यह सन् 2000 की बात है. उस वक्त सचिन तेंदुलकर ने भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी छोड़ने का फैसला कर लिया था. ऐसे में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने सचिन के डिप्टी यानी तब के उपकप्तान सौरव गांगुली को टीम की कमान सौंप दी. और इसके बाद सौरव ने न सिर्फ टीम का कायाकल्प कर डाला, बल्कि उसमें जीत की ऐसी भूख पैदा की कि जिसने भारतीय क्रिकेट की परिभाषा ही नए सिरे से लिख दी. सौरव ने जब टीम की कमान संभाली थी जब मैच फिक्सिंग के आरोपों की गूंज हर तरफ सुनाई दे रही थी और भारतीय क्रिकेट उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था.

आज फिर भारतीय क्रिकेट (इस बार प्रशासन के लिहाज) वैसे ही उथल-पुथल के दौर में कदम बढ़ा चुका है. जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की सिफारिशें न मानने के कारण उच्चतम न्यायालय ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को उनके पदों से हटा दिया है. लोढ़ा समिति नया प्रशासक चुनने की प्रक्रिया में है और ऐसी अटकलें हैं कि वह किसी पूर्व क्रिकेटर को भी यह जिम्मेदारी दे सकती है. इस बीच भारतीय टीम के पूर्व कप्तान ‘लिटिल मास्टर’ सुनील गावस्कर ने सुझाव दिया है कि बीसीसीआई की कमान सौरव को सौंप देनी चाहिए. यह सुझाव निराधार नहीं है.

गावस्कर ने तीन जनवरी को एनडीटीवी को दिए साक्षात्कार में कहा है, ‘आप 1999-2000 का दौर याद कीजिए. तब भारतीय क्रिकेट मैच-फिक्सिंग के आरोपों से जूझ रहा था. उस वक्त सौरव को टीम की कमान दी गई और उन्होंने पूरे हालात बदल डाले. इसीलिए आज बीसीसीआई में बड़ी भूमिका के लिए अगर किसी का नाम सबसे पहले मेरे दिमाग में आता है, तो वे सौरव हैं.’ गावस्कर के मशविरे को इस तथ्य से बल मिलता है कि सौरव को सिर्फ पूर्व क्रिकेटर नहीं हैं. वे जुलाई 2014 से कैब (बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन) के प्रशासन (पहले संयुक्त महासचिव, फिर अध्यक्ष) से भी जुड़े हैं.

सौरव हर खाके में फिट बैठते हैं

बीसीसीआई अध्यक्ष के लिए करीब-करीब हर मापदंड पर सौरव खरे उतरते हैं. वे दो बार बीसीसीआई की आम सभा में शामिल हो चुके हैं. उच्चतम न्यायालय के फैसले के मुताबिक अगर ‘एक-राज्य, एक-वोट’ की नीति लागू हुई तो इससे भी सौरव को लाभ हो सकता है. कैब अध्यक्ष के तौर पर गांगुली देश की प्रभावशाली खेल संस्थाओं में से एक को नियंत्रित कर रहे हैं. पूर्व क्षेत्र के सभी क्रिकेट संघों का भी कैब को समर्थन है. चूंकि अब हर राज्य को वोटिंग का अधिकार मिलने वाला है, लिहाजा इस संभावना को बल मिलता है कि बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए वोट डाले गए तो पूर्व के राज्य सौरव को समर्थन देंगे.

हालांकि अभी इस पर असमंजस है कि 44 वर्षीय सौरव बोर्ड की कमान थामने को लिए आगे आएंगे या नहीं. दरअसल जब यह चर्चा सुर्खियां बनने लगी तब उनका एक बयान आया था, ‘अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी.’ लेकिन सुप्रीम कोर्ट और लोढ़ा समिति के साथ बीसीसीआई के टकराव की स्थिति के बाद यह मांग लगातार जोर पकड़ रही है कि ज्यादा से ज्यादा तादाद में पूर्व क्रिकेटरों को प्रशासन में आना चाहिए. इस सिलसिले में 2014 का उदाहरण भी दिया जा रहा है. उस वक्त आईपीएल (इंडियन प्रीमियर लीग) में भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई के दौरान सुनील गावस्कर को सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई का अंतरिम अध्यक्ष बना दिया था.

