दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के मंगलवार को दिए एक बयान ने खूब सुर्खियां बटोरीं हैं. उन्होंने मोहाली में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप यह मानकर चलो कि पंजाब का मुख्यमंत्री तो अरविंद केजरीवाल बनने वाला है.’ हालांकि अगली ही लाइन में उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘राज्य में मुख्यमंत्री कोई भी बने लेकिन यह जिम्मेदारी केजरीवाल की होगी कि जो वादे उन्होंने आपके सामने किए हैं, वे हर हाल में पूरे हों. इसलिए यह मानकर मतदान करें कि आप केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट डाल रहे हैं. आपका वोट केजरीवाल के नाम पर होगा.’

सिसोदिया के इस बयान से तमाम अटकलों को बल मिला. इनमें सबसे अहम यह है कि क्या केजरीवाल दिल्ली छोड़कर पंजाब के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. जबकि उन्होंने दिल्ली के लोगों से 2015 में वादा किया था कि वे पांच साल तक राज्य छोड़कर नहीं जाएंगे. उनकी आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली में नारा भी दिया था, ‘पांच साल, केजरीवाल.’ ऐसे में इस अटकलबाजी और बयान से न सिर्फ पंजाब बल्कि दिल्ली की राजनीति का माहौल गर्म होना भी लाजिमी था, जो हुआ भी. इसके चलते दिल्ली में आप की प्रवक्ता और मनीष सिसोदिया की सलाहकार आतिशी मार्लेना को सफाई देनी पड़ी.

आतिशी ने कहा, ‘उन्होंने (सिसोदिया का) यह नहीं कहा था कि केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. वे (केजरीवाल) आप का चेहरा हैं. यही चेहरा पंजाब के लोग भी तलाश रहे हैं. वे आप के प्रतिनिधि हैं. वे विश्वसनीयता का प्रतिनिधित्व करते हैं. पंजाब में भी वे विश्वसनीयता का संचार कर रहे हैं. लोगों को बस यही बताने की कोशिश की गई थी. साथ में यह भी कि जितने भी वादे चुनाव के दौरान पार्टी और उसके नेताओं की ओर से किए जा रहे हैं, सभी पूरे होंगे.’ हालांकि आतिशी ने अपनी सफाई में यह स्पष्ट तौर पर नहीं कहा कि केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे.

शायद यही वजह रही कि पंजाब की प्रमुख विरोधी पार्टियों - कांग्रेस और अकाली दल - ने तुरंत इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी. पंजाब कांग्रेस के प्रमुख कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ट्वीट किया, ‘महीनों तक दबे-छिपे रहने के बाद उनकी महत्वाकांक्षा का सच आखिर सामने आ ही गया. कितना ओछा आदमी है.’ अकाली दल के नेता और राज्य के उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने भी कुछ इसी तरह का ट्वीट किया. उन्होंने लिखा, ‘वे (केजरीवाल) झूठ बोलने और यू-टर्न मारने के शौकीन हैं. पहले उन्होंने कहा था कि कोई पंजाबी ही मुख्यमंत्री होगा. अब वे खुद इस दौड़ में कूद पड़े हैं.’ इस बीच गुरुवार को एक रैली में अरविंद केजरीवाल ने खुद साफ कर दिया है कि वे दिल्ली के ही मुख्यमंत्री रहेंगे. साथ ही वे यह कहना नहीं भूले, 'आप जब भी वोट डालने जाएं मेरा चेहरा याद रखना. यह मेरी जिम्मेदारी है कि एक-एक वादा पूरा हो.'

हालांकि इन बयानों-प्रतिक्रियाओं के राजनीतिक निहितार्थ निकालें तो तीन-चार चीजें उभरकर सामने आती हैं.

