क्या रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को नोटबंदी के फैसले के बारे में पता था? द इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट से तो कुछ ऐसा ही संकेत मिलता है. अखबार के मुताबिक नोटबंदी के फैसले की प्रक्रिया में शामिल रहे तीन लोगों ने उसे विस्तार से उन घटनाओं के सिलसिले की जानकारी दी है जिसकी परिणति देश में हालिया समय में हुए सबसे बड़े सुधारों में से एक के रूप में हुई. नवंबर में मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक को एक चिट्ठी लिखकर नोटबंदी का प्रस्ताव अपने बोर्ड के सामने रखने को कहा था. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इससे भी छह महीने पहले इस फैसले से जुड़े सभी पक्षों के शीर्ष अधिकारियों की एक छोटी सी टीम ने इस पर काम शुरू कर दिया था.

जिस औपचारिक चिट्ठी का जिक्र ऊपर हुआ है उसे वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने भेजा था. रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड ने आठ नवंबर को इस प्रस्ताव पर विचार किया और इसे अपनी मंजूरी भी दे दी. इसके तुरंत बाद कैबिनेट ने इस प्रस्ताव पर मुहर लगाई और उसी दिन शाम को आठ बजे राष्ट्र के नाम अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका ऐलान कर दिया. अखबार ने इस संबंध में बोर्ड के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की. लेकिन उन्होंने या तो गोपनीयता के प्रावधानों का हवाला देते हुए इस पर बात करने से इनकार कर दिया या फिर कोई जवाब ही नहीं दिया.

इस कयास को रघुराम राजन के 2014 के एक बयान से बल मिलता दिखता है जिसमें उनका कहना था कि विमुद्रीकरण के बजाय कर सुधारों पर ध्यान दिया जाना चाहिए

नोटबंदी के प्रस्ताव से जुड़ा औपचारिक पत्र बोर्ड के पास तभी भेजा गया था जब इसकी बैठक होनी थी. लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक रिजर्व बैंक, प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों की एक टीम ने इससे करीब छह महीने पहले से इस कवायद का खाका खींचने की शुरुआत कर दी थी. अधिकारियों ने भी इस बात को माना है कि वे इस मुद्दे को लेकर कुछ समय से रिजर्व बैंक के साथ चर्चा कर रहे थे. हालांकि तैयारी कैसे हुई या प्रक्रिया के बारे में उन्होंने अब तक कुछ नहीं कहा है. अखबार के मुताबिक इस संबंध में पूछे गए सवालों का न तो रिजर्व बैंक ने कोई प्रतिक्रिया दी और न वित्त मंत्रालय ने.

कवायद इतनी पहले शुरू होने का एक मतलब यह लगाया जा रहा है कि रिजर्व बैंक के पूर्व मुखिया रघुराम राजन को भी इसकी जानकारी रही होगी. एक वर्ग कयास लगा रहा है कि वे इस फैसले के पक्ष में नहीं थे और हो सकता है यह भी एक वजह रही हो कि उन्हें दूसरा कार्यकाल नहीं मिला. इस कयास को रघुराम राजन के 2014 के एक बयान से बल मिलता दिखता है जिसमें उनका कहना था कि विमुद्रीकरण के बजाय कर सुधारों पर ध्यान दिया जाना चाहिए. रिजर्व बैंक के पूर्व मुखिया का मानना था कि चालाक लोग विमुद्रीकरण के नुकसान से बचने के रास्ते निकाल लेंगे. हालांकि अखबार के मुताबिक राजन ने भी इस संबंध में पूछे गए सवालों पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

आरबीआई एक्ट 1934 सरकार को केंद्रीय बैंक को दिशा-निर्देश देने का अधिकार देता है. नियमों के मुताबिक केंद्र सरकार जनहित में बैंक के मुखिया के साथ परामर्श के बाद बैंक को निर्देश दे सकती है. इस कानून की धारा सात में लिखा है कि केंद्रीय बैंक के बोर्ड की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार किसी भी मूल्य के नोटों को अमान्य करार दे सकती है.

रिजर्व बैंक के बोर्ड में सरकार और बैंक के प्रतिनिधियों के अलावा स्वतंत्र सदस्य भी होते हैं. जैसे अभी इसमें बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से जुड़े नचिकेत मोर, वित्तीय विशेषज्ञ भारत दोशी, टीसीएस के एन चंद्रशेखरन और पूर्व नौकरशाह सुधीर मांकड़ स्वतंत्र सदस्य हैं. रिजर्व बैंक के प्रतिनिधियों में गर्वनर और तीन डिप्टी गवर्नर शामिल होते हैं जबकि सरकार के नामित प्रतिनिधियों में आर्थिक मामलों और वित्तीय सेवा विभाग के सचिव होते हैं.