कोर्ट का यह अभूतपूर्व फैसला संकेत था कि अदालत खेल प्रशासन से राजनेताओं की दखलंदाजी खत्म करना चाहती है और ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ियों को यह काम सौंपना चाहती है. इसके बाद बीसीसीआई में सुधार का मामला हो या फिर आईपीएल में भ्रष्टाचार का, शीर्ष अदालत आगे लगातार इसी तरह के संकेत देती रही. लोढ़ा समिति ने भी अदालत की मंशा के मुताबिक ही सुझाव दिए हैं. उसने कई ऐसे तौर-तरीके सुझाए हैं, जिससे रोजमर्रा के काम में पूर्व खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा शामिल किया जाए. साथ ही, पूर्व खिलाड़ियों की एक समिति बनाने का सुझाव दिया गया है.

इसके अलावा एक शीर्ष परिषद में भी पूर्व खिलाड़ियों को शामिल करने की लोढ़ा समिति ने अनुशंसा की है, जो प्रशासनिक संचालन में संघ की मदद करे. इन तमाम खाकों में गांगुली न सिर्फ पूरी तरह फिट बैठते हैं, बल्कि वे खुद प्रशासक की जिम्मेदारी उठाने में भी सक्षम हैं. बशर्ते, उन्हें अंतरिम या स्थायी तौर पर बीसीसीआई अध्यक्ष बनाने की पहल की जाए. यही नहीं, उनको गावस्कर जैसे पूर्व खिलाड़ियों का समर्थन भी हासिल है. इससे भी उनका पक्ष और मजबूत हो जाता है. लेकिन बात फिर वहीं आकर अटक जाती है कि इस मामले पर भी विचार लोढ़ा समिति और शीर्ष अदालत को ही करना है.

बस पात्रता का एक सवाल रह जाता है

सौरव बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए आवेदन कर सकते हैं या नहीं, इस पर जरूर एक सवाल खड़ा हुआ है. उन्हें कैब के महासचिव और अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए 30 महीने से ज्यादा हो चुके हैं. ऐसे में कुछ लोगों का तर्क है कि कैब प्रशासन में उनके पास अब सिर्फ छह महीने का कार्यकाल ही बचा है, उसके बाद उन्हें कूलिंग ऑफ पीरियड (अगली जिम्मेदारी संभालने से पहले एक निश्चित समय तक पद से दूर रहना) में जाना होगा. ऐसे में अभी यह तय नहीं है कि सौरव के दोनों पदों पर रहने के समय को एक कार्यकाल के तौर पर गिना जाएगा या अलग-अलग.

लोढ़ा समिति ने क्रिकेट की प्रशासनिक संस्थाओं के पदाधिकारियों के लिए नियम तय किए हैं. इनके मुताबिक, ‘तकनीकी रूप से कोई भी व्यक्ति राज्य संघ में नौ साल तक पदाधिकारी रह सकता है. इसके अलावा अलग से बीसीसीआई में भी नौ साल तक ही फिर पदाधिकारी बन सकता है. लेकिन उसे निश्चित रूप से इन दोनों पदों के बीच में कूलिंग ऑफ पीरियड में रहना होगा.’ ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट और लोढ़ा समिति सौरव को बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए पात्र मानेगी या नहीं. इस मामले में स्थिति काफी कुछ 19 जनवरी को स्पष्ट होने की संभावना है.बीसीसीआई में सुधार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में उस दिन होने वाली सुनवाई के वक्त क्या किसी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया जाएगा? या फिर अगले चुनाव तक पर्यवेक्षक नियुक्त किए जाएंगे?

उस दिन जो भी हो, अगर सौरव को बीसीसीआई अध्यक्ष की जिम्मेदारी देने के योग्य पाया गया तो इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता. इसके बाद यह भी अपेक्षा की जा सकती है कि जैसे सौरव ने भारतीय क्रिकेट में नई जान फूंकी थी, वैसे ही वे इस खेल के प्रशासनिक ढांचे में भी आमूल-चूल बदलाव करने में सक्षम हो सकेंगे.