार हतप्रभ होकर देखा कि किस प्रकार कुलपति ने अकादमिक परिषद् या विद्वत् परिषद् की बैठक का अपहरण कर लिया. प्रस्ताव पढ़े जाते रहे, कुल सचिव आदेश देते रहे - कीप ऑन रीडिंग और कुलपति कहते रहे - पास! पास!

इस तरह सारे अकादमिक प्रस्ताव पांच से दस मिनट में बिना किसी चर्चा के पारित करा लिए गए. एक अध्यापक मित्र ने कहा कि पहली बार उन्हें यह अनुभव हुआ कि शासन का स्टालिनी तरीका कैसा रहा होगा. वे पूरी तरह सही न थे, स्टालिनी पद्धति में शासन को जबरन प्रस्ताव पारित नहीं कराना होता.

जेएनयू सदमे में है क्योंकि अकादमिक या कार्यकारी परिषद् की बैठकों में अध्यापक आम तौर पर विस्तृत विचार-विमर्श के आदी रहे हैं. अलग-अलग मिजाज के कुलपतियों के बावजूद अब तक इन निकायों को अकादमिक ही रहने दिया गया है और प्रशासन ने अपना बुलडोज़र इन पर नहीं चलाया है. इन निकायों में छात्रों का प्रतिनिधित्व भी रहा है और आज तक उनकी उपस्थिति के कारण चर्चा में कोई बाधा पहुंची हो, इसके प्रमाण नहीं.

अकादमिक परिषद् की इस बैठक के अंत में अपना विरोध जताने कुछ छात्र घुस गए, प्रशासन ने तुरंत उन्हें निलंबित कर दिया. जब उन छात्रों को संबोधित करने अध्यापिका निवेदिता मेनन पहुंची तो उन्हें ही चेतावनी जारी कर डाली. इस तरह प्रशासन ने छात्रों को पूरी तरह से विरोधी पक्ष तो घोषित कर ही दिया, उनसे संवाद स्थापित करने में जो मददगार हो सकते हैं, उनसे भी वह मात्र शासक या नियोक्ता की तरह पेश आ रहा है. प्रशासन भवन को उसने बाड़ाबंद कर डाला है और इस तरह खुद को बाकी विश्वविद्यालय से बाहरी एक सत्ता में बदल दिया है.

छात्रों और शिक्षकों के एक हिस्से का कहना है कि विभिन्न अकादमिक कार्यक्रमों की प्रवेश प्रक्रिया में साक्षात्कार वाले हिस्से पर अंक कम से कम किए जाने चाहिए

यही काम दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले कुलपति ने किया था, जब अपने दफ्तर को शिक्षकों और छात्रों की पहुंच के बाहर करने के लिए उसे गमलों से घेर दिया.

जेएनयू की स्थिति दूसरे विश्वविद्यालयों जैसी नहीं रही है. इसीलिए प्रस्ताव पारित कराने के कुलपति के जिस तरीके से वहां के लोग स्तब्ध हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय तक के लोगों के लिए यह कोई ताज्जुब की बात नहीं. वहां अकादमिक परिषद् में आधिकारिक प्रस्ताव पारित होगा ही, यह मानी हुई बात है. संकायों और विभागों के अध्यक्ष आधिकारिक प्रस्ताव से सहमत न हों, यह सोचा नहीं जा सकता.

इस कारण अनेक बार हास्यास्पद स्थिति भी पैदा हो जाती है. दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् ने पिछले कुलपति के चारसाला स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम के प्रस्ताव को भारी बहुमत से स्वीकार किया. लेकिन उसी परिषद् ने दो साल बाद नई सरकार के कहने पर कुलपति के उस प्रस्ताव को भी उसी बहुमत से स्वीकार किया जिसके अनुसार चार साला पाठ्यक्रम रद्द किया जाना था.

दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् के सदस्यों को यह सवाल करना आवश्यक नहीं लगा कि पहले उसी पाठ्यक्रम को लागू क्यों किया गया और अब पुराने उसी तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को दुबारा बहाल क्यों किया जा रहा है जिसे वे कभी अप्रासंगिक बता चुके थे. कुलपति की मर्जी जब अकादमिक तर्क बन जाए तो विश्वविद्यालय अकादमिक संस्था नहीं रह जाता.

जेएनयू के हाल के प्रकरण से और भी प्रश्न उठते हैं जो सिर्फ उस तक सीमित नहीं हैं. छात्रों और शिक्षकों के एक हिस्से का कहना है कि विभिन्न अकादमिक कार्यक्रमों की प्रवेश प्रक्रिया में साक्षात्कार वाले हिस्से पर अंक कम से कम किए जाने चाहिए. ऐसा माना गया है साक्षात्कार में सामाजिक रूप से पीछे छूट गए समुदायों के छात्रों के खिलाफ भेदभाव होता है. लेकिन इसकी जांच करने के लिए गठित समिति निष्कर्षात्मक रूप से कुछ नहीं बता पाई. उसने जो कहा वह यह था कि आम तौर पर भेदभाव होता है. क्या यह जातिगत है और है तो कितना और किस प्रकार का, इसके बारे में कोई समझ नहीं बन पाई.

दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद् के सदस्यों को यह सवाल करना आवश्यक नहीं लगा कि पहले उसी पाठ्यक्रम को लागू क्यों किया गया और अब पुराने तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को दुबारा बहाल क्यों किया जा रहा है?

अगर भेदभाव आम है तो वह सभी सामाजिक समुदायों के साथ होता होगा. और अगर साक्षात्कार में भेदभाव की प्रवृत्ति है तो वह तीस अंकों में जैसे होगी, वैसे ही दस अंक में भी हो सकती है. फिर सारे अकादमिक कार्यक्रमों में प्रवेश का आधार मात्र लिखित परीक्षा ही क्यों न हो और उसमें भी मशीन से जांचे जाने लायक बहुविकल्पी प्रश्न के माध्यम से जिसमें मानवीय विवेक हस्तक्षेप ही न कर सके. इसका आशय एक ही है कि अध्यापक समुदाय अब मूल्यांकन का अधिकार खो बैठा है. अब यह प्रस्तावित किया जा रहा है कि अध्यापक के द्वारा मूल्यांकन वस्तुगत नहीं हो सकता और उसके हाथ बांधे जाने चाहिए.

अगर अध्यापक के प्रति यह अविश्वास आम है तो फिर शिक्षा का अर्थ क्या है, इस पर भी हमें बात करनी होगी. अध्यापक की अपनी वर्गगत और जातिगत पृष्ठभूमि उसके नज़रिए को प्रभावित कर सकती है, इसे अब बहस के परे माना जा रहा है. लेकिन अगर शिक्षा हमें हमारे अपने दायरों का अतिक्रमण करने और अपनी नई शख्सियत बनाने की कूवत नहीं देती, तो उसका लाभ ही क्या है! अगर मैं अध्यापक होने के बाद भी सिर्फ हिंदू या ब्राह्मण ही बना रह जाता हूं तो मेरे अध्यापक होने का क्या अर्थ!

यह सब कहने का अर्थ इससे इनकार करना नहीं है कि संरचनात्मक भेदभाव की परंपरा नहीं रही है. अगर अध्यापक के पास अपने छात्रों के चुनाव के सारे अधिकार रहे होते तो शायद हमारी कक्षाओं की शक्ल सौ साल पुरानी ही रहती. लेकिन तब क्या सब कुछ अनंत काल तक अपरिवर्तनीय रहेगा?