1. पंजाब के चुनावी दंगल में शानदार बढ़त लेने के बाद आप अब वहां पिछड़ती दिख रही है. अभी पिछले हफ्ते ही आए ओपिनियन पोल के नतीजे बताते हैं कि आप वहां अकाली दल-भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर रहेगी. हालांकि कुछ ओपिनियन पोल कांग्रेस को पहले नंबर पर बता रहे हैं. लेकिन आप के तीसरे नंबर पर पिछड़ने का अनुमान सबका है. इससे आप में चिंता होना लाजमी है क्योंकि मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चनुाव में सिर्फ पंजाब में ही पूरी गंभीरता के साथ वह मैदान में है. ऐसे में उसे चर्चा में बने रहने के लिए बड़ा धमाका करना था, जो प्रचार माध्यमों की सुर्खी बन जाए. उसने यही किया.

2. पंजाब के भावी मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल की संभावना को कोई पूरी तरह खारिज भी नहीं कर रहा है. जैसा सुखबीर सिंह बादल के बयान से भी साफ है. सुखबीर और आप के विरोधी दलों के अन्य नेता संभवत: अब इस तथ्य को अपने पक्ष में भुनाना चाहते हैं कि ‘केजरीवाल पंजाबी नही हैं. वे हरियाणा से ताल्लुक रखते हैं.’ हरियाणा यानी वह राज्य जिसका पानी को लेकर पंजाब के साथ झगड़ा चलता रहता है. पंजाब और हरियाणा के बीच सतलज-यमुना लिंक नहर के मसले पर कड़वाहट कुछ ज्यादा ही बढ़ चुकी है. यह मसला दिल्ली को भी प्रभावित करता है, जहां केजरीवाल अभी मुख्यमंत्री हैं.

3. केजरीवाल का रिकॉर्ड बेदाग नहीं है. दिल्ली में दिसंबर 2013 में अचानक सत्ता में आने के बाद उन्होंने 49 दिन के भीतर मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया था. लेकिन पासा उलटा पड़ गया. उन्हें ‘भगोड़ा’ जैसा तमगा तक दे दिया गया, जिससे उनकी काफी किरकिरी हुई. बाद में फरवरी 2015 में जब चुनाव हुए तो केजरीवाल को अपने इस्तीफे के लिए दिल्ली के लोगों से माफी मांगनी पड़ी. देश की राजधानी के मतदाताओं ने उन्हें माफ किया और दूसरी बार मौका दिया. लेकिन दिल्ली के पूर्ण राज्य न होने से वे खुलकर काम नहीं कर पा रहे हैं. इसलिए संभव है कि वे फिर दोबारा दिल्ली छोड़ने का दांव खेलने की सोच रहे हों.

4. आखिरी बात. अगर यह मान भी लें कि आतिशी सही कह रही हैं और सिसोदिया लोगों के सामने केजरीवाल को सिर्फ प्रतिनिधि चेहरे के तौर पर पेश कर रहे थे, तब भी एक बात साफ है. भ्रष्टाचार की खिलाफत में चले आंदोलन से निकली पार्टी आप अब सिर्फ ‘वन मैन ब्रांड’ बन गई है. यानी वह अब सिर्फ केजरीवाल पर आश्रित हो चुकी है. आप के प्रवक्ता दीपक बाजपेयी की प्रतिक्रिया यही संकेत देती है, ‘उत्तर प्रदेश में भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है. तो क्या मोदी वहां मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे.’ लेकिन दीपक के बयान का निहितार्थ यह भी है कि आप और अन्य पार्टियों में अब ज्यादा फर्क नहीं रहा.

दिलचस्प है कि जनांदोलन से निकली आप और उसके नेता अक्सर नरेंद्र मोदी की इस बात के लिए आलोचना करते रहे हैं कि उन्होंने भाजपा पर आधिपत्य जमा लिया है. लेकिन आप के विकासक्रम को देखें तो साफ हो जाता है कि आप के प्रमुख केजरीवाल खुद उसी राह पर चल रहे हैं. उन्होंने एक-एक कर उन तमाम नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, जो उनसे सहमत नहीं थे. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण तो इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हैं, जिन्हें करीब-करीब बेइज्जत कर आप से बाहर किया गया. ऐसे में आप को अगर अब पूरी तरह अरविंद केजरीवाल की पार्टी मान लिया जाए तो ज्यादा गलत नहीं होगा.