जेएनयू से अलग दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में एक उपद्रव हुआ. विधि संकाय बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के कुछ नियमों से पाबंद है. उनके अनुसार अगर छात्रों की एक निश्चित उपस्थिति नहीं हो तो वे परीक्षा में नहीं बैठ सकते. संकायाध्यक्ष ने इस नियम के कारण कुछ छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी. छात्रों ने हंगामा किया और सरेआम उन्हें धमकी दी. उन्हें अपशब्द कहते और अपमानित करते हुए छात्रों का वीडियो चारों ओर घूमने लगा. अगले दिन मालूम हुआ, काउंसिल ने अपना नियम शिथिल कर दिया. उसने अध्यापक का साथ देने की जगह छात्रों के बीच लोकप्रिय होना अधिक उचित समझा. लेकिन ऐसा करते हुए वह अध्यापक और संकायाध्यक्ष की सत्ता को पूरी तरह ध्वस्त कर रही थी, यह शायद उसे विचारणीय भी नहीं लगा.

उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने कहा था कि अगर ब्राह्मण शिक्षकों के हाथों छोड़ दिया तो अति शूद्र कभी पढ़ ही नहीं पाएंगे. अगर दो सदी बाद भी बात वहीं अटकी है तो अब तक की शिक्षा ने किया क्या!

ऐसी ही एक घटना कुछ दिन पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एक युवा अध्यापक के साथ घटित हुई. उन्हें धमकी देकर छात्र प्रतिनिधियों ने एक छात्र का आवेदन अनुशंसित करवा लिया. यह बहस वहां के शिक्षक समुदाय के बीच उठ खड़ी हुई है कि शिक्षक के कर्तव्य निर्वाह का तरीका, जिसे उसका अधिकार का प्रयोग बताया जाता है, क्या छात्र प्रतिनिधि तय करेंगे!

यह ठीक है कि स्वयं अध्यापकों ने अपनी यह सत्ता खोई है. यह बात उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने हंटर कमीशन को कही थी कि अगर ब्राह्मण शिक्षकों के हाथों छोड़ दिया तो अति शूद्र कभी पढ़ ही नहीं पाएंगे. लेकिन अगर दो सदी बाद भी बात वहीं अटकी है तो हमें सोचना होगा कि अब तक की शिक्षा ने किया क्या!

प्रायः देखा जा रहा है कि विश्वविद्यालय का संपूर्ण व्यापार अत्यंत कठोर औपचारिक नियमों से बांध दिया गया है. मुझे जेएनयू के ‘स्वर्णकाल’ के एक छात्र ने किस्सा सुनाया था कि एक बार अपने उस्ताद के साथ वे दिल्ली में ही लंबी बस यात्रा पर थे. उन दोनों के बीच अपने विषय के ही बारे में बात शुरू हुई, बस रुकी तो विदा के समय छात्र से पूछा गया कि वह अपना असाइनमेंट कब जमा कर रहा है. उसने कहा कि सर, इतनी देर जो बात हुई, उसी पर ग्रेड दे दीजिए. और उस्ताद ने ग्रेडिंग कर भी दी! यह आधा मज़ाक हो सकता है लेकिन इसका आशय यही है कि शिक्षक और छात्र के बीच एक अनौपचारिक रिश्ता भी रह सकता था. अब उसकी जगह खत्म हो गई है.

अगर शिक्षक शिक्षक न रह पाए, और किसी जाति या धर्म या विचारधारा का प्रतिनिधि या सूचक बना रहे और छात्र भी किसी न किसी समुदाय का प्रतिनिधि ही हो तो उनकी मुलाकात तलवार और ढाल की तरह होगी. फिर विश्वविद्यालय हमेशा तरह-तरह के हिसाबों को चुकता करने की जगह बन कर रह जाएगा जहां हर कोई अपनी बारी की ताक में रहेगा. हो सकता है जेएनयू के विनाश से आज के सत्ताधारी और उनके समर्थक एक ऐतिहासिक बदले के संतोष की सांस लें, लेकिन यह भारत में उच्च शिक्षा के विचार की मृत्यु की चेतावनी के रूप में देखने से हम उसे बचाने का उपाय भी सोच सकेंगे.